मुंबई में महिला बास्केटबॉल टीम

मुंबई के नागपाड़ा में महिला बास्केटबॉल टीम
Image caption तमाम दिक़्कतों के बावजूद आगे बढ़ने की हिम्मत रखती हैं ये लड़कियां

मुंबई के नागपाड़ा इलाक़े से पूर्व में कई ख़तरनाक गैंग्स्टर पैदा हुए हैं और पुलिस भी इस इलाक़े को शक की निगाह से देखती है लेकिन इस मुस्लिम-बहुल इलाक़े की लड़कियों ने जैसे नागपाड़ा को एक नई पहचान दी है.

उन्होंने एक बास्केटबॉल टीम बनाई है. 12 सदस्यों वाली इस टीम का नाम है नागपाड़ा नेबरहुड हाउस यानि एनएनएच और यहाँ की बास्केटबॉल एसोसिएशन का नाम है एनबीए, यानि नागपाड़ा बास्केटबॉल एसोसिएशन.

इस टीम में ज़्यादातर लड़कियाँ मुस्लिम हैं और बेहद ग़रीब परिवारों से हैं. इनके लिए घर की चारदीवारी से लेकर बास्केटबॉल कोर्ट तक का ये सफ़र आसान नहीं रहा है.

चारों तरफ़ ऊंची बिल्डिंगे, झोपड़पट्टियाँ और दुकानें और बीच में बना हुआ है एक नया, आधुनिक ट्रैक वाला बास्केटबॉल कोर्ट.

हर शाम क़रीब पाँच बजे पूरे ट्रैकसूट में ये लड़कियाँ बास्केटबॉल कोर्ट पहुँचती हैं. और अगले ढाई घंटे तक चलती है ज़बरदस्त प्रैक्टिस. पहले सूरज की रोशनी में, फिर फ़्लडलाइट्स में.

नई पहचान की कोशिश

शेख़ आफ़रीन रशीद और शेख़ सोमैय्या, दोनो बहनें, बास्केटबॉल कोर्ट के पास ही एक छोटे से घर में रहती हैं.

आफ़रीन 12वीं कक्षा की छात्र हैं जबकि सोमैया 10वीं की. आफ़रीन बताती हैं कि उनके पिता बास्केटबॉल के खिलाड़ी थे लेकिन ग़रीबी के वजह से उन्हें ये खेल छोड़ना पड़ा, लेकिन वो अब चाहते हैं कि उनकी बेटियाँ उनके इस सपने को पूरा करें.

Image caption सुविधाओं के अभाव में भी आफ़रीन और सोमैय्या के उत्साह में कोई कमी नहीं.

आफ़रीन कहती हैं, ‘मैं बास्केटबॉल में अपनी ज़िंदगी देख रही हैं. मैं अपने डैडी का सपना पूरा करना चाहती हूँ.’

तो उन्हें कैसा लगता है जब वो दोनों बहनें बास्केटबॉल खेलती हैं जबकि नागपाड़ा की दूसरी लड़कियाँ घर का कामकाज करती हैं या फिर कुछ और?

सोमैय्या हँस पड़ती हैं और कहती हैं, ‘हमारे मम्मी-डैडी बहुत अच्छे हैं कि वो हमें रोकते टोकते नहीं हैं. मुस्लिम परिवारों में बास्केटबॉल खेलने की इजाज़त मुश्किल से ही मिलती है. वहाँ लड़कियों को बोला जाता है कि लड़कियों का बास्केटबॉल खेलना अच्छी बात नहीं है. उन्हें घर में बैठकर पढ़ना-लिखना चाहिए और फिर खाना बनाना चाहिए. ये ठीक नहीं है.’

दो साल पहले शुरूआत

इस महिला टीम की शुरूआत क़रीब दो साल पहले हुई.

लड़कों को खेलते देख कुछ लड़कियाँ मैच देखने आया करती थीं और उनमें बास्केटबॉल खेलने की इच्छी जगी.

ये देखकर एनबीए के अधिकारियों ने महिला टीम बनाने की सोची. उनके परिवारवालों ने विरोध किया तो उन्हें ये कहकर समझाने की कोशिश की गई कि खेल खेलने से उन्हें स्कूल में दाख़िला आसानी से मिल जाएगा, या फिर उनकी सेहत अच्छी बनी रहेगी. आख़िरकार वो मान गए.

टीम के कोच अब्दुल रशीद लड़कियों की तारीफ़ करते नहीं थकते.

वो कहते हैं, ‘ज़रीन ने एक राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व किया है. आफ़रीन के बारे में लोग कहते हैं कि इसमें शॉट्स में ज़बरदस्त शक्ति है. टूर्नामेंट आयोजक आफ़रीन के बारे में कहते हैं कि उसे टूर्नामेंट में ज़रूर लाया जाए. ये सभी लड़कियाँ ज़बरदस्त खिलाड़ी हैं.’

कुछ ख़ास करने की चाह

नागपाड़ा के बारे में कहा जाता है कि जिस तरह शिवाजी पार्क का संबंध क्रिकेट से है, उसी तरह से नागपाड़ा के लिए बास्केटबॉल महत्वपूर्ण है.

इस इलाक़े से कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के बास्केटबॉल खिलाड़ी उभरे हैं , अब ये लड़कियाँ यहाँ का नाम रोशन कर रही हैं.

लेकिन सवाल ये है कि बिना सुविधाओं के इन लड़कियों का क्या भविष्य है?

पूर्व भारतीय अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी अब्बास मुंतज़िर जिनका घर कोर्ट के बग़ल में ही है, कहते हैं कि इन लड़कियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ना बेहद मुश्किल है, हालांकि लड़कियाँ बहुत मेहनत कर रही हैं.

लेकिन इन लड़कियों में कुछ कर दिखाने की ज़बरदस्त इच्छा है.

संबंधित समाचार