जिस्म तो टूटा, मन नहीं

  • 4 अप्रैल 2010
रेडियो प्रसारण करते शिशुपाल
Image caption हादसे के बाद शिशुपाल खुद तो दुनिया से कट गए लेकिन गांव को अपने रेडियो प्रसारण के जरिए दुनिया से जोड़े दिया

राजस्थान के एक दूरस्थ मरुस्थली गांव सुई में एक दुर्घटना के बाद विकलांग बनी ज़िंदगी को एक ग्रामीण बुजुर्ग शिशुपाल सिंह ने ऐसे तब्दील किया जैसे वो एक रेडियो स्टेशन बन गए हों.

शिशुपाल पिछले दो दशक से अपने बिस्तर से ही हर रोज़ पूरे गांव को ख़बरें सुनाते हैं.

वे ज़रूरी सूचनाएं भी प्रसारित करते हैं. इसके लिए शिशुपाल एक माइक और लाउडस्पीकर का सहारा लेते हैं.

उनका रेडियो कभी ख़बरें, कभी उपयोगी सूचनाएं और कभी जीवन दर्शन की सूक्तियां प्रसारित करता है.

गांव को रेडियो से जोड़ा

हादसे के बाद शिशुपाल की ज़िंदगी एक कमरे में क़ैद होकर रह गई.

वो ख़ुद तो दुनिया से कट गए, लेकिन अपने गांव को इस प्रसारण के ज़रिए दुनिया से जोड़े रखा.

बीकानेर से कोई 150 किलोमीटर का सफ़र तय कर हम जब सुई गांव पहुंचे तो शिशुपाल अतीत की यादों में खोए मिले.

वो कहने लगे- मैं उस वक़्त हादसे का शिकार हो गया जब सामाजिक कार्य से कहीं जा रहा था.

इसमें उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई और फिर वो कभी नहीं उठ सके.

शिशुपाल कहते हैं, "मैं हर रोज़ भोर में उठकर लाउडस्पीकर के ज़रिए लोगों का अभिवादन करता हूं. उन्हें कहता हूं कि सबेरा हो गया है, नित्य काम में जुट जाएं. लोग नशे से दूर रहें. महिलाओं से आग्रह करता हूँ कि बच्चों को अच्छी तालीम दें. कुछ भजन भी सुनाता हूँ. इसके साथ ही देश-विदेश की कुछ ख़बरें भी गांव वालों को सुनाता हूँ.”

शिशुपाल बताने लगे कि प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता दिवंगत संजय घोष उन्हें जानते थे.

वे कहते हैं, ''दुर्घटना के बाद संजय जी ने पूछा क्या मदद चाहिए? मैंने कहा-मुझे एक लाउडस्पीकर दिला दीजिए, यह लाउडस्पीकर उनका ही भेंट किया हुआ है."

गांव के लिए अच्छा काम

गांव के हरफूल कहते हैं कि अगर मवेशी खो जाए, ग्राम पंचायत की बैठक हो या राशन का गेहूं बंटने के लिए आया हो, शिशुपाल अपने इस प्रसारण तंत्र के ज़रिए पूरे गांव को ख़बर दे देते हैं.

बकौल हरफूल, ''कई बार उनके प्रसारण से खोया हुआ पशु ग्रामीणों को वापस मिला है, यहाँ तक कि ग़ायब हुए आभूषण भी वापस मिले हैं. हमारे लिए शिशुपाल जी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं.”

ऐसे समय जब कुछ टीवी चैनल ख़बरों से ज़्यादा विज्ञापन प्रसारित करते हों और सूचनाएं मुनाफे की भेंट चढ़ जाती हों, ये शिशुपाल का हौसला ही है कि अपाहिज ज़िंदगी के बावजूद वे समाज के लिए ख़बरें सुनाते हैं.

हादसे ने उनका जिस्म तो तोड़ा लेकिन शिशुपाल ने अपने मन को नहीं टूटने दिया.

गांव में चौपाल पर ताश खेलते ग्रामीणों की भीड़ में हर कोई शिशुपाल की तारीफ़ कर रहा था.

इस इलाक़े के चंपालाल शर्मा कहते हैं, “शिशुपाल हमारे लिए एक अख़बार ही हैं. दुनिया में क्या कुछ हो रहा है,ये शिशुपाल ही हमें बताते हैं.”

मदद की दरकार

शिशुपाल कहते हैं, ''मैं दुर्घटना का शिकार हो गया. लेकिन मैं समाज को यह बताना चाहता हूं कि मुझमें अब भी समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा है. थोड़ी और मदद मिलती तो मैं अपने इस काम को और विस्तार देता."

शिशुपाल की दुनिया एक कमरे तक सीमित है. लेकिन उनकी इच्छा है कि इसे विस्तार दिया जाय. उनको इस काम में अभी भी मदद की ज़रूरत है.

उन्हें इस बात का अफ़सोस भी है कि यह मदद अभी तक उन्हें नहीं मिल पाई है.

क्योंकि साहिल पर तमाशाई तो बहुत हैं. लेकिन डूबते की इमदाद कोई नहीं करता.

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