नहीं मांग सकते भीख

भीख मांगने पर पाबंदी
Image caption राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के चलते दिल्ली की सड़कों से भीख मांगने वालों को हटाया जा रहा है

दिल्ली सरकार की एक मुहिम के तहत सड़कों से भीख मांगने वालों को हटाया जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि अक्टूबर में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के लिए दिल्ली को एक साफ़, स्वच्छ और चमकते-दमकते शहर में प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है.

बीबीसी की टीम ने एक दोपहर दिल्ली पुलिस के कुछ ऐसे अफ़सरों के साथ गुज़ारी जो सड़कों पर भीख मांगने वालों की खोज में थे. एक गाड़ी में सवार होकर हम पश्चिम दिल्ली की ओर निकल पड़े.

कुछ देर भटकने के बाद आख़िर पुलिस को जिनकी तलाश थी, दो ऐसे लोग मिल ही गए. उन्हें भीख मांगने के इल्ज़ाम पर गिरफ़्तार कर लिया गया. फिर उन्हें एक गाड़ी में बिठाया गया और उनकी गिरफ़्तारी की कागज़ी कार्रवाई पूरी की गई.

मैंने दोनों लोगों से बातचीत की. उज्जैन से आए प्रेमचंद ने मुझे बताया कि दिल्ली में उनका सामान चोरी हो गया. भीख न मांगते तो क्या करते.

उनके साथ गिरफ़्तार किए गए राजू नाथ ने भी अपनी गिरफ़्तारी का विरोध किया.

आख़िर प्रेम चंद और राजू नाथ - दोनों को उत्तर दिल्ली में बसे एक भिक्षु गृह में ले जाया गया जहां पहले एक डॉक्टर इनसे उनकी सेहत के बारे में पूछताछ की और बाद में दोनों को कोर्ट के सामने पेश किया गया.

बाद में हमें पता चला कि प्रेम चंद को तो छोड़ दिया गया लेकिन राजू नाथ इतने भाग्यशाली नहीं निकले. उन्हें एक साल की सज़ा सुनाई गई और एक भिक्षु गृह भेज दिया गया.

राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी

दिल्ली की सड़कों पर क़रीब 60,000 भीख मांगने वाले हैं. पुलिस के 13 ऐसे दल बनाए गए हैं जो भीख मांगने वालों को पकड़कर कोर्ट के सामने पेश करते हैं. कुछ को चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है तो कुछ को सज़ा सुनाई जाती है जिसके तहत उन्हें भिक्षुगृह भेज दिया जाता है.

मैं दिल्ली के समाज कल्याण मंत्री मंगत राम सिंघल से मिली जिन्होंने बताया कि वो दिल्ली से सभी भिखारियों को हटा देना चाहते हैं.

मंगत राम सिंघल ने कहा, "हमारी ये मुहिम सिर्फ़ राष्ट्रमंडल खेलों के लिए ही नहीं है. हम तो पहले भी ऐसा करते थे और करते रहेंगे."

"राष्ट्रमंडल खेलों के लिए हमारे शहर में बहुत मेहमान आएंगे. कितना बुरा लगेगा अगर भीख मांगने वाले उन्हें तंग करें."

"हम इन्हें पकड़कर पहले इनकी डॉक्टरी जांच करवाते हैं फिर ये कोर्ट के सामने पेश होतें हैं. जिन्हें सज़ा मिलती है उन्हें हम भिक्षुगृह भेज देते हैं. हमने इन सब के लिए 11 भिक्षुगृह बनाए हैं जिनमें तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं."

भारतीय परंपरा

भारतीय परंपरा में भिक्षा देना पुण्य का काम माना जाता है. शायद इसी वजह से ग़ैरक़ानूनी होने के बावजूद भीख मांगना एक आम बात है.

लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी पर इतना ज़ोर है कि सरकार ने मंदिरों और गुरुद्वारों जैसी धार्मिक जगहों से भी कहा है कि वो अपने परिसर में भीख मांगने पर प्रतिबंध लगाएं. दिल्ली के बाहर से आए भिखारियों को उनके राज्य वापस भेजने की भी योजना है.

ये पहली बार है कि दिल्ली में 1982 में हुए एशियाई खेलों के बाद कोई इतनी बड़ी खेल प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है - और सरकार इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती.

लेकिन कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार के इस क़दम पर कड़ी आपत्ति जताई है.

इनमें से एक हैं हर्ष मंडर जो कि एक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में एक जन हित याचिका दर्ज की है कि भीख मांगने वालों को अपराधी न माना जाए.

हर्ष मंडर कहते हैं, "मौजूदा क़ानून, जो कि भीख मांगने को अपराध मानता है, अंग्रेज़ों के ज़माने के एक क़ानून की नकल है. इसमें ये मान लिया गया है कि ग़रीब अपनी ग़रीबी के लिए ख़ुद ही ज़िम्मेदार है, सरकार या समाज नहीं."

उनका कहना है, "किसी भीख मांगने वाले को अपराधी मानने से पहले क्या हमने उसे कुछ और करने का मौक़ा दिया है. ये सरकार और समाज का दायित्व है कि वो उनकी मदद करें."

सरकार भीख मांगने वालों को विदेशी मेहमानों की नज़र से तो दूर कर सकती है, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या वो इनकी ज़िंदगी से ग़रीबी दूर कर सकती है? - या उन हालात को दूर कर सकती है जो लोगों को भीख मांगने पर मजबूर करते हैं?

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