बरी होने के बाद भी सताती है पुलिस

  • 8 मई 2010
हैदराबाद की मक्का मस्जिद के बाहर विस्फोट के बाद का दृश्य

केंद्रीय जाँच ब्यूरो का दावा है कि अजमेर की दरगाह में बम विस्फोट के संबंध में गिरफ़्तार किए गए हिन्दू चरमपंथी देवेंदर गुप्ता और उस के साथियों का हाथ हैदराबाद के मक्का मस्जिद में विस्फोट में भी था.

इस संबंध में सीबीआई ने गुप्ता और अन्य व्यक्तियों से पूछताछ भी की है जिन्हें राजस्थान पुलिस ने ग़िरफ़्तार किया है.

लेकिन हैदराबाद पुलिस अब भी उन स्थानीय मुस्लिम युवाओं को ही शक की नज़र से देख रही है जिन्हें 18 मई, 2007 को मक्का मस्जिद में विस्फोट के बाद ग़िरफ़्तार किया गया था.

इस विस्फोट के बाद पुलिस ने सौ से भी ज़्यादा स्थानीय युवकों को हिरासत में लिया था. उनका आरोप है कि अपराध स्वीकार करने के लिए उन्हें कड़ी यातनाएँ भी दी गई थीं.

इनमें से 74 युवकों को बाद में पुलिस ने छोड़ दिया था और 26 के विरुद्ध साज़िश का मामला दर्ज कर लिया था. इन युवकों को लगभग एक वर्ष जेल में रहना पड़ा था. बाद में एक स्थानीय अदालत ने उन्हें निर्दोष बताते हुए बाइज्ज़त बरी कर दिया था.

'पुलिस तंग करती है'

लेकिन अब इन युवकों का कहना है कि पुलिस उनका पीछा नहीं छोड़ रही है जिसके चलते उनका जीवन सामान्य नहीं हो पा रहा है.

इन में से एक डॉ. इब्राहीम जुनैद ने बीबीसी से कहा कि पुलिस के दबाव के कारण उन्हें दो अस्पतालों में नौकरी छोड़नी पड़ी है.

डॉ जुनैद का कहना था, "मुझ जैसे जितने युवकों को पकड़ा गया उन सबका रोज़गार छिन गया और अब जेल से बाहर आने के बाद कोई नौकरी देने के लिए तैयार नहीं है. हम अपने जीवन को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन जब हम कहीं नौकरी भी करते हैं तो पुलिस को पता नहीं क्यों ये बात पसंद नहीं आती." ऐसे ही एक और युवा मोहम्मद रईस हैं जो गिरफ़्तारी से पहले एक दुकान में काम करते थे. जेल से छूटने के बाद उन्हें किसी ने काम नहीं दिया. एक सामाजिक संगठन "निसा" की सहायता से वो एक दुकान में काम करने लगे लेकिन वहां भी बार-बार पुलिस आती है और रईस से सवाल करती है.

रईस का कहना था, "जब भी शहर में कोई गड़बड़ होती है और तो पुलिस वाले सबसे पहले मेरी दुकान और घर पर आते हैं और पूछते हैं कि मैं कहाँ हूँ, देश में हूँ या बाहर चला गया हूँ."

पुनर्वास

हम ऐसे युवाओं के घर जाते हैं, उन्हें दिलासा देने की कोशिश करते हैं ताकि उन्हें लगे कि उनके साथ भी कोई है. लतीफ़ मोहम्मद ख़ान, सिविल लिब्रटीज़ मॉनिटरिंग कमेटी के सचिव

सिविल लिबर्टीज़ मॉनिटरिंग कमेटी के सचिव लतीफ़ मोहम्मद ख़ान का कहना है कि उनका संगठन और उसका महिला विभाग 'निसा' ऐसे युवाओं के पुनर्वास की कोशिश कर रहा है. उनका कहना है, "हम ऐसे युवाओं के घर जाते हैं, उन्हें दिलासा देने की कोशिश करते हैं ताकि उन्हें लगे कि उनके साथ भी कोई है." उनका कहना है कि पुलिस का व्यवहार इस हद तक ख़राब रहा है कि जब हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इन में से कुछ युवकों को बैंकों से ऋण दिलाने की कोशिश की तो पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों के लोगों ने वहां भी उसका विरोध किया. पुलिस की इन गतिविधियों के ख़िलाफ़ युवकों के परिवारों और कुछ मुस्लिम संगठनों ने हैदराबाद के पुलिस आयुक्त एके ख़ान से शिकायत की है.

ख़ान ने उन्हें आश्वासन दिया कि अगर उनके मातहत आने वाला कोई पुलिस कर्मी इन युवाओं के घर जाता है और उन्हें परेशान करता है तो वो उसके विरुद्ध कार्रवाई करेंगे.

उन्होंने कहा है कि वो इन युवाओं को ये सर्टिफिकेट देने के लिए तैयार हैं कि वो निर्दोष हैं और उनका आपराधिक रिकार्ड नहीं है.

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