जीपीएफ़ घोटाले में चार्जशीट दाख़िल

सीबीआई का लोगो
Image caption ग़ाज़ियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत में दाख़िल की गई है चार्जशीट.

केन्द्रीय जांच ब्यूरो यानि सीबीआई ने बहुचर्चित गाज़ियाबाद जजी जीपीएफ घोटाले में छह ज़िला जजों समेत 77 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ गाज़ियाबाद की स्पेशल सीबीआई अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी है. पर साथ ही 41 जजों एवं 75 अन्य लोगों को पर्याप्त सबूत के अभाव में छोड़ दिया है.

इस मामले में जनहित याचिका दाखिल करने वाले वकील नाहर सिंह सीबीआई जांच से संतुष्ट नहीं हैं और वे फिर से सुप्रीमकोर्ट जाने की बात कह रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने काफी हीलाहवाली के बाद सितम्बर 2008 में इस मामले कि जांच सीबीआई को दी थी.

इससे पहले तर्क दिया जा रहा था कि पुलिस जजों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले की जांच नहीं कर सकती. यद्यपि भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता में जजों को ऐसा कोई विशेषाधिकार नहीं है.

मामला

यह मामला गाज़ियाबाद जिला अदालत की एक जज ने ही उजागर किया था और उसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आतंरिक जांच कराकर रपट लिखाई. लेकिन प्रारंभिक रपट में जजों के नाम नही लिखाए गए थे.

मगर इस मामले के मुख्य अभियुक्त कोर्ट कर्मचारी आशुतोष अस्थाना ने जब एक कोर्ट में अपने इक़बालिया बयान में इन जजों के नाम ले लिए जिन्हें धोखाधड़ी से जीपीएफ से पैसा निकाल कर फ़ायदा पहुंचाया गया, तब इस मामले ने तूल पकड़ लिया.

आशुतोष अस्थाना ने जिन 36 जजों के नाम लए थे, उनमें एक सुप्रीम कोर्ट के जज थे और 11 हाईकोर्ट के. बाक़ी जज ज़िला या निचली अदालतों में तैनात थे. कथित घोटाले में शामिल गाज़ियाबाद के कुछ जिला जज बाद में हाईकोर्ट में प्रोन्नत हो गए.

सीबीआई की एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि सन 2000 से 2008 के बीच गाज़ियाबाद में तैनात रहे छह ज़िला जजों को इस मामले में अभियुक्त बनाया गया है. इनमे से तीन हाईकोर्ट जज होकर रिटायर हुए थे.

सीबीआई

सीबीआई के अनुसार इन छह सालों में 482 ट्रेजरी चेकों के माध्यम से लगभग सात करोड़ रुपये ट्रेजरी से धोखाधड़ी करके निकाले गए थे.

सीबीआई का कहना है कि मुख्य अभियुक्त आशुतोष अस्थाना की मौत से मामले की जांच को काफी धक्का लगा, क्योंकि उसके इक़बालिया बयान में ही काफी सबूत थे. फिर भी सीबीआई का कहना है कि उसने 500 गवाहों के बयान और लगभग तीस हजार दस्तावेजों कि जांच पड़ताल करके सबूत जुटाए.

लेकिन सीबीआई के मुताबिक 41 न्यायिक अधिकारियों, 43 कोर्ट कर्मचारियों और 32 अन्य लोगों के ख़िलाफ़ इतने पर्याप्त सबूत नहीं मिले कि उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया जा सके.

प्राप्त जानकारी के अनुसार इनमें से कम से कम तीन जज अभी झारखंड र उत्तरांचल हाईकोर्ट में सेवारत हैं.

‘संतुष्ट नहीं’

सीबीआई कि इस जांच से गाज़ियाबाद के वरिष्ठ एडवोकेट नाहर सिंह संतुष्ट नहीं हैं. नाहर सिंह ने ही इस मामले की सीबीआई जांच के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं दाखिल की थीं.

नाहर सिंह का कहना है, “अगर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों के ख़िलाफ चार्जशीट दाख़िल नहीं है तो हम संतुष्ट नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों के खिलाफ दस्तावेजी सबूत हैं, लेकिन अगर सीबीआई उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल नहीं करती तो इसका सीधा सीधा मतलब है कि सीबीआई पर भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट का दबाव है कि न्यायापालिका में भ्रष्टाचार को उजागर मत करो.”

नाहर सिंह आगे कहते हैं, “हम चार्जशीट की कॉपी लेकर फिर सुप्रीम कोर्ट जायेंगे, क्योंकि न्यायापालिका का भ्रष्टाचार इस देश को तबाह कर देगा.”

साफ़ है कि सीबीआई को ये बताना होगा कि धोखाधड़ी के पैसे से जिन बाक़ी जजों ने तमाम फ़ायदे और सामान लिया वे दोषी क्यों नहीं हैं. ऐसे कई जज चूँकि अभी सेवा में हैं, इसलिए यह मामला आसानी से शांत नहीं होगा.

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