महिलाओं पर अत्याचार के मामले बढ़े

एक कश्मीरी महिला
Image caption विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाए जाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए

एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत प्रशासित कश्मीर में हाल के वर्षों में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों में भारी बढ़ोत्तरी हुई है.

पुलिस का कहना है कि ऐसे अपराधों में पिछले तीन सालों में 13 प्रतिशत वृद्धि हुई है. लेकिन कश्मीर विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र विभाग के द्वारा कराए गए एक सर्वे से पता चलता है कि महिलाओं की दशा इससे कहीं ज़्यादा ख़राब है.

जाने माने समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर बशीर अहमद डबला के अनुसार सर्वे से पता चलता है कि 60 प्रतिशत महिलाओं को ससुराल में प्रताड़ित किया जाता है, ताने दिए जाते हैं या अन्य प्रकार से परेशान किया जाता है.

डबला कहते हैं, “30 प्रतिशत महिलाओं के ससुराल वाले उनसे उनकी पगार छीन लेते हैं, जबकि 16 प्रतिशत महिलाओं को तलाक़ की धमकी दी जाती है.”

प्रोफ़ेसर डबला के अनुसार विगत 10 वर्षों में कश्मीर में दहेज के लिए हत्या किए जाने की सैंकड़ों घटनाएँ भी सामने आई हैं. उनका कहना है कि दो दशक पहले तक कश्मीर में महिलाओं को दफ़्तरों में सड़कों पर तंग किया जाता था, लेकिन उसके बाद से उनके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार और बलात्कार की घटनाएँ सामने आने लगीं.

प्रोफ़ेसर डबला के अनुसार प्रताड़ना के ख़िलाफ़ मात्र 16 प्रतिशत महिलाएँ ही आवाज़ उठाती हैं, जबकि बाक़ी परिवार, समाज या पुलिस से समर्थन नहीं मिलने की आशंका से चुप रह जाती हैं.

पुलिस का असहयोग

जम्मू कश्मीर की समाज कल्याण मंत्री कुमारी सकीना इटू स्वीकार करती हैं कि हिंसा की शिकार महिलाओं के प्रति पुलिस का रवैया सहानुभूति का नहीं रहा है. वह कहती हैं, “मुझे कई बहनों ने कहा है कि वे पुलिस के पास शिकायत लेकर गई थीं लेकिन पुलिस ने ध्यान ही नहीं दिया.”

हालाँकि राज्य के पुलिस उपमहानिरीक्षक हेमंत कुमार लोहिया का कहना है कि वास्तव में हाल के दिनों में महिलाओं द्वारा पुलिस में दर्ज कराई जाने वाली शिकायतों में वृद्धि हुई है. जिला एवं सत्र न्यायाधीश कनीज़ फ़ातिमा भी मानती हैं कि महिलाएँ अब जागरूक हुई हैं, लेकिन उनके अनुसार हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने में वे अब भी संकोच करती हैं.

श्रीनगर के मौलाना आज़ाद कॉलेज में शिक्षक गुरमीत कौर के अनुसार इस स्थिति से निबटने के लिए ऐसे पुलिस स्टेशनों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए जिसकी कमान महिला अधिकारियों के हाथों में हो. उन्होंने पाठ्यक्रमों में भी महिला अधिकारों के विस्तार की भी ज़रूरत बताई.