बुरी संस्कृतियों के घालमेल का परिणाम

पीड़ित परिवारों में निचली अदालत के फ़ैसले और सरकार की भूमिका को लेकर रोष

अमरीका और भारत की संस्कृतियों के सबसे बुरे तत्वों की मिलीभगत का परिणाम थी भोपाल गैस त्रासदी. यूनियन कार्बाइड ने भारत को इस्तेमाल किया. दुर्घटना के बाद स्थानीय अधिकारियों ने निर्दयतापूर्ण लापरवाही बरती.

ये बातें गैस कांड पर आए उस फ़ैसले में कही गई हैं, जो कि इस समय ख़ुद विवादों के केंद्र में है.

उल्लेखनीय है कि 25 वर्षों तक चले मुक़दमे के बाद दुर्घटना के लिए दोषी पाए गए आठ लोगों को मात्र दो-दो वर्षों की सज़ा सुनाए जाने पर भोपाल के लोगों में रोष है, और राज्य सरकार ने अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने का फ़ैसला किया है.

भोपाल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने अपने 95 पृष्ठों के फ़ैसले में कहा है, "यह त्रासदी अमरीकी और भारतीय संस्कृतियों के सबसे बुरे तत्वों की सहक्रिया के परिणाम स्वरूप हुई है. एक अमरीकी कंपनी ने स्वदेश में लगातार बढ़ाए जा रहे सुरक्षा स्तर से बचने के लिए जानबूझ कर तीसरी दुनिया के एक देश का इस्तेमाल किया."

अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा है कि यूनियन कार्बाइड के भोपाल संयंत्र में वैसे ही न्यूनतम सुरक्षा प्रक्रियाएँ लागू थीं, फिर भी लगता नहीं कि कंपनी के अमरीकी मालिक या फिर स्थानीय प्रबंधन उन्हें अनिवार्य समझते थे.

आपात योजना नहीं

फ़ैसले में दुर्घटना की स्थिति में क्रियान्वित किए जाने वाली आपात योजना के अभाव का भी ज़िक्र किया है.

अदालत ने कहा, "जब दुर्घटना हुई तो उस समय किसी भी तरह की आपात योजना नहीं थी जिसे कि लागू किया जा सकता."

अदालत का कहना है कि स्थानीय अधिकारियों की त्वरित कार्रवाई से हताहतों में से अनेक को बचाया जा सकता था.

अदालत ने अपने फ़ैसले में टिप्पणी की है कि दुर्घटना के तुरंत बाद उठाए गए क़दमों में निर्दयतापूर्ण लापरवाही की झलक साफ़ देखी जा सकती थी.

सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना

भोपाल गैस त्रासदी पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना मानी जाती है.

25 साल पहले 2/3 दिसंबर, 1984 को भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड कारखाने से रिसी जहरीली मिथाइल आइसोसायनेट गैस के कारण हज़ारों लोग मारे गए थे और अनेक लोग स्थायी रूप से विकलांग हो गए थे.

इस मामले में अदालत ने आठ दोषियों को दो-दो साल की सज़ा सुनाई है और एक-एक लाख का जु्र्माना भी लगाया गया है.

भोपाल गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाले संगठनों ने 25 वर्ष बाद सुनाए गए फ़ैसले को एक क्रूर मज़ाक करार दिया है.

केंद्रीय क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने न्याय मिलने में हुई देरी और दोषी लोगों को कम सज़ा मिलने के बारे में कहा कि इसके लिए सरकार नहीं बल्कि न्यायपालिका ज़िम्मेदार है.

मोइली ने स्वीकार किया कि भोपाल की तरह की त्रासदी के लिए भारत में पर्याप्त क़ानूनी प्रावधानों का अभाव है और उनका मंत्रालय अब इस दिशा में काम कर रहा है.

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