झारखंड में राष्ट्रपति शासन

Image caption झारखंड में कुछ ही महीनों पहले चुनाव के बाद सरकार बनी थी.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंगलवार को राज्यपाल की रिपोर्ट के बाद स्वीकार करते हुए झारखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा कर दी है.

मंत्रिमंडल ने राष्ट्रपति से अनुशंसा की है कि राष्ट्रपति शासन के दौरान विधानसभा को स्थगित रखा जाए.

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस और भाजपा के सरकार बनाने से इनकार करने के बाद राज्यपाल एमओएच फ़ारुक़ ने सोमवार को केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रपति शासन लगाने का सुझाव दिया था.

इससे पहले राज्य के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था उसके बाद से ही माना जा रहा था कि राज्य में राष्ट्रपति शासन ही एकमात्र विकल्प बचा है.

अपनी रिपोर्ट भेजने से पहले राज्यपाल ने सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से विचार विमर्श किया था.

राज्य में किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं है.

खंडित जनादेश के बाद झामुमो के रवैए को देखते हुए बड़े दल उनके साथ गठबंधन करने से कन्नी भी काट रहे हैं.

राज्य में बीजेपी के पास 18, झामुमो के 18, कांग्रेस की 14, झारखंड विकास मोर्चा की 11, आजसू-5, राजद-5 और अन्य के पास आठ सीटें हैं.

ऐसे में कोई भी सरकार बिना झामुमो के समर्थन के नहीं बन सकती है.

राजनीतिक खींचतान

लेकिन गठबंधन को लेकर झामुमो का रवैया सकारात्मक नहीं है.

उल्लेखनीय है कि पिछले महीने मंहगाई पर कटौती प्रस्ताव के दौरान शिबू सोरेन ने कांग्रेस के पक्ष में वोट डाला था जबकि राज्य में वो भाजपा के साथ सरकार में हैं.

भाजपा ने समर्थन वापस लिया जिसके बाद पिछले कई हफ्तों से गठबंधन को बचाने की कोशिशें होती रहीं. हालांकि शिबू सोरेन के बार बार बदलते रुख ने भाजपा के लिए गठबंधन में बने रहना मुश्किल कर दिया और भाजपा ने सरकार से हटना ही उचित समझा.

शिबू सोरेन के साथ सरकार बनाने की कोशिश कांग्रेस ने की ही नहीं.

झारखंड में खंडित जनादेश और इसी तरह की दिक़्कतों की वजह से एक बार निर्दलीय विधायक के रुप में मधु कोड़ा मुख्यमंत्री बन गए थे.

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