श्रीनगर में कुत्तों का आतंक

  • 10 मई 2010
कुत्ते का डर
Image caption कश्मीर में कुत्तों के काटने के रोज़ाना पचास मामले सामने आ रहे हैं

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में पिछले कुछ वर्षों से आवारा कुत्तों की संख्या असामान्य रूप से बढ़ गई है.

आजकल श्रीनगर के एसएमएचएस यानी श्री महाराज हरि सिंह अस्पताल में प्रतिदिन सामान्य रूप से कुत्तों के काटने के 50 मामले आते हैं, जिनमें अधिकांश बच्चे होते हैं.

श्रीनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज के सोशल एंड प्रिवेन्टिव मेडिसिन विभाग में तैनात लेक्चरर मोहम्मद सलीम का कहना है कि पिछले साल एसएमएचएस अस्पताल और अन्य कुछ अस्पतालों में कुत्ते के काटने के कम से कम चार हज़ार मामले सामने आए.

उनका कहना है कि इस वर्ष अब तक कुत्ते के काटने से दो व्यक्तियों की मौत हो गई है जबकि पिछले साल तीन लोगों की मृत्यु हो गई थी.

वो कहते हैं कि अगर कुत्तों की आबादी इस तरह बढ़ती रही तो आने वाले दिनों में बहुत ही गंभीर समस्या पैदा हो जाएगी.

श्रीनगर और घाटी के अन्य शहरों में कुत्तों की संख्या कितनी है इस की गणना नहीं हुई है लेकिन लोगों का मानना है कि कुत्तों की संख्या असमान्य रूप से बढ रही है.

कठिनाई

कुत्तों के कारण लोगों, विशेषकर बच्चों और बूढों के लिए राह चलना कठिन हो गया है. 12वीं कक्षा की छात्रा निकहत का कहना है कि वह सुबह-सबेरे ट्यूशन के लिए जाती है और रास्ते में एक साथ कई कुत्तों को देखकर उनकी जान निकल जाती है.

सड़कों पर तो कुत्ते हैं ही लेकिन अब खेल के मैदानों में भी उनका आना-जाना शुरू हो गया है.

जम्मू-कश्मीर में रग्बी के चीफ़ कोच इरफ़ान अज़ीज़ बोटा इन दिनों खेल मैदान में महिला खिलाड़ियों की कोचिंग कर रहे हैं.

वे कहते हैं, "मुझे या मेरे किसी पुरूष सहयोगी को हर दिन सुबह-सबेरे आकर कुत्तों को खेल के मैदान से निकालना पड़ता है, तब जाकर महिला खिलाड़ी मैदान में आती हैं."

वे कहते हैं कि कुछ दिनों पहले खेल के दौरान एक कुत्ते ने मैदान में आकर एक लड़की पर हमला कर दिया, लेकिन सारी टीम ने दौड़ कर उसे बचा लिया.

सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि कश्मीर विश्वविद्यालय के परिसर में भी अब बड़ी संख्या में कुत्ते पाए जाते हैं. ये कैम्पस अपनी सुंदरता के लिए जाना जाता है. लेकिन अब यहाँ विद्यार्थी विशेष कर छात्राएँ लॉन में बैठकर खाना खाने से डरती हैं.

शर्मिंदगी

Image caption कुत्तों को ज़हर देकर मारने की योजना बनाई गई थी लेकिन कई जगह से इसका विरोध किया गया

एक छात्रा शरमीन कहती हैं, "हम जब टिफ़िन खोलते हैं तो कुत्ते सामने नज़र आते हैं और ये डर लगता है कि कहीं ये हमारी टिफ़िन पर झपट न पड़ें."

इनका कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर में कुत्तों का होना आश्चर्यजनक बात है और जब बाहर के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर यहां आते हैं तो कुत्तों के कारण हमें शर्मिंदा होना पड़ता है.

तीन साल पहले एसएमसी (श्रीनगर म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन) ने कुत्तों को ज़हर देकर मार डालने की योजना तैयार की थी लेकिन पशुओं के अधिकार के प्रति सक्रिय कार्यकर्ताओं के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो सका.

श्रीनगर के पूर्व मेयर अब्दुल रशीद पंडित कहते हैं कि मेनका गांधी ने इसपर ज़बरदस्त आपत्ति जताई और ये मामला संसद में भी उठाया गया.

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर पशुओं के अधिकार पर काम करने वाली एक संस्था ने हमें कुत्तों की नसबंदी या बंध्याकरण के आधे ख़र्चे की पेशकश की थी. उन्हें पद से हटे लगभग तीन साल होने को हैं लेकिन अब तक कुत्तों की बढ़ती संख्या को रोकने का कोई उपाय नहीं किया जा सका है.

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