पढ़ने लिखने की भला क्या उम्र !

दल बहादुर कोरी
Image caption दल बहादुर कोरी को रोज़ी रोटी की फ़िक्र ने पढ़ने नहीं दिया था

दो बार विधायक और एक बार मंत्री रह चुके 53 वर्षीय दल बहादुर कोरी के लिए एक जून का दिन हमेशा के लिए यादगार बन गया गया है क्योंकि इस दिन उन्होंने अच्छे नंबरों से हाईस्कूल का इम्तिहान पास कर लिया.

जब उन्होंने मंत्रिपद की शपथ ली थी तो शायद कोई पत्रकार साक्षात्कार लेने नहीं गया होगा, पर अब लखनऊ से लेकर कलकत्ता तक के अखबार में छाए हुए हैं. रेडियो और टीवी चैनल भी बुला रहे हैं.

दल बहादुर कहते हैं,"शिक्षा की कोई उम्र नहीं, शिक्षा में कोई शर्म नहीं. आदमी का जीवन रोज़ शिक्षा और परीक्षा से गुजरता है."

यह बात दल बहादुर के लिए यह कोई नारा नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है.

ग़रीबी की मार

बात करते-करते वह बड़े सहज ढंग से बचपन में पहुँच जाते हैं. रायबरेली जिले के पदमनपुर गाँव में एक ग़रीब दलित परिवार में पैदा हुए.

नौ साल की उम्र में पिता की मृत्यु हो गई. उस समय माँ मात्र पचास पैसे रोज़ की मज़दूरी करती थी. बड़े लोगों के जानवर चराकर वह खुद भी कमा लेते थे. लेकिन घर चलाने के लिए आठवीं पास करने के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी.

कानपुर शहर गए. ईंट-गारा का काम किया. फिर प्लंबर और सैनिटरी का काम सीखा. छोटा सा घर बनाया. शादी की. तीन बच्चों को ग्रैजुएट बनाया. तीन और बच्चे अभी पढ़ रहे हैं.

दल बहादुर की किस्मत 1990 में अचानक पलटी जब भारतीय जनता पार्टी ने सालों विधान सभा क्षेत्र से टिकट दे दिया. मगर दुर्घटना में पैर टूट गया. चुनाव हार गए. 1993 में वह विधायक बन गए और 1996 में भाजपा की सरकार बनी तो मंत्रिपद भी मिल गया.

दल बहादुर कहते हैं, "मैंने राजनीति भी जनसेवा की भावना से की. चप्पल पहनकर मंत्री बना था. पाँच साल तक मंत्री रहने के बाद भी चप्पल पहनकर वापस गया."

2007 में वह कांग्रेस में शामिल हो गए. अमेठी के रहने वाले हैं, इसलिए प्रदेश कांग्रेस में महामंत्री भी बन गए. अब राहुल गांधी उनके आदर्श हैं.

दल बहादुर कहते हैं, "राजनीति में न्यूनतम शिक्षा की कोई शर्त नहीं है, नौकरी मुझे करनी नहीं. फिर भी मुझे लगा कि अधूरी पढ़ाई पूरी हो जाए तो अच्छा. इसलिए इस साल हाईस्कूल का फार्म भर दिया."

इम्तिहान देने गए तो कौतूहल का विषय बन गए. मगर इससे उन्हें न शर्म न झिझक.

पहली जून को ज़रुर दिल में थोड़ी धुक-धुकी थी. मगर 63.5 प्रतिशत अंक पाकर पास हुए तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

राजनीति बड़ा समय लेने वाला पेशा है. मगर दल बहादुर उसमें भी पढ़ने के लिए समय निकाल ही लेते हैं.

वे कहते हैं, "मै उन नौजवानों और माँ-बाप को संदेश देना चाहता हूँ , जो शिक्षा का महत्त्व नहीं समझते. सरकार करोड़ों रुपए शिक्षा पर खर्च करती है लेकिन लोग उसका फ़ायदा नही उठा पाते."

लगन कोई दल बहादुर से सीखे. और विनम्रता भी. कहते हैं, "समय मिला तो आगे भी पढूंगा."

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