कॉर्बेट नेशनल पार्क में ताला

राजाजी पार्क
Image caption उत्तराखंड के वन्य पार्क सैलानियों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं

उत्तराखंड में क़रीब 20 दिनों से हड़ताल पर चल रहे वनरक्षकों (फ़ॉरेस्ट गार्ड्स) और वन बीट अधिकारियों ने शुक्रवार को मशहूर कॉर्बेट नेशनल पार्क और राजाजी नेशनल पार्क सहित प्रदेश के सभी पाँच नेशनल पार्कों में ताला बंदी कर दी है.

इससे सैकड़ों पर्यटक बेहाल बताए जाते हैं और वन विभाग में हड़कंप मचा हुआ है.

अलमोड़ा, नैनीताल, हलद्वानी से लेकर उत्तरकाशी और टिहरी तक के वनरक्षक अपने–अपने वनक्षेत्रों को छोड़कर धरने पर बैठे हुए हैं. अपनी मांगों की सुनवाई न होती देख उन्होंने आक्रामक रुख़ अपना लिया है.

तीन दिन पहले वन विभाग के सभी दफ़्तरों को बंद कराने के बाद उन्होंने उत्तराखंड की शान समझे जानेवाले नेशनल पार्कों को ही बंद कर दिया.

इन नेशनल पार्कों में अभी पर्यटक सीज़न है और हर दिन औसतन 1500 पर्यटक यहाँ आते हैं जो दो-तीन दिन रूककर यहाँ सफ़ारी और कैम्पिंग करते हैं.

कोलकाता से आए ऐसे ही एक पर्यटक ने कहा, "हम तो अंदर जा ही नहीं पाए. हमें पहले नहीं बताया गया अगर हमें पता होता कि यहाँ ऐसा हाल है तो हम कहीं और जाते."

उत्तराखंड के प्रमुख वनरक्षक डॉक्टर रघुबीर सिंह रावत ने स्वीकार किया कि वन बीट अधिकारियों को ऐसा नहीं करना चाहिए था. इससे ग़लत संदेश जा रहा है. उनकी मांगों को लेकर उच्च स्तरीय बातचीत चल रही है और जल्दी ही फ़ैसला हो जाएगा.

माँग

प्रांतीय वनरक्षक संघ के अध्यक्ष मायामोहन कंडवाल ने अपनी मांगों के बारे में कहा, "यहां अफ़सरों को तीन-तीन प्रोमोशन मिल गए हैं और हम जो जंगलों की वास्तव में सुरक्षा करते हैं वो एक ही पद से रिटायर हो जाते हैं. ये भेदभाव पूरे भारत में सिर्फ़ उत्तराखंड में ही है."

एक फ़ॉरेस्ट गार्ड पर पाँच से 20 किलोमीटर जंगल की अकेले सुरक्षा करने का दारोमदार होता है. उनकी मांग बेहतर उपकरणों, प्रशिक्षण और साधन को लेकर भी है.

इस हड़ताल और तालाबंदी से उत्तराखंड में जंगल की आग पर क़ाबू करना और भी मुश्किल होता जा रहा है. मसूरी के मशहूर कैमल बैक इलाक़े के जंगलों में भी आग लग गई है और प्रदेश में कुल मिलाकर अब तक क़रीब 600 हेक्टेयर से ज़्यादा जंगल जलकर ख़ाक हो चुके हैं.

कॉर्बेट और राजाजी नेशनल पार्क भी इसकी चपेट में हैं. अलमोड़ा से हरिद्वार तक जगह-जगह जंगलों में आग, धुंआ और ग़ुबार के नज़र आ रहे हैं.

आग

Image caption हड़तालियों की मुख्य मांगों में प्रोमोशन भी शामिल है

इस बार उत्तराखंड के पहाड़ी इलाक़ों सहित देहरादून और हरिद्वार जैसे तराई के इलाकों में असाधाराण गर्मी पड़ रही है जो कि पिछले 40-50 सालों में एक रिकॉर्ड है.

वन अधिकारियों का मानना है कि आग लगने की इतनी ज़्यादा घटनाओं का कारण भी यही है. कुल मिलाकर गर्मी और आग दोनों ही एक दूसरे के लिये घी का काम कर रहे हैं.

दरअसल जंगल में जहाँ आग लगती है उसे बुझाने का काम और ज़िम्मेदारी फ़ॉरेस्ट गार्ड की होती है. और वे ये काम बेहद मुश्किल हालात में करते हैं.

बागेश्वर में फ़ॉरेस्ट गार्ड दामोदर जोशी ने कहा, "अधिकारी तो एसी कमरों में बैठकर नीति बना देते हैं कि दो-तीन लोग आग बुझाने जाएंगे लेकिन कई बार हमें अकेले जाना होता है. दुर्गम रास्ते होते हैं और हमारी जान पर बन आती है. हम टहनियाँ तोड़कर उन्हें आग पर पटकते हैं और इसमें कई बार ख़ुद ही चपेट में आ जाते हैं.”

याद रहे कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने भी एक रिपोर्ट में वनरक्षकों के काम के हालात पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है कि पुराने उपकरणों और सीमित साधनों से वो जंगल की रक्षा और बाघों को बचाने का काम कैसे कर पाएंगे.

जंगल की ये आग सिर्फ़ पेड़ और घास-फूस ही नहीं जलाती बल्कि इससे पूरी पारिस्थितिकी और जैव-विविधता को भी खतरा हो जाता है. वन्य जीव और छोटे-छोटे जीव-जंतु नष्ट हो जाते हैं और उन्हें दोबारा पनपने में काफ़ी वक़्त लग जाता है.

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