बिहार: कांग्रेस नेताओं की आपसी भिडंत

जगदीश टाइटलर

बिहार में कांग्रेसी नेताओं की आपसी कलह को लेकर कहा जा रहा है कि अगर मौजूदा वाकयुद्ध जल्दी नहीं रोका गया तो मल्लयुद्ध शुरू हो जाएगा.

एक तरफ जगदीश टायटलर ने मोर्चा संभाल रखा है तो दूसरी ओर उनके मुकाबले अनिल कुमार शर्मा का जत्था ताल ठोंक रहा है.

टायटलर बिहार में पार्टी प्रभारी हैं और अनिल शर्मा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष है.

इन दोनो के बीच दो महीने पूर्व तक एकजुटता देखी जा रही थी. लेकिन अब इनमें एक-दूसरे के प्रति घोर कटुता सरेआम ज़ाहिर हो रही है.

मोटे तौर पर इसकी वजह बने हैं तीन पूर्व सांसद: पप्पू यादव, उनकी पत्नी रंजीता रंजन और साधू यादव.

अनिल शर्मा का खेमा इन तीनों को विवादास्पद छवि वाले दलबदलू बताकर इनसे कांग्रेस का नया बना रिश्ता ख़त्म करना चाहता है.

इस खेमे का आरोप है कि जगदीश टायटलर रंजीता रंजन से अपने अच्छे सम्बन्धों के कारण पप्पू यादव जैसे व्यक्ति का वज़न बिहार कांग्रेस में बढ़ाना चाहते हैं.

लालू प्रसाद के संबंधी साधू यादव के बारे में भी इस खेमे की यही आपत्ति है.

महिमामंडित कराने वाले

Image caption प्रदेश अध्यक्ष अनिल शर्मा के ख़िलाफ़ टाइटलर के समर्थक खुलकर सामने आ गए है.

लेकिन बिहार कांग्रेस का टायटलर-समर्थक गुट पलटवार करने से नहीं चूकता. वह याद दिलाता है कि पप्पू यादव और साधू यादव को धूमधाम के साथ कांग्रेस में लाने और मंच पर महिमामंडित कराने वालों में अनिल शर्मा सबसे आगे थे.

जो भी हो, पार्टी मामले के प्रदेश प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष के बीच खटपट या खटास बहुत बढ़ गई है.

प्रेक्षक मानते हैं कि बिहार में खोया हुआ जनाधार फिर से हासिल कर पाने संबंधी कांग्रेसी प्रयासों में जो नयी ताक़त दिख रही थी, वो अब उसके अंतर्कलह में बरबाद हो रही है.

अनिल शर्मा से जब इस बाबत बीबीसी की बातचीत हुई तो उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा, "मैं बिहार कांग्रेस में राहुल-ब्रांड राजनीति का पक्षधर हूँ, पप्पू-ब्रांड राजनीति का नहीं."

उन्होंने कहा, "यहाँ पार्टी के जो गिने हुए सात नेता कभी लालू तो कभी नीतीश के झंडाबरदार रहे हैं, और जो खुद शिथिल रहकर पार्टी को भी यहाँ जड़ता में डाल चुके थे, वो फिर से अपने कथित वरिष्ठ होने के बूते प्रदेश अध्यक्ष पद हथियाने की कोशिश में हैं."

अनिल शर्मा कुछ और तल्ख़ी से बोले, "सोनिया जी और राहुल जी से भी ज़्यादा पप्पू यादव को बिहार में वोट दिलाने वाला असरदार नेता बताने वाले भाषण सुनकर टायटलर साहब चुप रह गये लेकिन मैं चुप नहीं रह सका."

उधर इस बाबत जगदीश टायटलर से जब भी पूछा गया तो वो सीधे कुछ बोलने से बचते रहे.

लेकिन अनिल शर्मा खेमे को औकात बताने या अनुशासन में रहने के तमाम संकेत उन्होंने इस बीच बार-बार दिए.

हाल ही उन्होंने राज्य में पार्टी प्रभारी की हैसियत से जो बैठक बुलाई, उसमें दल के ऐसे तमाम वरिष्ठ नेता शरीक हुए जो अनिल शर्मा का नेतृत्व स्वीकारने को कतई तैयार नहीं हैं.

जगदीश टायटलर पहले तो अनिल शर्मा को प्रदेश कांग्रेस में सब के लिए स्वीकार्य बनाने की कोशिश करते रहे, लेकिन अब उनकी भूमिका ठीक उसके उलट हो गयी है.

अनिल समर्थक तीन प्रमुख नेताओं को कारण बताओ नोटिस दिए जाने से ये संकेत मिला है कि कांग्रेस आलाकमान अनिल शर्मा को हटाने का मन बना रहा है.

औकात बताने की राजनीति

टायटलर के मुखर समर्थक और पार्टी के प्रदेश महासचिव प्रेम चन्द्र मिश्र ने बीबीसी से कहा, "टायटलर साहब ने जिस सूझबूझ के साथ यहाँ पार्टी में सबको साथ लेकर चलने की रणनीति बनाई, उस पर कौन पानी फेरना चाह रहा है सोनिया जी और राहुल जी अच्छी तरह जान रहे होंगे. अनिल शर्मा जिस पप्पू-ब्रांड राजनीति के ख़िलाफ़ में अब बोल रहे हैं, पहले वो उसी ब्रांड के फायदे गिनाते नहीं थकते थे."

ये तो अब कांग्रेसी हल्क़े में भी खुलकर चर्चा हो रही है कि जगदीश टायटलर या अनिल शर्मा में से किसी एक को जल्दी ही पद छोड़ना पड़ सकता है.

वैसे अनिल शर्मा ने बीबीसी से बातचीत के दौरान ये साफ़ कहा कि संकेत मिलते ही वो तुरंत पद त्याग कर कांग्रेस के साधारण कार्यकर्त्ता वाली भूमिका में आ जायेंगे.

ये भी हो सकता है कि अब पार्टी नेतृत्व बिहार में अल्पसंख्यक या दलित समुदाय में से अपने किसी प्रमुख नेता को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दे.

ऐसी सम्भावना इसलिए बढ़ गयी है क्योंकि यहाँ सत्ताधारी गठबंधन के दोनों दल, भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यू) ने अगड़ी जाति (भूमिहार) से सम्बंधित व्यक्ति को अपने दल का प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है. अनिल शर्मा भी इसी जाति के हैं.

जो भी हो, अनिल शर्मा ने राज्य भर में घूम-घूम कर जिस तरह यहाँ मृतप्राय कांग्रेस को जीवंत या गतिशील बनाने के प्रयास में कड़ी मेहनत की, उसकी सराहना उनके विरोधी भी करते हैं.

लेकिन उनमें नेतृत्व-क्षमता या गंभीरता का अभाव बताकर उनके ख़िलाफ़ बोलने वाले कांग्रेसी भी यहाँ बहुत हैं.

आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बेहतर संभावनाओं का अनुमान लगा रहे प्रेक्षक अब पार्टी के अंदर नेताओं के बढ़ते झगड़ों को देखकर अपने विश्लेषण को सुधारने में लगे हैं.

इस स्थिति को राष्ट्रीय जनता दल ही नहीं, भाजपा और जदयू के नेता भी अपने अनुकूल समझ रहे हैं.

लेकिन सवाल ये है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व बिहार में अपने संगठन का संकट ठीक से समझ पा रहा है या नहीं?

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