बदल रहा है आगरा के पेठे का स्वाद

  • 24 मई 2010
आगरा का पेठा
Image caption विश्व भर में आगरा का पेठा मशहूर है

ताज महल के अलावा अगर आगरा की कोई चीज़ काफ़ी मशहूर है तो वो है यहाँ का लज़ीज़ पेठा.

यही वजह है कि आगरा को 'ताज नगरी' के साथ साथ 'पेठा नगरी' के रूप में भी जाना जाता है. ताज की तरह पेठे की भी विश्व स्तरीय पहचान है.

आगरा आने वाले पर्यटक चाहे विदेशी हों या घरेलू, पेठे का स्वाद लिए बिना अपनी यात्रा को अधूरा मानते है. वे वापसी में पेठा अपने साथ ले जाना नहीं भूलते.

प्राचीन पेठा के मालिक राजेश अग्रवाल कहते हैं, "वक़्त के बदलते मिजाज़ के साथ-साथ पेठे के स्वरूप में काफ़ी बदलाव आया है. 1940 के दशक में जहाँ एक या दो प्रकार का पेठा था तो 2010 के आते आते इसकी विभिन्न क़िस्में बाज़ार में उपलब्ध हैं."

उनका कहना है कि आज 56 प्रकार का पेठा विभिन्न स्वाद के साथ बन रहा है और बदलते वक़्त के साथ साथ इसमें निरंतर बदलाव का दौर और स्वाद के नए नए प्रयोग हो रहे है.

इतिहास

पेठे के बदलते स्वाद की बात करें तो 1940 से पूर्व पेठा आयुर्वेदिक औषिधि के रूप में तैयार किया जाता था. इसका उपयोग वैद्य लोग अम्लावित्त, रक्तविकार, बात प्रकोप और जिगर कि बीमारी के लिए करते थे.

पेठा कुम्हड़ा नाम के फल से बनाया जाता है. औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण इसका उल्लेख इसके संस्कृत शब्द कूष्मांड के नाम से अनेक चिकित्सीय विधियों में आता है.

लेकिन 1945 के बाद इसके स्वाद में बदलाव का दौर प्रारंभ हुआ और गोकुल चंद गोयल ने पेठे में नया प्रयोग किया. इसको गोदकर और खांड के स्थान पर चीनी और सुगंध का प्रयोग करते हुए सूखा पेठा के साथ रसीला पेठा भी बनाया जिसे अंगूरी पेठा कहा जाने लगा.

इसे मिटटी की हांडी में रखकर बेचा जाता था. जिससे इसका स्वाद काफ़ी उम्दा हो जाता था. श्री गोयल ने नूरी दरवाज़ा मोहल्ले में पेठा बनाना शुरू किया जो आज तक जारी है.

गोकुल चंद गोयल के पड़पोते और प्राचीन पेठा स्टोर के मालिक राजेश अग्रवाल बताते हैं, "चीनी और सुगंध के बाद पेठे में केसर और इलाइची के साथ नए ज़ायक़े का उदय हुआ."

Image caption पेठे के प्रकार के साथ साथ उसके रंग और ज़ायक़े में भी बदलाव आया है

उन्होंने कहा कि 1958 के बाद सूखे मेवे पिस्ते, काजू, बादाम आदि का भी प्रयोग किया जाने लगा जो धीरे धीरे देश विदेश की पसंद बनता चला गया.

वर्षों तक यही स्वाद लोगो की ज़ुबान पर छाया रहा. लेकिन सन 2000 के बाद पेठे के स्वाद की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव आया और सैंडविच पेठा जिसमें की काजू, किशमिश, चिरोंजी आदि का पेस्ट बनाकर पेठा बनाया गया.

इसके बाद तो स्वाद की एक श्रृंखला ही बनती गई और फिर पान गिलोरी, गुजिया पेठा, चोकलेट कोको, लाल पेठा , दिलकश पेठा, पिस्ता पसंद, पेठा रस भरी, पेठा मेवावाटी, शाही अंगूर, पेठा बर्फ़ी, पेठा कोकोनटस, संतरा स्पेशल, पेठा चेरी, पेठा शालीमार, गुलाब लड्डू बनना प्रारंभ हो गया.

गुलाब लड्डू में पेठे को घिसकर पेस्ट बनाकर गुलकंद और मेवा भरकर बनाया जाता है.

प्रक्रिया

पेठा बनाने की प्रक्रिया काफ़ी जटिल और मेहनत का काम है. पेठे को धोकर उसके 4 टुकड़े कर लिए जाते है. बीज वाला हिस्सा और छिल्कों को अलग कर जो गूदा बचता है उसे एक विशेष प्रकार की गोदनी से गोदा जाता है.

गोदन प्रक्रिया के बाद पेठे के टुकरो को लगभग एक घंटे तक चूने के पानी में डाला जाता है. इसके बाद सांचों की मदद से छोटे छोटे टुकड़े काटकर 100 किलो पेठा 400 लीटर पानी से तीन बार धोया जाता है. जब यह टुकड़े पूरी तरह साफ़ हो जाते है तो इनको उबाला जाता है.

उबालते समय पानी में ज़रा सी फिटकरी डाली जाती है ताकि चूने का कोई भी अंश शेष न रह जाए. फिर चीनी की पतली चाशनी के घोल में इनको डालकर दो से तीन घंटे तक उबाला जाता है.

अगर सूखा पेठा बनाना है तो चाशनी पूरी तरह मिल जाने पर पेठे को सुखा लिया जाता है और गीला पेठा बनाना हो तो चाशनी की निर्धारित मात्रा बचने पर पेठे को आग से उतारकर सुखाया जाता है.

इस तरह तैयार हो जाती है कोलस्ट्रोल रहित, औषधीय गुणों से युक्त पेठे की मिठाई.

आगरा का लज़ीज़ पेठा खाते समय यह सवाल ज़ेहन में ज़रूर आता है कि पेठा केवल आगरा का ही क्यों है? ऐसा क्या है यहाँ जो और कही नहीं?

पेठा बनाने के जानकार प्राचीन पेठा के मालिक राजेश अग्रवाल बताते है "आगरा के पानी में वो तासीर है जो पेठे जैसे कसैले फल को भी स्वादिष्ट मिठाई में बदल देती है."

"यहाँ बनने वाला पेठा स्वादिष्ट और चमकीला होता है. यह 15 दिनों तक ख़राब भी नहीं होता. इसके विपरीत यदि आगरा के अलावा इसे बनाने का प्रयास भी किया गया तो न तो वह चमक आई न स्वाद."

उन्होंने कहा, "दो तीन दिन बाद ही इसका प्राकर्तिक रूप भी बदलकर काला होने लगता है. वर्षों से पेठा बनाने वाले कारीगर भी यहाँ मौजूद है. लगभग 15,000 से ज़्यादा व्यक्ति इस व्यवसाय से जुड़े है. साधारण दिनों में आगरा में लगभग 18 से 20 टन पेठा बनता है. इसकी खपत त्योहारों और शादियों के समय ज़्यादा हो जाती है."

पेठे के स्वाद का सफ़र निरंतर जारी है और अमीर से लेकर ग़रीब वर्ग सभी के लिए पेठा बाज़ार में 50 रुपये से 200 रूपए किलो उपलब्ध है.

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