अर्धसैनिक बलों की हालत चिंतनीय

अर्द्धसैनिक बल
Image caption कुछ सप्ताह पहले 76 जवानों को माओवादी ने मार दिया था.

थल सेना के अध्यक्ष ने कहा है कि छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले के चिंतलनार कैंप में तैनात केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 76 शहीद जवानों को सही ट्रेनिंग प्राप्त नहीं थी.

भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम नें घटना के बाद ही कह दिया था कि जवानों से कोई बड़ी चूक हुई थी जिसके कारण इतनी बड़ी घटना घटी.

चूक तो हुई. मगर किससे? यह एक बहस का विषय है. सवाल उठता है कि अगर केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल की 62वीं बटालियन के जवान प्रशिक्षित नहीं थे तो फिर उन्हें इतने ख़तरनाक मिशन पर क्यों भेजा गया?

पुलिस और अर्धसैनिक बलों की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है शांति बहाल करना और विधि-व्यवस्था को दुरुस्त रखना. मगर छत्तीसगढ़ में तैनात किए गए जवानों को युद्ध जैसे हालात का सामना करना पड़ रहा है. बस्तर के बीहड़ों में तैनात ज़्यादातर जवान छापामार युद्ध में प्रशिक्षित नहीं हैं. यही वजह है कि उन्हें बड़े नुकसान उठाने पड़ रहे हैं.

गृह मंत्रालय से नियुक्त किए गए जांच अधिकारी, सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक इएम राममोहन दंतेवाड़ा के चिंतलनार में हुई घटना की जांच कर रहे है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि उनकी जांच के बाद कई तथ्य उजागर होंगे जिससे दिल्ली में बैठे नेताओं को यह पता चलेगा कि छत्तीसगढ़ में तैनात पुलिस या अर्ध सैनिक बलों के जवान किन परिस्थितियों में रह रहे हैं.

दंतेवाड़ा ज़िला मुख्यालय से चिंतलनार तक रास्ते में सुरक्षा बलों के कई कैंप देखने को मिलते हैं. यूं समझिए कि सबको हर कैंप पर बने चेक पोस्ट से होकर ही गुजरना पड़ता है. मगर चेक पोस्ट पर कोई जवान खड़ा नहीं मिलता है. सब अपने कैम्पों में मोर्चों के पीछे रहते हैं. सड़क पर से होकर गुजरने वाली गाड़ियों के चालकों को खुद से ही नाके का अवरोध हटाना पड़ता है और उसे फिर वापस लगाना पड़ता है.

कैंपों में रह रहे जवान मानो किसी जेल में रह रहे हों. उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं है. वह कैंप के अंदर ही सिमटे रहते हैं. मुझसे कहा गया कि ऐसा वह सुरक्षा के कारणों से कर रहे हैं क्योंकि पिछले दिनों कई ऐसी वारदातें हुई जब माओवादी छापामारों ने यात्री वाहन पर सवार होकर कैंपों पर हमला किया.

अविश्वास का माहौल

Image caption पानी के लिए भी दूर तक जाना पड़ता है.

यह एक अविश्वास का माहौल है, कोई किसी पर भरोसा नहीं करता. सब एक दूसरे को शक की निगाह से देखते हैं. जवानों के सामने लोगों का दिल जीतने की एक बड़ी चुनौती है. मगर छत्तीसगढ़ और खास तौर पर बस्तर के हालात ऐसे हैं कि दिल जीतने की बात तो दूर, सुरक्षा बल के जवान किसी सिविलियन पर भरोसा नहीं करना चाहते हैं.

उनके पुराने अनुभव बड़े कड़वे हैं. वहीं आम ग्रामीण भी जवानों को शक की निगाह से ही देखता है. अबूझमाड़ और बस्तर के अन्य इलाक़ों में जब जवान गश्त पर निकलते हैं तो ग्रामीणों के दिल में डर समा जाता है. इस अविश्वास के माहौल में जवानों को लोगों के दिल में जगह बनाना है.

दंतेवाड़ा से चिंतलनार के रास्ते में सबसे पहले मेरा सामना 25 किलोमीटर दूर स्थित भुसारस की पहाड़ियों में पैदल गश्त लगा रहे सीआरपीएफ के जवानों के एक दल से हुआ. वह इन पहाड़ियों से होकर गुजरने वाले रास्ते की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं. दल का नेतृत्व कर रहे मजोर ने मुझ से बताया की यह ये इस इलाक़े का सबसे संवेदनशील इलाक़ा है जहाँ कई बार नक्सालियों ने सुरक्षा बलों के जवानों पर हमले किए.

गाड़ी से उतारकर मैं भी उनके साथ हो लिया. कुछ किलोमीटर की गश्त के बाद सड़क के नीचे गाड़ी गई बारूदी सुरंग का पता चला. इस विस्फोटक को दो अलग-अलग कैन में भरकर गाड़ा गया था. एक का वज़न 25 किलोग्राम था. दल का नेतृत्व कर रहे अधिकारी का कहना था कि यह विस्फोटक कम से कम दो सौ लोगों को मार सकता है. विस्फोटक को तार और डेटोनेटर से जोड़ा गया था. किस्मत से इसका पता चल गया वर्ना एक और बड़ा हादसा हो जाता.

दुःख का आलम

दल में शामिल जवान बता रहे थे कि जहाँ उनका कैंप है वहां मोबाइल का नेटवर्क नहीं है जिस वजह से उन्हें अपने घरवालों से संपर्क करने में बड़ी कठिनाई होती है. बाद में कैंप पर जवानों ने अपने दुखों का पिटारा खोल कर रख दिया.

जहाँ पर यह कैंप बना है वह एक स्कूल की जर्जर बिल्डिंग है जो कभी भी गिर सकती है. परेशानियों की लंबी फेहरिस्त है इन कैंपों में जहाँ न बिजली की सुविधा है न पानी की. कई कैंपों में तो जवान टीन के छप्पड़ के नीचे रहते हैं जो इस चिलचिलाती गर्मी में तंदूर जैसा गर्म हो जाता है.

Image caption जान हथेली पर रख कर गश्त करते जवान.

चूँकि एक बड़े इलाक़े में बिजली नहीं है तो कहीं-कहीं पर जेनरेटर की व्यवस्था की गई है. मगर उनमें डालने के लिए तेल नहीं है. एक जवान का कहना है, "वाहन भी उपलब्ध नहीं हैं. जब किसी जवान को छुट्टी पर जाना होता है तो उसे एक लंबे समय तक वहां इंतज़ार में बिता देना पड़ता है. इन कैंपों में हमारी पहचान इंसानों की नहीं रह गई है. हम एक मशीन बन कर रह गए हैं जिसे सिर्फ काम करना है."

दोरनापाल से लेकर चिंतलनार तक की 58 किलोमीटर लंबी सड़क पर तीन कैंप हैं. यह इलाक़ा ऐसा है जहाँ जाने से हर कोई कतराता है. दोनों तरफ पाहाड़ियों और घने जंगल की श्रृंखला. यहाँ आना जाना बड़े जोखिम वाला काम है क्योंकि इस सड़क पर कब बारूदी सुरंग फटेगी कोई नहीं कह सकता.

यह वही सड़क है जिसपर 6 अप्रैल को माओवादियों ने 76 जवानों को मौत के घात उतार दिया था. इस सड़क पर पोल्लामपल्ली और चिंता गुफा में भी कामोवेस वही हाल है. चिंता गुफा के कैंप में जाने वालों को अपना नाम और गाड़ी का नंबर दर्ज कराना पड़ता है ताकि आने जाने वालों पर पुलिस की निगरानी रह सके. सभी कैंप जेल जैसे हैं और अमानविय परिस्थितियों नें ज़िंदगी को मुश्किल बना दिया है.

पानी भी नसीब नहीं

चिंतलनार से जगरगुंडा कैंप की दूरी 12 किलोमीटर है. मगर यह सड़क माओवादियों ने ध्वस्त कर दी है. इस सड़क पर कोई यातायात नहीं है. इस कैंप में हर 6 महीनों में राशन पहुंचाया जाता है. वह भी हेलीकॉप्टर से. इस कैंप में रह रहे जवानों को अगर पानी भी लाना होता है तो उन्हें ‘रोड ओपनिंग पार्टी" लगाकर ही जाना पड़ता है. अगर इस कैंप पर नक्सालियों का हमला होता है तो यहाँ तक मदद भी पहुंचना मुश्किल है.

चिंतलनार के इलाक़े को माओवादियों की राजधानी के नाम से जाना जाता रहा है. वजह यह है कि माओवादी इस इलाक़े में किसी के प्रवेश को पसंद नहीं करते. हर आने जाने वाला उनके रहमो करम पर है और हर किसी पर उनकी नज़र होती है. यहाँ वह जब चाहें किसी को उड़ा सकते हैं.

जिन जवानों को यहाँ तैनात किया गया वह मौत के साए में ही जीते हैं. स्थिति की भयावता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब 6 अप्रैल की घटना की जांच करने सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक राममोहन घटनास्थल पर जा रहे थे तो माओवादियों ने गोलीबारी की थी.

ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर सरकार अरबों रूपए खर्च कर रही है. मगर दिन-रात अपनी जान की बाज़ी लगाने वाले जवानों को बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम रहना पड़ रहा है.

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