बेटे की अपने पिता को श्रद्धांजलि

बीस साल के देवेन्द्र तिवारी अमौसी एयरपोर्ट के वीआईपी गेट पर खड़े होकर एकटक उन शवों के देख रहे थे, जो छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा से सीधे यहाँ लाए गए थे.

लेकिन पहली खेप में जो बारह शव आए थे उनमें उनके पिता ब्रिजेन्द्र तिवारी का शव नहीं था.

ब्रिजेन्द्र सीआरपीएफ़ में सब इंस्पेक्टर थे. उदास देवेन्द्र सीआरपीएफ़ के डीआईजी एसएन साबत के पास गए.

साबत ने उन्हें ढांढ़स बंधाया कि उनके पिता का शव कुछ ही घंटों में आ जाएगा.

देवेन्द्र की मजबूरी थी कि वे अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए अंबेडकर नगर ज़िले में स्थित अपने गाँव नहीं जा सकते.

उन्होंने बताया, "मैं बीकॉम का छात्र हूँ, मेरा लखनऊ में इम्तिहान है. इसलिए मैं गाँव नही जा सकता. मै चाहता हूँ कि पिता जी का आखिरी दर्शन कर लूं"

'गला रुंध गया'

इतना कहते कहते देवेन्द्र का गला रुंध गया. देवेन्द्र तो चूँकि लखनऊ में थे इसलिए वे एयरपोर्ट आ गए, बाक़ी किसी शहीद का रिश्तेदार एयरपोर्ट नहीं पहुँच पाया था.

दंतेवाड़ा में मारे गए जवान सीआरपीएफ़ की 62वीं बटालियन के थे. जिसका जिसका मुख्यालय लखनऊ में है. वहाँ मारे गए जवानों में से 42 अकेले उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे. इनमें से 25 शव हवाई जहाज़ से लखनऊ लाए गए.

बटालियन के अधिकारी और जवान अपने मारे गए साथियों के शव लेने और उनके घरों को पहुँचाने के लिए मुस्तैद थे. वे मन में ग़ुस्से और शोक पर काबू किए हुए थे.

डीआईजी साबत का कहना था, ''यह दुख की घड़ी है और इस मौक़े पर हम शहीद परिवारों के साथ हैं. हम हर तरह से उनकी मदद करेंगे और फ़ोर्स का मनोबल भी बढ़ाएँगे.''

उत्तर प्रदेश सरकार के पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद थे. माल्यार्पण और अंतिम सलामी के साथ शवों को ट्रकों पर लादा गया तो साथी जवानों और अधिकारियों ने मारे गए सुरक्षाबलों और 'भारत माता की जय' के नारे लगाए. लेकिन इस मौक़े पर मुख्यमंत्री मायावती की ग़ैरहाज़िरी चर्चा का विषय रही.

श्रद्धांजलि देने वालों में भारतीय जनता पार्टी के विधायक सुरेश तिवारी और समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव शामिल थे.

अखिलेश की निजी सुरक्षा में तैनात एक सिपाही का बेटा भी इस मुठभेड़ में मेरा गया है इसलिए वे विशेष रूप से आए थे.

पत्रकारों से बातचीत में अखिलेश का कहना था कि नक्सलवाद एक राजनीतिक समस्या है और इसके समाधान के लिए राजनीतिक स्तर पर बातचीत की पहल होनी चाहिए.

उनका कहना था, "इन इलाकों में अशिक्षा, बेरोज़गारी और निराशा के चलते नक्सलवादी युवकों में सरकार और सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ नफ़रत भर रहे हैं, जिससे वे बंदूक उठाकर कर ऐसी घटनाएं कर देते हैं."

अखिलेश का यह भी कहना था कि गृह मंत्री चिदंबरम को अहंकार के बजाए सूझबूझ की भाषा बोलनी चाहिए.

लेकिन वहां मौजूद सुरक्षाबल के जवान नक्सलवादियों के साथ कठोरता के साथ पेश आने की बातें कर रहे थे. उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बृजलाल का कहना था की उत्तर प्रदेश पुलिस ने नक्सलियों के ख़िलाफ़ सख़्ती के साथ-साथ ग़रीब आदिवासियों के कल्याण की जो योजनाएँ चलाई हैं और उसपर काम कर रही है, इसलिए उत्तर प्रदेश में नक्सलवाद तीन साल से काबू में है.

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