लद्दाख में पर्यटन के नए शिखर

Image caption पर्वतारोहियों में नए-नए शिखरों की तलाश का जुनून होता है.

जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में लगभग 100 नए पर्वतीय शिखर पर्वतारोहियों के लिए खोले जा रहे हैं. इनमें अधिकांश ऐसे शिखर हैं जिन पर आज तक किसी ने चढ़ाई नहीं की है.

इन शिखरों में कई तो चीन के साथ लगने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा के निकट स्थित हैं और इन्हें चीन से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं के कारण बंद रखा गया था.

जम्मू-कश्मीर के पर्यटन और संस्कृति मंत्री रिगजिन जोरा कहते हैं, “इनको बिना कारण अब तक बंद रखा गया था. पर्यटकों के लिए इन शिखरों को खोले जाने से सुरक्षा व्यवस्था के बारे में कोई परेशानी नहीं होगी.”

लद्दाख जम्मू कश्मीर राज्य का सरहदी रेगिस्तानी क्षेत्र है. इसे 35 साल पहले पहली बार विदेशी पर्यटकों के लिए खोला गया था. उन दिनों अधिकांश पर्यटक लद्दाख की संस्कृति देखने आते थे. यहाँ के पर्वत शिखर हमेशा से ही पर्वतारोहियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं.

एक अनुमान के मुताबिक हर साल 80,000 से अधिक पर्यटक लद्दाख आते हैं. ट्रेकिंग एवं पर्वतारोहण के लिए नए शिखरों को खोले जाने से पर्यटकों की संख्या में खासी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है.

एक ट्रैवेल एजेंसी के मालिक नासिर शाह इसे स्पष्ट करते हैं. वे कहते हैं, "पर्वतारोहियों में जुनून होता है कि वे नए-नए शिखरों की तलाश कर उन पर चढ़ें. लद्दाख में जो नए शिखर खोले गए हैं, पर्वतारोही उन पर बारी-बारी चढ़ने के लिए कई बार लद्दाख आएंगे. पर्वतारोहियों में एक खास बात यह होती है कि वे 15-20 दिनों के लिए आते हैं और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के साधन पैदा करते हैं.”

रोजगार के साधन

पहाड़ों पर चढ़ने के लिए ये पर्यटक स्थानीय लोगों से किराए पर घोड़े और टट्टू लेते हैं. इनके साथ ट्रैकिंग गाइड भी जाते हैं जो कि स्थानीय लोग ही होते हैं. इस तरह इन गतिविधियों में स्थानीय लोगों को काम मिलता है और उनके लिए जीविका के नए अवसर पैदा होते हैं.

मंज़ूर अहमद, जो कि स्वयं यहां के पर्यटन उद्योग एवं पर्वतारोहण के कारोबार के साथ जुड़े हैं, कहते हैं,"पर्वतारोही आम तौर पर अमीर लोग होते हैं. ये लोग अच्छे होटलों में ठहरते हैं, अच्छी शॉपिंग करते हैं और इस तरह स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल देते हैं.” नासिर शाह का कहना है, “पर्वतारोहण से न केवल आर्थिक लाभ होता है, बल्कि इससे विभिन्न संस्कृतियों के बीच आपसी संवाद भी बढ़ता है."

नासिर कहते हैं, “जब विदेशी पर्वतारोही ऊँचे पर्वतों पर जाते हैं तो वहां उनकी मुलाक़ात उन पर्वतों पर रहने वाले लोगों के साथ होती है. अपने साथ लाए गए खाने-पीने के सामान खत्म होने के बाद वे उनसे चावल, गोश्त और ऐसी ही अन्य चीजें लेते हैं. इन पर्वतीय इलाकों पर रहने वालों लोगों के बीमार होने पर ये पर्यटक ही उनको अपने साथ लाई दवाईयां वगैरह देते हैं. इस प्रकार दो अलग-अलग संस्कृतियों का मिलाप होता है.”

हिंसा से अप्रभावित

लद्दाख जम्मू कश्मीर राज्य का वह क्षेत्र है जो राज्य में पिछले बीस वर्षों से चल रही हिंसा से प्रभावित नहीं हुआ है. इन बीस वर्षों में इलाके में शांति बनी रही और पर्यटक आते रहे. लेकिन राज्य के अन्य भागों विशेषकर कश्मीर घाटी में हिंसा के कारण पर्वतारोहियों का आना बंद हुआ लेकिन अब पिछले एक-दो साल से घाटी में भी पर्वतारोहियों ने फिर से आना शुरू कर दिया है.

नासिर शाह कहते हैं कि अभी कुछ दिन पहले ही उन्होंने फिनलैंड से आए 9 पर्वतारोहियों को पहलगाम से आगे आड़ू नामक जगह पहुंचाया था. यहां से ये पर्वतारोही करीब 17,000 फुट ऊंचे कोलाहाई शिखर पर चढ़ेंगे.

पर्यावरण को खतरा नहीं

कई लोगों को यह चिंता है कि यदि पर्वतारोहियों की संख्या ऐसे ही बढ़ती गयी तो इससे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. लेकिन राज्य में पर्यटन विभाग के पूर्व महानिदेशक और भारतीय पर्वतारोहण संस्थान के कार्यकारी मोहम्मद अशरफ इस बात से सहमत नहीं हैं. वे कहते हैं, “लद्दाख में तत्काल कोई खतरा नहीं है. लद्दाख बहुत ही बड़ा क्षेत्र है. यहाँ अगर नुब्रा घाटी में एक साथ दस हज़ार की संख्या में भी पर्यटक जाएँ तो भी यहां भीड़ का असर नहीं दिखेगा.” वे कहते हैं कि इस समय लद्दाख में आसानी से दो लाख पर्यटकों को समाया जा सकता है.

अशरफ स्वीकार करते हैं कि लद्दाख कस्बे में पर्यटकों की चहल-पहल काफी बढ़ गई है.

नुब्रा घाटी लद्दाख के लेह शहर से 10 किलोमीटर दूरी पर स्थित है. यह घाटी अपनी खूबसूरत वादियों के कारण पर्यटकों के लिए हमेशा से आकर्षण का केंद्र रही है.

पर्यटन मंत्री रिगजिन जोरा जो खुद लेह के रहने वाले हैं, मानते हैं कि लद्दाखवासियों ने पर्यटन, संस्कृति और पर्यावरण के बीच अब तक संतुलन बनाए रखा है.

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