शराब के लाइसेंस से भारी कमाई

शराब की बोतलें
Image caption आंध्र प्रदेश में 1994-96 के दौरान पूरी तरह नशा बंदी रही

आंध्र प्रदेश भारत के उन राज्यों में से एक है जहाँ शराब की खपत सबसे ज़्यादा है.

हालांकि पूरे राज्य में कुल मिलाकर 6596 शराब की दुकाने हैं लेकिन इनके लाइसेंसों की मांग इतनी ज़्यादा है कि राज्य सरकार अगले दो वर्षों के लाइसेंसों की नीलामी से लगभग पांच हज़ार करोड़ रूपए का राजस्व कमाने जा रही है.

वर्ष 2010-2012 की अवधि के लिए सरकार को कुल 48600 बोलियाँ वसूल हुई हैं. केवल इस नीलामी के फ़ार्म की बिक्री से सरकार को 48 करोड़ रुपए की आय हुई है. सोमवार को जब इन बंद लिफ़ाफ़ों को खोलने की प्रक्रिया शुरू हुई और बोली की राशी सामने आने लगी तो ये स्पष्ट था कि कुछ लोग तो हर क़ीमत पर शराब की चिल्लर दुकानों का लाइसेंसे प्राप्त करने के उद्देश से मैदान में उतरे हैं.

उदाहरण के तौर पर विशाखापट्नम में वाल्टेयर की शराब की एक दुकान के लिए चार करोड़ 72 लाख रुपए की सबसे ऊँची बोली लगाई गई. इसी तरह हैदराबाद के निकट ओल्ड आलवॉल में एक दुकान के लिए चार करोड़ 45 लाख रुपये की बोली लगाई गई.

चाहे राज्य का कोई भी ज़िला हो किसी दुकान की बोली दो करोड़ से कम नहीं थी और कई दुकानों की बोली तो तीन करोड़ से भी ज़्यादा थी. जब दो वर्ष पहले शराब की दुकानों के लाइसेंस की नीलमी हुई थी तो सरकार को उसकी फ़ीस के तौर पर 3200 करोड़ रुपए की आमदनी हुई थी.

अनुमान से अधिक

इस बार अधिकारियों ने कम से कम बोली की हद पिछली बोली की तुलना में 15 प्रतिशत ज़्यादा रखी थी. लेकिन जितनी बोलियाँ लगाई गई हैं वो पिछली बोली से 40 प्रतिशत तक अधिक थीं. अधिकारियों का कहना है कि इसके चलते सरकार को लाइसेंस से होने वाली आय 5000 करोड़ तक पहुंच सकती है.

इसके अलावा शराब की बिक्री पर लगने वाले कर से उससे दोगुना आय हो सकती है. इस तरह शराब ही राज्य सरकार के लिए आय का सबसे बड़ा ज़रिया सिद्ध हो रहा है.

अधिकारियों का कहना है कि इसके दो कारण हैं. एक तो राज्य में शराब की बिक्री लगातार बढ़ रही है और दूसरी ओर रियल स्टेट व्यापर में लगातार मंदी का सिलसिला चल रहा है जिससे उस क्षेत्र के व्यपारी भी अब शराब के व्यापर में आना चाहते हैं.

महिलाएँ

सबसे ज़्यादा हैरत की बात ये है कि इसबार जिन लोगों ने लाइसेंसों की इस दौड़ में हिस्सा लिया है उनमें 15 प्रतिशत महिलाऐं शामिल हैं.

हालाँकि इसी आंध्र प्रदेश राज्य में 1990 के दशक में महिलाओं ने शराब के विरुद्ध इतना बड़ा आंदोलन छेड़ा था कि एनटी रामाराव की सरकार को पूरे तौर पर नशाबंदी लागू करनी पड़ी थी जो 1994 से 1996 तक जारी रही.

लेकिन बाद में चंद्रबाबू नायडू की सरकार ने उसे यह कहकर ख़त्म कर दिया कि इससे शराब की तस्करी का माफ़िया शक्तिशाली बन रहा है. लेकिन अब भी कुछ राजनीतिक दल उसका विरोध कर रहे हैं. लोक सत्ता और तेलुगु देशम ने कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया है कि वह अपनी आय बढ़ाने के लिए शराब की बिक्री को बढ़ावा दे रही है. अहम बात ये भी है कि सरकार को ज़्यादा आय एक ऐसे समय पर मिल रही है जबकि रोसैया सरकार आर्थिक संकट से जूझ रही है जिसके कारण कई कल्याण योजनाओं पर एक प्रशन चिन्ह लग गया है.

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