बीबीसी हिंदी की जन्म कथा

बीबीसी हिंदी सेवा के कुछ सहयोगी
Image caption बाएँ से खड़े हुए--गोपाल भनोट, पुरुषोत्तम लाल पाहवा, रत्नाकर भारतीय, मार्क टली, गौरीशंकर जोशी, आले हसन. बाएँ से बैठे हुए--हिमांशु कुमार, सुषमा दत्ता, ओंकारनाथ श्रीवास्तव

नौ मई 1940. डेली टेलीग्राफ़ में एक छोटी सी ख़बर छपी जिसका शीर्षक था-

‘बीबीसी की नीति में बदलाव-बीबीसी अब हिंदुस्तानी में प्रसारण करेगी.’

ख़बर में बताया गया कि इस नई दैनिक सेवा का प्रसारण शॉर्टवेव पर जल्द ही शुरू होगा. ख़बर यह भी थी कि लॉयनल फ़ील्डिंग, जो 1935 में बीबीसी छोड़कर इंडियन गवरमेंट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस के पहले कंट्रोलर बने थे, हाल में ऑल इंडिया रेडियो से त्यागपत्र देकर वापस ब्रॉडकास्टिंग हाऊस पहुँच गए हैं.’

लेकिन लॉयनल फ़ील्डिंग ने लंदन जाने से कई महीने पहले, 25 दिसंबर 1939 के दिन एक महत्वपूर्ण पत्र लिखा था. यह पत्र ऑल इंडिया रेडियो के बंबई स्टेशन में ज़ेड. ए. बुख़ारी के हाथ पहुँचा. ‘माई डियर बुख़ारी’- संबोधन में एक तरह की अनौपचारिकता थी. इसकी एक वजह यह थी कि अपने छात्र जीवन के तुरंत बाद बुख़ारी ब्रिटिश अधिकारियों को भारतीय भाषाएँ सिखाने वाले विभाग में उर्दू के ‘मुंशी’ हो गए थे और उस ज़माने में उनके छात्रों में से एक लॉयनल फ़ील्डन भी थे.

फ़ील्डन ने लिखा- ‘अब जब आपने सूचना मंत्रालय का ऑफर स्वीकार कर लिया है, मैं आपको पिछले दो सालों में बंबई स्टेशन का काम इतने सुचारू रूप से संभालने के लिए बधाई देना चाहूँगा. बंबई ही क्यों, 1935 से अब तक आपने इस सेवा के लिए जो कुछ किया है वह प्रशंसा के योग्य है. आपको अपने नए काम में भी सफलता मिले, इसके लिए मेरी शुभकामनाएँ.’

बुख़ारी साहब को इस समय शुभकामनाओं की ज़रूरत भी थी हालाँकि चुनौतियों का मुक़ाबला करने में उन्हें मज़ा भी आता था. दो साल पहले जब उन्हें बंबई स्टेशन भेजा गया था तो शायद किसी को उम्मीद नहीं थी कि वे मतभेदों और निष्क्रियता की वजह से गिरती साख़ वाले इस केंद्र को सुधार पाएँगे. मगर उन्होंने यह भी कर दिखाया.

एक बड़ी चुनौती

इससे पहले वे ऑल इंडिया रेडियो के दिल्ली केंद्र पर प्रोग्राम निदशक की हैसियत से अपनी योग्यता का परिचय दे चुके थे. और अब उनके सामने चुनौती थी. 19 जनवरी 1940 को बीबीसी की बोर्ड मीटिंग के बाद आधे घंटे का हिंदुस्तानी प्रसारण शुरू करने का फ़ैसला हुआ जिसकी ज़िम्मेदारी ज़ेड.ए. बुख़ारी को सौंपी गई.

Image caption लंदन आने वाले बीबीसी बुश हाउज़ देखना नहीं भूलते

बुख़ारी दिल ही दिल में जानते थे कि ‘ये आग का दरिया है और डूब के जाना है’. बीबीसी के पहले ‘प्रमुख हिंदुस्तानी सलाहकार’ के रूप में उन्हें कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ेगी. लेकिन उनके पास दो मज़बूत हथियार थे- निडर मगर कूटनीतिक तरीक़े से अपने विचार व्यक्त करने की हिम्मत और अँग्रेज़ी ज़बान की लच्छेदारी.

‘एक भारतीय होने के नाते अगर मैं यह कहूँ कि मेरे विचार में भारत का भी कुछ महत्व है तो उम्मीद है आप मुझे मुआफ़ करेंगे. पर मैं समझता हूँ कि प्रचार के हर इदारे में अब तक इस महत्ता की उपेक्षा की गई लगती है. भारत न सिर्फ़ ब्रिटिश साम्राज्य में सबसे बड़ी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि साम्राज्य में सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह भी बना हुआ है.

न सिर्फ़ बर्लिन, बल्कि रोम और टोक्यो भी भारत के लिए हिंदी और अँग्रेज़ी में दैनिक प्रसारण का महत्व समझते हैं. बीबीसी आज तक मोटे तौर पर अपने अधिकारियों की भेजी रिपोर्टों से दिशा निर्देश पाती रही है.’ ये शब्द बुख़ारी साहब ने 12 अक्तूबर 1940 के अपने एक ख़त में लिखे जिसका उद्देश्य लंदन स्थित ब्रॉडकास्टिंग हाऊस में बैठे अफ़सरों को यह समझाना था कि भारतीय श्रोता के मन और ज़रूरतों को समझने के लिए परंपरागत ख़ुफ़िया एजंसियों से अलग, एक स्वतंत्र श्रोता अनुसंधान विभाग स्थापित करने की ज़रूरत क्यों है.

इस काम के लिए उन्होंने तीन हज़ार पाऊँड के ख़र्चे का प्रस्ताव रखा था. ‘मैं इस तकलीफ़देह तथ्य से भी अवगत हूं कि इंगलैंड के पास भारत के नाम पर देने के लिए और सब कुछ है सिवाय पैसे के.’ यह कटाक्ष उन्होंने अपने एक और मेमो में किया.

इसमें कोई शक नहीं कि बीबीसी हिंदुस्तानी सर्विस का जन्म इस उद्देश्य से हुआ था कि विश्वयुद्ध में ब्रिटेन के पक्ष का प्रचार किया जाए. उस युद्ध में ब्रितानी फ़ौजों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाले असंख्य भारतीय सैनिक थे. उनकी हौसला अफ़ज़ाई भी ज़रूरी थी.

आज़ादी का इंतज़ार

फिर यह वह समय था जब भारत में लोगों ने आज़ादी की घड़ी के दिन गिनना शुरू कर दिया था. जर्मनी, जापान और ब्रिटेन में से कौन बड़ा दुश्मन है- इस प्रश्न पर मत विभाजित था. 22 अप्रैल 1940 को लायनल फ़ील्डिंग ने अपने मेमो में कहा-

‘मैं चाहता हूँ कि बीबीसी का हिंदुस्तानी प्रोग्राम ग्रीनिच मान समय के हिसाब से दो बजे शुरू (भारत में शाम साढ़े सात बजे) हो पर हर हालत में ढाई बजे तक ख़त्म हो जाए क्योंकि जर्मनी के हिंदुस्तानी प्रसारण ढाई बजे शुरू होता है. अगर हमारे प्रसारण और जर्मन प्रसारण के बीच ख़ाली वक्त बचेगा तो जर्मनी को हमारे प्रसारण पर फ़ालतू की टीका टिप्पणी करने का मौक़ा मिल जाएगा.’

बुख़ारी साहब किसी मुग़ालते में नहीं थे. उन्हें अच्छी तरह पता था कि इस सेवा का उद्देश्य जर्मन प्रॉपेगैंडा का मुँहतोड़ जवाब देना है. लेकिन प्रचार के भी कुछ उसूल होते हैं. प्रॉपेगैंडा के बारे में उन्होंने लिखा-

‘प्रॉपेगैंडा मूल रूप से एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जो डर, लालच, नफ़रत, महत्वाकाँक्षा जैसी भावनाओं के साथ खेलती है. अगर हम जनमत को बदलना चाहते हैं तो हमें सावधानी बरतते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारा संदेश उन लोगों के उपयुक्त हो जिन तक हम उसे पहुँचाना चाहते हैं. इस वक़्त एक आम भारतीय को लगता है कि इस लड़ाई से उसका कोई मतलब नहीं है, उसे यह भी लगता है कि ब्रिटन इस समय कमज़ोर है और भारतीयों में यह भावना प्रबल है कि भारत को स्वाधीन होना चाहिए.’

Image caption भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल हिंदी रेडियो के साथ जुड़े रहे और फिर वेबसाइट के लिए कॉलम लिखे

बुख़ारी साहब का तर्क था कि जर्मन प्रॉपेगैंडा ब्रिटन विरोधी भावनाओं को तो भड़काता है लेकिन अभी तक उसका ध्यान इस तरफ़ नहीं गया कि हिटलर की दुनिया में आज़ाद भारत की तस्वीर क्या होगी.

उन्होंने प्रस्ताव रखा कि ख़बरों और जर्मनी की क्रूरता के उदाहरणों के अलावा हिंदुस्तानी कार्यक्रमों में ब्रितानी संस्कृति, कविता और दर्शन की चर्चा के साथ-साथ भारतीयों की उपलब्धियों पर फ़ोकस हो जैसे ब्रिटन में पढ़ने वाले छात्र, 1914-1918 की लड़ाई में ब्रितानी फ़ौज की तरफ़ से लड़ने वाले भारतीय सिपाहियों की तारीफ़, लड़ाई के बाद विकसित होने वाले भारतीय उद्योगों की चर्चा, जाने माने भारतीयों की तारीफ़ वग़ैरह.

प्रचार हो पर नफ़ासत से

सूची काफ़ी लंबी थी जिसे पढ़कर साफ़ साफ़ समझ आता है कि बुख़ारी भारतीय मानस और ब्रिटिश हुकूमत के इरादों, दोनों को अच्छी तरह समझते थे. इसलिए वे चाहते थे कि प्रचार हो तो ज़रा नफ़ासत से हो. भौंडा ना हो.

एक नोट में उन्होंने कहा- ‘और हमें ब्रिटिश साम्राज्य में आज़ादी और वैयक्तिक स्वतंत्रता जैसे विचारों का ज़िक्र करने से बचना चाहिए क्योंकि, यह बात सही है या ग़लत, भारतीय जनता को लगता है कि राजनीतिक आज़ादी या वैयक्तिक स्वतंत्रता उसके हिस्से में नहीं आई है.’

30 मार्च 1940 को बुख़ारी साहब ने हिंदुस्तानी सर्विस की भाषा पर अपने विचार लिख भेजे. हिंदुस्तानी, उनके विचार में उर्दू मिश्रित वो भाषा थी जो भारत का आम आदमी बोलता है. इसलिए यह प्रस्ताव रखा कि जहाँ तक बीबीसी के प्रसारक का सवाल है वह आम आदमी की भाषा में ही बोलेगा. हाँ, मामला वहाँ मुश्किल हो जाएगा जब बाहर के लोगों को वार्ता देने के लिए बुलाया जाएगा.

भारत के तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य की तरफ़ इशारा करते हुए उन्होंने लिखा- ‘भारत की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता (जिसका स्वाभाविक निष्कर्ष है कि भारत में बहुसंख्य का शासन होगा) की संभावनाओं के चलते, बहुसंख्यक हिंदुओं ने अपनी भाषा से अरबी फारसी के शब्दों का तिरस्कार शुरू कर दिया है जो मुसलमानों ने भारत को दिए थे.

दूसरी तरफ़ मुसलमानों ने भी अपनी भाषा में अरबी और फ़ारसी के मुश्किल शब्दों को लाना शुरू कर दिया है. पहले की उर्दू में हम कहते थे- मौसम ख़राब है. लेकिन काँग्रेस और मुस्लिम लीग की आधुनिक भाषा में कहा जाएगा- मौसम की परिस्थितियाँ विपरीत हैं.’

वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए और आलोचना से बचने के लिए बुख़ारी ने सुझाव दिया कि हिंदुस्तानी प्रसारण में दोनों ख़ेमों के लोगों को बराबरी से आमंत्रित किया जाए. लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाए कि संस्कृतनिष्ठ भाषा में लिखी गई वार्ता को हिंदी कहा जाए न कि हिंदुस्तानी. इसी तरह जिसमें अरबी फ़ारसी के भारी शब्द हों, उसे उर्दू की वार्ता कहना बेहतर होगा न कि हिंदुस्तानी की.

शैली की बात

बुख़ारी ने चुटकी लेते हुए लिखा-‘हम बर्नार्ड शॉ से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे अपनी शैली बदल दें. उम्मीद है कि कुछ ऐसे लोग भी हमारे लिए लिखेंगे जिनकी भाषा हिंदुस्तानी होगी, पर ज़ाहिर है वे बर्नार्ड शॉ नहीं होंगे. वे बुख़ारी जैसे लोग होंगे.’

11 मई 1940 को बीबीसी की हिंदुस्तानी सेवा ने दस मिनट के समाचार बुलिटिन के साथ अपना पहला प्रसारण किया. जून 1941 में जाकर हिंदुस्तानी सेवा को आधा घंटा मिला. पर बुख़ारी इतने से संतुष्ट नहीं थे. 22 मई 1941 को उन्होंने बीबीसी के एम्पायर सर्विस निदेशक आर. ए. रैन्डॉल के नाम एक लंबा ख़त लिखा-

‘अगर बीबीसी स्वीकार करती है कि इस युद्ध में भारतीय जनमत की महत्ता है तो उसे मौजूदा हिंदुस्तानी प्रसारण के अलावा भारतीय समय के अनुसार सुबह आठ बजे भी हिंदुस्तानी समाचार शुरू करना चाहिए.’

सुबह आठ बजे का समय तो तब नहीं मिल पाया लेकिन 1943 तक आते-आते हिंदुस्तानी सेवा की एक से ज़्यादा सभाएं हो गई. बुखारी 1945 तक बीबीसी की हिंदुस्तानी सर्विस के संचालक बने रहे और जब तक रहे, प्रसारण का समय बढ़ाने की उनकी कोशिशें जारी रहीं. 1947 में विभाजन के बाद, यही ज़ुल्फ़िकार अली बुख़ारी पाकिस्तान रेडियो के पहले महानिदेशक चुने गए.

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