असम में छह संदिग्ध हिरासत में

  • 29 अप्रैल 2010
उल्फ़ा
Image caption पिछले महिनों में उल्फ़ा के कई बड़े नताओं की गिरफ़्तारी हुई है

पूर्वोत्तर राज्य असम में पुलिस का कहना है कि उसने बम धमाके करने की योनजा बनाने में विद्रोहियों का साथ देने के संदेह में छह लोगों को हिरासत में लिया है.

राज्य पुलिस ख़ुफ़िया विभाग के प्रमुख खगेन सरमाह ने बीबीसी को बताया कि गुप्तचर विभाग को इस बात की पक्की जानकारी मिली थी कि प्रतिबंधित संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम यानी उल्फ़ा राज्य की राजधानी गुवाहाटी में धमाकों की योजना बन रहे हैं.

छह संदिग्धों को गोपालपाड़ा और कामरुप ज़िले से हिरासत में लिया गया है. पुलिस के अनुसार हिरासत में लिए गए लोगों पर विद्रोहियों को शरण देने का आरोप है.

सरमाह का कहना है,"इन लोगों को निश्चित संदेह के बाद पिछले दो दिनों में हिरासत में लिया गया है."

उनका कहना है कि उल्फ़ा के 109 बटालियन के प्रमुख दृष्टि राजखोवा बांगलादेश से असम के सीमावर्ती ज़िले गोलपाड़ा में आ चुके हैं और वे ही धमाके करने की साज़िश के सूत्रधार हैं.

उल्फ़ा की परेशानी

बांगलादेश में अवामी लीग पार्टी की सरकार बनने के बाद उल्फ़ा के कई बड़े नेता बांगलादेश में पकड़े गए हैं और उन्हें भारत के हवाले भी किया गया है.

सरमाह का कहना है, "हम जानते हैं कि विद्रोही बांगलादेश से भाग रहे हैं, लेकिन वो चाहते हैं बड़े हमले किए जाए ताकि इस बात को बताया जा सके कि उल्फ़ा कोई मृत शक्ति नहीं है. हम यह भी जानते हैं कि वे धमाके करने के लिए विस्फ़ोटक जमा कर रखे हैं."

ग़ौरतलब है कि उल्फ़ा सशस्त्र शाखा के प्रमुख परेश बरुआ राज्य सरकार के उस ताज़ा कोशिश से नाराज़ चल रहे हैं जिसमें सरकार की कोशिश है कि जेल में क़ैद विद्रोही नेताओं से बातचीत की जाए.

बरुआ असम के कुछ उन प्रमुख लोगों पर भी जमकर बरसे हैं जिन्होने शांति वार्ता की शुरुआत के लिए एक फ़ोरम का गठन किया है.

बरुआ का कहना था,"ये बुद्धिजीवी समस्या का हल भारत के संविधान के अंदर ही तलाशाना चाहते हैं, जोकि उल्फ़ा को मंज़ूर नहीं है. हमारे हज़ारों जवान लड़के और लड़कियों ने आज़ादी की लडा़ई के लिए जान दी हैं. हम इसपर समझौता नहीं करेंगे."

असम के जाने माने बुद्धिजीवी हिरेन गोहेन शांति वार्ता को आगे बढ़ाने वालों में हैं, वो बरुआ पर हमला बोलते हुए कहते हैं, "हम नहीं चाहते हैं कि हमारा राज्य हिंसा के दलदल में फंस जाए, वो भी ऐसी स्थिति में जब कुछ विद्रोही नेताओं की चाहत है कि वो भ्रम को जीत लेंगे."

दृष्टि राजखोवा का शुमार परेश बरुआ के वफ़ादारों में होता है और ख़ुफ़िया विभाग को संदेह है राजखोवा धमाकों की योजना इसलिए बना रहे हैं ताकि शांति वार्ता की कोशिशों को शुरू होने से पहले ही पटरी से उतार दिया जाए.

अक्तूबर 2008 में असम में सिलसिलेवार धमाके हुए थे जिसमें 87 लोगों की जान गई थी. इनके लिए उल्फ़ा के साथ-साथ बोडो आदीवासी के एक विद्रोही समूह को ज़िम्मेदार ठहराया गया था.

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