दईमारी के लिए वकील नहीं

Image caption 2008 में हुए धमाकों में 87 लोग मारे गए थे.

चरमपंथी अजमल कसाब के मामले की पैरवी के लिए भारत में वकील मिल गया, लेकिन असम के एक चरमपंथी नेता उतने भाग्यशाली नहीं हैं.

नैशनल डेमोक्रैटिक फ़्रंट ऑफ़ बोडोलैंड के नेता रंजन दईमारी पर आरोप है कि उन्होंने 30 अक्तूबर, 2008 को असम में लगातार कई बम धमाके करवाए जिसमें 87 लोग मारे गए.

अब असम बार एसोसिएशन ने कह दिया है कि कोई वकील रंजन दईमारी का केस नहीं लेगा.

दईमारी को इस रविवार एक निचली अदालत में पेश किया गया जहाँ उन्हें 12 दिनों के पुलिस रिमांड में भेज दिया गया है.

दईमारी को पिछले हफ़्ते बांग्लादेशी सुरक्षाबलों ने गिरफ़्तार किया और शनिवार को भारतीय सीमा सुरक्षा बल को सौंप दिया था.

असम बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अमिताभ ठाकुरिया का कहना है कि उनके कई सहकर्मी और कोर्ट कर्मचारी रंजन दईमारी के आदेश पर किए गए बम हमलों में मारे गए थे.

उनका कहना है, “उस हिंसा के ख़िलाफ़ हम सबने एक प्रस्ताव पारित किया है कि हममें से कोई भी इन अभियुक्तों की पैरवी नहीं करेगा. हमारे सभी सदस्यों ने इस फ़ैसले का अनुमोदन किया है.”

भेदभाव का आरोप

दईमारी की बहन अंजली, जो बोडो महिला न्याय मंच की अगवाई करती हैं, ने आरोप लगाया है कि बार एसोसिएशन बोडो जनजाति के लिए घृणा के कारण ये फ़ैसला कर रहा है.

वकीलों ने इस आरोप का खंडन किया है.

अंजली दईमारी का कहना है चरमपंथी गुट अल्फ़ा ने पिछले दशक में अनगिनत बम धमाके करवाए हैं जिसमें बच्चों के एक स्कूल में किया गया धमाका भी शामिल है.

उनका कहना है, “इन धमाकों में अनगिनत बेगुनाह लोग मारे गए हैं लेकिन अभी तक किसी वकील ने नहीं कहा है कि वो उनकी पैरवी नहीं करेंगे.”

उनका कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया के तहत ये साबित होना बाकी है कि ये रंजन दईमारी का काम था या नहीं और इसलिए उनकी भी उचित सुनवाई होनी चाहिए.

इस बीच असम के अख़बार और टीवी चैनल दईमारी के लिए कड़ी सज़ा की मांग कर रहे हैं.

एक चैनल ने तो उन्हें “असम का कसाब” का नाम भी दे दिया है.

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