बाबरी मामला: आडवाणी को हाई कोर्ट से राहत

बाबरी मस्जिद (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में भाजपा और कट्टरपंथी हिंदू संगठनों के बीस नेताओं के ख़िलाफ़ मामला चल रहा है

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी समेत भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद , बजरंग दल और शिवसेना के बीस बड़े नेताओं पर बाबरी मस्जिद तोड़ने के मामले में आपराधिक मुकदमा चलाने से जुड़ी पुनरीक्षण याचिका ख़ारिज कर दी है.

इस आदेश से कोर्ट ने इन नेताओं को फ़िलहाल बड़ी राहत दी है चाहे अभी केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील दाख़िल करने का विकल्प खुला है.

न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिंह ने अपने फ़ैसले में कहा कि लखनऊ स्थित सीबीआई अदालत द्वारा चार मई सन 2001 को दिए गए फ़ैसले में हस्तक्षेप की ज़रुरत नहीं है, जिसके द्वारा आडवाणी एवं अन्य अभियुक्तों के खिलाफ़ मुक़दमा चलाने की कार्रवाई बंद कर दी गई थी.

एक मुलज़िम के वकील आईबीसिंह का कहना है कि इस आदेश से आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, बाल ठाकरे, कल्याण सिंह, अशोक सिंघल, विष्णु हरि डालमिया, आचार्य गिरिराज किशोर, विनय कटियार, उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा समेत सभी बीस नेताओं को राहत मिली है. इन पर बाबरी मस्जिद गिराने के षड्यंत्र का मुक़दमा जारी रखने के लिए सीबीआई हाईकोर्ट में अपील में गई थी.

आडवाणी एवं अन्य छह नेताओं के ख़िलाफ़ छह दिसंबर को अयोध्या में भडकाऊ भाषण देने के मामले में रायबरेली की एक अन्य अदालत में दूसरा मुकदमा चल रहा है. हाई कोर्ट के इस आदेश का रायबरेली में चल रहे मुकदमे पर कोई असर नहीं पडेगा.

मुद्दे की पृष्ठभूमि

दरअसल छह दिसंबर को बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद पुलिस ने दो मुकदमे दायर किए थे. एक अपराध संख्या 197 बाबरी मस्जिद तोड़ने , लूटपाट और डकैती के लिए लाखों अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ़ दर्ज हुआ और दूसरा अपराध संख्या 198 आडवाणी, जोशी और अशोक सिंघल के खिलाफ़ राम कथा कुञ्ज मंच से सांप्रदायिक और भडकाऊ भाषण देने के खिलाफ दर्ज हुआ था.

सीबीआई ने पांच अक्तूबर 1993 में दोनों मामलों की संयुक्त चार्जशीट दाख़िल की गई थी. लखनऊ स्थित विशेष अदालत ने इसके आधार पर सभी 49 अभियुक्तों के खिलाफ़ अभियोग लगाकर मुकादमा शुरू कर दिया था.

लेकिन हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगदीश भल्ला ने अभियुक्तों की अपील पर 12 फ़रवरी 2001 को फ़ैसला दिया कि लखनऊ की विशेष अदालत को अपराध संख्या 198 की सुनवाई का काम नहीं दिया गया था. वो मुक़दमा अलग से रायबरेली में चल रहा था. न्यायमूर्ति भल्ला ने कहा था कि राज्य सरकार चाहे तो यह तकनीकी कमी दूर करने के लिए हाईकोर्ट से प्रशासनिक संपर्क करके अदालत के गठन की एक नई अधिसूचना जारी कराए.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी की तत्कालीन राजनाथ सिंह सरकार और फिर भाजपा समर्थित मायावती सरकार ने विशेष अदालत के गठन की नई अधिसूचना जारी करने की पहल नही की और सुप्रीम कोर्ट ने भी रायबरेली कोर्ट में अलग मुकदमा चलाए जाने को ठीक मान लिया.

इसी के बाद लखनऊ विशेष अदालत ने चार मई 2001 को 20 बड़े नेताओं के खिलाफ़ मुकदमा रोक कर बाकी अभियुक्तों पर मुकदमा चलाने का निर्णय किया था.

मगर सीबीआई का कहना था कि कि अगर भडकाऊ भाषण का मुकदमा रायबरेली में अलग चले तो भी आडवानी समेत ये सभी बड़े नेता बाबरी मस्जिद तोडने के मुख्य मुकदमे के अभियुक्त बने रहेंगे और लखनऊ विशेष अदालत द्वारा उन पर मुकदमा चलाने से मना करना कानूनी तौर पर ग़लत होगा. लेकिन न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिंह ने सीबीआई की दलील ख़ारिज कर दी.

उधर बाबरी मस्जिद के मुख्य पक्षधर ज़फ़रयाब जिलानी का कहना है,"आडवाणी एवं अन्य अभियुक्तों को कोई ख़ास राहत नही मिली है. सीबीआई अभी सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती है."

जिलानी इस पुरे मामले में देर के लिए केंद्र सरकार को दोषी मानते हैं. उनका कहना है कि केंद्र सरकार हाईकोर्ट से अनुरोध करके रायबरेली वाले मुकदमे की मुंबई बम ब्लास्ट केस की तरह हर रोज़ सुनवाई करवा सकती है. उनके अनुसार यह मुकदमा साल भर में तय हो जाए तो मुस्लिम समुदाय संतुष्ट हो जाएगा.

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