तंबाकू निषेध दिवस

  • 31 मई 2010

नशा करने वालों को कोई न कोई बहाना चाहिए होता है. खुशी हो या ग़म वे हर स्थिति में नशे का बहाना ढूंढ लेते हैं.

मौसम और मूड अच्छा है तो बीड़ी, सिगरेट और गुटका, और ठीक नहीं है तो भी बीड़ी, सिगरेट और गुटका.

लेकिन तंबाकू की लत जानलेवा साबित हो सकती है.

विश्व तंबाकू निषेध दिवस, 31 मई को मनाया जाता है और इस दिन तंबाकू सेवन के ख़तरों से लोगों का आगाह किया जाता है.

टोबेको कंट्रोल फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की डॉक्टर संजीला मैनी इसके ख़तरों से आगाह कराती हैं,''शौक शौक में इस नशे की शुरुआत होती है लेकिन इसके लोगों को ये जानना चाहिए कि इसके सेवन से सांस की बीमारियों से लेकर कैंसर तक का ख़तरा बढ़ जाता है.''

राजनीतिक आयाम

लेकिन भारत में तंबाकू एक अहम कृषि उत्पाद है और अर्थव्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है. इसके राजनीतिक आयाम भी है.

सबसे ज़्यादा तंबाकू की खेती करने वाले दो राज्यों आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ये राजनीतिक मुद्दा भी है.

Image caption भारत में विभिन्न तरह के तंबाकू उत्पादों का प्रयोग होता है

तंबाकू बोर्ड के अनुसार भारत में 72 करोड़ 50 लाख किलो तंबाकू की पैदावार होती है.

भारत तंबाकू निर्यात के मामले में ब्राज़ील,चीन, अमरीका, मलावी और इटली के बाद छठे स्थान पर है.

2007 तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इससे 2022 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की आय हुई थी.

केंद्र सरकार की संस्था तंबाकू बोर्ड के चेयरमैन दिनेश शर्मा कहते हैं,''ये नेगेटिव उत्पाद है लेकिन इससे बड़ी संख्या में किसान जुड़े हुए हैं इसलिए तंबाकू बोर्ड इसकी पैदावार नियंत्रित करता है, साथ ही किसानों को अन्य पैदावार की तरफ प्रेरित करता है.''

तंबाकू पर आयोजित विश्व सम्मेलन और अन्य अनुमानों के अनुसार भारत में तंबाकू सेवन करने वालों की संख्या लगभग साढे 29 करोड़ तक हो सकती है.

इसमें सिगरेट, बीड़ी, गुटके और खैनी जैसे तंबाकू उत्पादों का सेवन करने वाले लोग शामिल हैं. तंबाकू सेवन करने वालों की, ये चीन के बाद, दूसरी सबसे बड़ी संख्या है.

चिंता की बात ये है कि दुनिया में हर साल तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से क़रीब 50 लाख लोगों की मौत होती है.

एक अनुमान के अनुसार 2020 तक ये संख्या क़रीब एक करोड़ तक पहुँचने की आशंका है.

अभियान

एक ओर भारत समेत दुनियाभर के देशों में इसके ख़िलाफ़ अभियान चलाया जा रहा है, तो दूसरी ओर कंपनियाँ तंबाकू उत्पादों को युवाओं और महिलाओं में लोकप्रिय करने की कोशिश कर रही हैं.

तंबाकू कंपनियाँ चबाए जाने, सूँघे जाने और हुक्कों में उपयोग किए जाने वाले उत्पादों को सिगरेट से कम नुक़सानदेह बता कर बेच रही हैं.

तंबाकू विरोधी अभियानों पर दुनिया के देश जितना खर्च करते हैं, उससे पाँच गुना ज्यादा वे तंबाकू पर टैक्स लगाकर कमाते हैं.

लेकिन तथ्य ये भी है कि इससे लाखों लोगों की रोज़ी रोटी जुड़ी हुई है.

ज़ाफरानी ज़र्दा ऐंड पान मसाला एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के कार्यकारी निदेशक चैतन्य अग्रवाल कहते हैं,''सरकार इस पर भारी टैक्स लगाती है लेकिन ये भी तथ्य अहम है कि इससे लाखों लोगों की रोज़ी रोटी चलती है.''

दिल्ली और कई अन्य शहरों में सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट, बीड़ी पीने पर पाबंदी है लेकिन शायद ही कभी किसी को इससे लिए सज़ा मिली हो.

अमरीकी संस्थान ब्लूमबर्ग और बिल और मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन की मदद से किए अध्ययन में ये सिफ़ारिश की गई है कि भारत में तंबाकू के प्रयोग को कम करने के सबसे कारगर उपायों में से एक है उत्पाद कर बढ़ाकर तंबाकू उत्पादों के दाम में बढ़ोत्तरी कर दी जाए.

संस्थान का कहना है कि इस पर काबू नहीं पाया गया तो 2010 तक तंबाकू के कारण भारत में हर साल मरने वालों की संख्या क़रीब 10 लाख तक हो सकती है.

सबसे चिंता की बात ये है कि ज़्यादातर मरने वाले ग़रीब और अशिक्षित होंगे.

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