नीतीश-मोदी विवाद में फंसी बिहार सरकार

नीतीश कुमार, सुषमा स्वराज के साथ नरेंद्र मोदी
Image caption बिहार में नरेंद्र मोदी की तारीफ़ वाले विज्ञापन छपने से नीतीश नाराज़ हैं.

बिहार में जनता दल (यू) और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन सरकार क्या अब अंतर्कलह की शिकार हो कर रहेगी?

इस सवाल को जन्म देने वाले विवाद के मुख्य किरदार बने हैं इन दोनों पार्टियों से जुड़े दो मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार.

हाल ही सतह पर आये इस अंतर्कलह की ताज़ा कड़ी ये है कि बिहार सरकार ने दो साल पहले कोसी बाढ़ आपदा राहत मद में गुजरात सरकार से मिले पांच करोड़ रुपये लौटा दिए है.

हालांकि ऐसा करने की घोषणा नीतीश कुमार ने पटना में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक (12 जून'10)के दिन ही कर दी थी.

विज्ञापन पर बवाल

कारण ये था कि उस दिन यहाँ अखबारों में नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के आपस में हाथ मिले हुए एक पूर्व प्रकाशित चित्र छपे थे.

इसमें कोसी बाढ़ आपदा के समय गुजरात सरकार द्वारा पांच करोड़ रुपये की मदद का सचित्र विज्ञापन किया गया था.

इस विज्ञापन को नीतीश कुमार ने बिना पूछे उनकी फ़ोटो छापने और विपदा के समय दी गयी मदद-राशि का ढिढोरा पीटने वाला अनैतिक और गैरक़ानूनी क़दम कहा था.

उन्होंने अपनी तीख़ी प्रतिक्रिया में ये कहा था कि गुजरात से जो राहत-राशि मिली थी, वो लौटा दी जाएगी और विज्ञापन-प्रकाशन की जाँच करा के उचित क़ानूनी कार्रवाई भी की जाएगी.

पुलिस को विज्ञापन एजेंसी से पूछताछ के लिए भेजा भी गया था लेकिन पता चला कि विज्ञापन-प्रकाशन के पीछे गुजरात सरकार की नहीं, वहाँ के कुछ बिहारी उद्यमियों की भूमिका थी.

गठबंघन में दरार

इतना ही नहीं, नीतीश कुमार उस समय इतने रोष में थे कि उन्होंने पटना आये भाजपा के तमाम बड़े नेताओं को अपनी तरफ से दिये जाने वाले रात्रि-भोज को भी रद्द कर दिया था.

इस अपमानजनक स्थिति में कुछ कड़ा बोलकर टकराव से बचते रहे भाजपा नेतृत्व और ख़ासकर नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार के व्यवहार पर इशारे-इशारे में अपनी आपत्ति ज़ाहिर कर दी थी.

तब ये भी लगने लगा था कि दोनों पक्ष कटुता को तूल नहीं देकर गठबंधन में आई खटास को कम कर लेंगे.

लेकिन अब चूँकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुजरात सरकार से मिले पांच करोड़ रुपये लौटा कर भाजपा पर एक और चोट लगा दी है, इसलिए मामला सुलझने के बजाय और उलझता हुआ दिख रहा है.

यहाँ मुख्यमंत्री सचिवालय सूत्रों ने बी बी सी को बताया कि गत 13 जून को उधर गाँधी मैदान में भाजपा की रैली हो रही थी और इधर राज्य सचिवालय में मुख्यमंत्री आपदा राहत कोष से पाच करोड़ रुपये वापस किये जाने सम्बन्धी चेक और फाइल पर हस्ताक्षर हो रहे थे.

मतलब गुजरात को ये रुपये लौटाने की प्रक्रिया यहाँ भाजपा कार्यकारिणी बैठक समाप्त होने के दिन ही पूरी हो गयी थी. हालांकि इस फ़ैसले को नीतीश सरकार ने इस हफ़्ते हुए राज्यसभा चुनाव को ध्यान में रखकर तत्काल ज़ाहिर नहीं होने दिया.

सरकारी पैसे पर राजनीति

अब इस राहत- राशि वापसी प्रकरण पर एक बार फिर से राजनीतिक बयानबाज़ी का सिलसिला तेज़ हो गया है. सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या मुख्यमंत्री आपदा राहत कोष के तहत मिली राशि को इस तरह व्यक्तिगत राजनीतिक रंजिशों की लपेट में लेना चाहिए ?

क्या यह राशि नरेंद्र मोदी की या नीतीश कुमार की थी ?

गुजरात की जनता के जो पैसे बिहार कि जनता की मदद में भेजे गये, वो किसी मुख्यमंत्री की मनमर्ज़ी के शिकार कैसे हो सकते हैं?

इस बाबत जहाँ तक बिहार के आमलोगों की प्रतिक्रियाओं का सवाल है, तो कुछ लोग कहते हैं नरेंद्र मोदी ने गुजरात से दी गयी मदद का ढिंढोरा पीटकर बिहार के बाढ़ पीड़ितों का अपमान किया है.

वहीँ कुछ लोग ये मानते हैं कि नीतीश कुमार ने राहत राशि लौटाकर गुजरात की आम जनता का अपमान किया है.

ज़ाहिर है कि इस पूरे विवाद के मूल में है वो राजनीति, जो किसी संप्रदाय - विशेष के वोट हासिल करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को आतुर रहती है.

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