माओवादियों ने माना: सुरक्षाबलों से सहयोग

  • 1 मई 2010
माओवादी
Image caption माओवादी प्रवक्ता ने माना कि सुरक्षाकर्मियों से उनके संगठन को पूर्व में कुछ सहयोग मिला है

उत्तर प्रदेश पुलिस ने छापे मारकर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के छह जवानों को गिरफ़्तार किया है और उनसे असलहा बरामद किया है. ये भी कहा गया है कि ये असलहा माओवादियों या नक्सलियों के लिए हो सकता है.

बीबीसी संवाददाता अतुल संगर ने सीपीआई (माओवादी) के दंडकारण्य स्पेशल ज़ोनल कमेटी के प्रवक्ता गुड़सा उसेंडी से इस संदर्भ में बातचीत की है. पेश है बातचीत के मुख्य अंश:

सुरक्षाकर्मियों से हथियार-असलाहा मिलने की रिपोर्टों के बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

हम अपने हथियार और गोला-बारूद मुख्य रूप से पुलिस और अर्धसैनिक बलों पर हमलों के ज़रिए हासिल करते हैं और यही हमारा अहम स्रोत है. ये सही है कि हम कुछ हथियार अलग-अलग लोगों से भी ख़रीदते हैं लेकिन ये कहना मुश्किल कि कब कहाँ से ख़रीदा होगा – या फिर सीआरपीएफ़, ग्रे हाउंड या कोबरा कमांडो ने दिया होगा.

क्या नियमित तौर पर गोला-बारूद की सुरक्षाकर्मी कोई सप्लाई देते हैं?

नहीं, जैसे मैंने कहा, हथियारों और असलहे का मुख्यत: स्रोत तथाकथित सुरक्षाबलों पर हमारे हमले हैं. दंतेवाड़ा के हमले में हमने 75 हथियार और गोलियाँ हासिल की थी. कम संख्या में हथियार और गोला-बारूद हमें और लोगों से भी मिलता है. जिस तरह से व्यापारी से ख़रीद की जाती है वैसे ही हम असलहा-बारूद ख़रीदते हैं.

देखिए इस संदर्भ में प्रशासन में छोटे स्तर काम कर रहे जवान, पुलिकर्मियों, अधिकारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है और उन्हें देशद्रोही के रूप में पेश किया जा रहा है. असली देशद्रोहियों और घोटाले करने वालों को तो कुछ कहा ही नहीं जा रहा है.

क्या सुरक्षा बलों में आपके समर्थक हैं? ऐसी ख़बरें हैं कि माओवादी पुलिस और अन्य सुरक्षाबलों में घुसपैठ करने के प्रयास में हैं.

घुसना क्या? ये तो हमारा कर्तव्य है कि पुलिस, अर्धसैनिक बलों, सेना में काम करने वालों पर काम करें, क्रांति के लिए उनमें समर्थक बनाएँ. क्योंकि वो लोग भी ग़रीब परिवारों से हैं और मज़दूर-किसान के बेटे हैं.

कितना सहयोग-समर्थन आपको मिला है सुरक्षाकर्मियों से?

संख्या तो नहीं बता सकता लेकिन अलग-अलग लोग अलग-अलग तरह से सहयोग समर्थन देते हैं. दंडकारण्य के बारे में बता सकता हूँ - कुछ पुलिस जवान और एसपीओ थानों से फ़रार होकर गोला-बारूद और हथियार के साथ हमारे साथ मिले थे.

इक्के-दुक्के ही सही कुछ लोगों ने तो हमें हथियार और गोलियाँ भी दी हैं.

माओवादी संगठन की आगे क्या रणनीति है?

ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद होना चाहिए. निर्दोष लोगों को निशाना बनाना बंद होना चाहिए. ये दमन का सिलसिला बंद हुआ तो दंतेवाड़ा जैसी कार्रवाई करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी..हमने हथियार इसलिए नहीं उठाया कि कोई बातचीत का न्योता लेकर आए और हम हथियार डाल दें.

आपने लोगों तक अपनी बात पहुँचाने, अपनी विचारधारा के प्रति संवेदनशीलता बनाने की बात कही है. क्या सशस्त्र आंदोलन छोड़ अन्य ज़रिए से लोगों को प्रभावित नहीं किया जा सकता?

हमने हथियार किन हालात में कब उठाया ये समझना ज़रूरी है. पहले हथियार का इस्तेमाल सरकार ने जनता पर किया और हमने उसके बाद ही हथियार उठाया. नक्सलबारी के समय तो लोग तीर-धनुष लेकर ही निकल पड़े थे रैली निकालने के लिए…

नक्सली नेता चारू मौजूमदार तो कहते थे कि जनता में व्यापक तौर पर जागरूकता यानी जनांदोलन को सशस्त्र आंदोलन से अलग नहीं किया जा सकता.

हम भी यही कहते हैं. हमने जो आंदोलन खड़ा किया उसका आधार ही जनता है. दंडाकारण्य में आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया था जिसमें 24 हज़ार लोगों ने भाग लिया. इतने थाने खोलने के बावजूद भी बड़ी संख्या में लोग हमारे कार्यक्रमों में भाग लेते हैं.

लेकिन यदि सरकार को दमनकारी नीतियों पर ही चलना चाहती है और जुलूस, रैलियों और जनसभाओं पर पाबंदियाँ लगाती है, जनसंगठनों पर प्रतिबंध लगाती है तो बाहर बैठे लोगों को हमारे आंदोलन का केवल सशस्त्र प्रतिरोध का रूप ही दिखता है.

जो हम जनांदोलन कर रहे हैं उसकी रिपोर्टिंग नहीं होती है. दस फ़रवरी को भूमकाल दिवस मनाया गया. कई जगह सभाएँ हुई और हर जगह दस-दस हज़ार लोगों ने भाग लिया. ये कहना कि सशस्त्र संघर्ष अलग और जनांदोलन अलग चल रहे हैं सही नहीं होगा.

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