विश्वास किस पर करे बिहार

  • 26 मई 2010
नीतीश कुमार जनता के बीच

''विश्वास! और वो भी ऐसी सरकारों पर!? क्या कह रहे हैं आप?''

आम तौर पर जहाँ इसी तरह की जन-प्रतिक्रियाएं हों, वहाँ किसी सरकारी मुखिया की 'विश्वास यात्रा' का असर क्या होगा, समझा जा सकता है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गत 28 अप्रैल से राज्य के विभिन्न ज़िलों के दौरे पर हैं. उन्होंने सरकारी ख़र्च पर आयोजित अपने इस दौरे को 'विश्वास यात्रा' नाम दिया है. एक महीने में 12 ज़िलों की यात्रा कर चुके नीतीश कुमार की कोसी अंचल-यात्रा के दौरान मैं भी सुपौल, मधेपुरा और सहरसा ज़िलों में सहयात्री बना रहा. ये वो इलाक़ा है, जो दो साल पहले कुसहा तटबंध टूटने के बाद कोसी नदी की प्रलयकारी बाढ़ से तहस-नहस हो गया था. इसलिए कोसी पीड़ितों के पुनर्वास या उजड़े कोसी अंचल के पुनर्निर्माण का ही मुद्दा इस यात्रा पर मुख्य रूप से छाया रहा.

वादा तेरा वादा

Image caption कोसी पुनर्वास से जुड़ी कमियों का सारा दोष केंद्र सरकार के मत्थे थोपा

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दो साल पहले बड़े विश्वास के साथ वादा किया था कि उनकी सरकार पहले से भी सुन्दर और समृद्ध कोसी अंचल का निर्माण करेगी.यही अपूर्ण वादा अब इस सरकार पर भारी पड़ने लगा है. इसलिए अपने प्रति कोसी अंचल के अविश्वास को मिटाने के लिए मुख्यमंत्री वहाँ बार-बार दुहराते रहे कि केंद्र सरकार के असहयोग की वजह से ये वादा पूरा नहीं हो सका. नीतीश कुमार कहते हैं- ''कोसी पुनर्वास के लिए विशेष सहायता मद में केंद्र सरकार से 14 हज़ार 8 सौ करोड़ रूपए की मांग करते-करते मैं थक चुका हूँ, इसलिए क़र्ज़ लेकर और अपने राज्य संसाधन से अब यह वादा पूरा ज़रूर करूँगा.'' लेकिन कोसी-पीड़ित लोग अब ये सवाल उठा रहे हैं कि वादा करते समय केन्द्रीय मदद वाली शर्त तो मुख्यमंत्री ने नहीं रखी थी. अब वो अपने शासन का कार्यकाल समाप्त होने के समय जो पुनर्वास या पुनर्निर्माण योजना शुरू करने की हवा बना रहे हैं, उसका क्या भरोसा? इस जनभावना को भांपते हुए ही नीतीश कुमार ने 'विश्वास यात्रा' के दौरान कोसी अंचल की हरेक जनसभाओं में कहा- ''भरोसा रखिये, और यही एकजुटता का माहौल बनाये रखिये. फिर देखिये कि देश-विदेश में चर्चित हो रही मौजूदा राज्य सरकार बिहार को विकास के रास्ते पर कहाँ से कहा पहुंचाती है.''

'ख़ूबियाँ'

चुनाव जब सर पे हों तो सत्ताधारी नेताओं को अपने शासन की खूबियां गिनाते समय और विपक्षी नेताओं को सरकार की ख़ामियां बताते समय शायद ये होश भी नहीं रहता कि सामने सुन रहे आम लोग दोनों पक्षों के स्याह-सफ़ेद रंग पहचानते हैं. बिहार में नीतीश सरकार के शासनकाल की प्रशंसा लोग इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि--

  1. पुलिस-प्रशासन अब बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के, अदालत में तेजी से मामलों की सुनवाई कराके अपराधियों को सज़ा दिलवा रहा है.
  2. अब कोई सत्ता-संरक्षण वाला रंगदार छुटभैया नेता व्यवसाइयों से अवैध वसूली नहीं करता.
  3. स्कूली छात्र-छात्राओं को साइकिल और पोशाक के लिए आर्थिक मदद दिए जाने से उनका सरकारी स्कूलों की तरफ आकर्षण बढ़ा है.
  4. विकास योजनाओं पर ख़र्च बढ़ने से योजना आकर भी बढ़ा, जो शुभ संकेत है.

कुछ और भी सकारात्मक बदलाव यहाँ बीते तीन-चार साल में दिखे हैं.

लेकिन सराहना की इन तमाम बातों पर आलोचना या शिकायतों वाली वो चर्चा ज़्यादा भारी होती जा रही है, जो मीडिया के ज़रिये नहीं, आम लोगों की ज़बान से ज़ाहिर हो रही है.

'ख़ामियाँ'

नीतीश कुमार की विकास यात्रा से लेकर विश्वास यात्रा तक भले ही प्रशासन या सरकारी अमला वास्तविक हालात से अलग एक बनावटी विकास दिखाने की कोशिश करे लेकिन मुख्यमंत्री के कान में और आँखों के सामने असली बातें तो आ ही रही हैं. मोटे तौर पर कहें तो बिहार में नीतीश सरकार की आलोचना इसलिए हो रही है, क्योंकि--

  1. यहाँ भ्रष्टाचार महंगाई से भी अधिक विकराल रूप धारण कर चुका है. पंचायत से लेकर मुख्य सचिवालय तक जिस तरह खुलेआम घूसखोरी हो रही है, उसकी चिंता मुख्यमंत्री को भी अब इस चुनावी वर्ष में सताने लगी है.
  2. खुलेआम घूस लेकर फर्ज़ी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर बड़ी तादाद में अयोग्य स्कूली शिक्षकों की नियुक्ति वाला घपला इस शासनकाल का सबसे खराब चेहरा बना.
  3. नौकरशाही के निरंकुश होने का ग्राफ भी इसी राज में सबसे उपर जाने की बात खुद सत्ता पक्ष के कई नेताओं ने कही है.
  4. राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना(नरेगा) और इंदिरा आवास योजना में लूट या धांधली के इतने सबूत शायद ही किसी अन्य राज्य में मिले होंगे.
  5. विकास योजनाओं पर ज़्यादा ख़र्च होने का सकारात्मक पहलू योजनाओं के सरज़मीन पर पहुँचने से पहले ही भ्रष्टाचार की गिरफ्त में धूमिल हो गया.

बावजूद इन कमज़ोरियों के, नीतीश सरकार को इस बात का फायदा ज़रूर मिल रहा है कि राज्य की पिछली सरकारों के शासनकाल में भी हालात बहुत बुरे थे. 'को बर छोट कहत अपराधू' वाली स्थिति जब हो तो विश्वास किस पर करे बिहार?

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