बांधों के विरोध में उत्तर-पूर्व के संगठन

  • 8 जुलाई 2010
Image caption रिवर बेसिन फ़्रेंड्स के डायरेक्टर रवींद्र नाथ का कहना है कि बांधों के कारण नदियों में पानी के झरनों की कमी हो जाएगी

भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में पर्यावरण और मानवाधिकार के प्रति समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं, किसानों और आम नागरिकों ने इस इलाक़े में बड़े बांधों के निर्माण के ख़िलाफ़ अपना आंदोलन तेज़ करने की योजना बनाई है.

सरकार ने उत्तर-पूर्वी राज्यों ख़ास तौर से चीन की सीमा से लगे राज्य अरुणाचल प्रदेश में क़रीब 700 बांध बनाने की योजना तैयार की है जिनमें से कुछ बड़ी पनबिजली परियोजनाएं भी शामिल हैं.

इन परियोजनाओं के पूरा होने पर उम्मीद की जा रही है कि इनसे लगभग 40 हज़ार मेगावाट बिजली पैदा होगी जोकि भारत के आर्थिक विकास की गति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताई जा रही है.

उत्तर-पूर्वी राज्यों के किसानों, आम नागरिकों के प्रतिनिधियों, मानवाधिकार और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित संगठनों ने पिछले सप्ताह दो दिनों तक असम के शहर गुवाहाटी में जलवायु परिवर्तन पर विचार-विमर्श किया.

असम की कृषक मुक्ति संग्राम समिति (केएमएसएस) के अध्यक्ष अखिल गोगोई ने कहा, "हम लोगों ने जलवायु परिवर्तन पर बात की लेकिन क्षेत्र के पर्यावरण और आजीविका के लिए बड़ा ख़तरा सरकार की बड़े-बड़े बांध परियोजनाओं से है."

गोगोई ने कहा कि उनका संगठन हज़ारों की संख्या में किसानों को लामबंद कर रहा है और वे लोग 15 जुलाई को असम की राजधानी दिसपुर का घेराव करके बड़े बांधों के निर्माण के खिलाफ़ प्रदर्शन करेंगे.

गोगोई ने कहा कि बड़े बाधों के निर्माण की ज़बर्दस्त विरोधी मेधा पाटकर इस अभियान में शामिल होंगी.

गोगोई ने बीबीसी से कहा, "अरुणाचल प्रदेश में इतनी ज़्यादा संख्या में बांधों के निर्माण से किसी बड़े भूकंप के नतीजे में असम राज्य पूरी तरह से असुरक्षित हो जाएगा क्योंकि ये बांध भूकंप प्रतिरोधी नहीं हैं."

भूकंप का ख़तरा

असम में दो बड़े स्तर के भूकंप आ चुके हैं. एक 1897 में आया था और दूसरा 1950 में आया था जिसमें हज़ारों लोगों की मौत हो गई थी और करोड़ों की संपत्ति को नुक़सान पहुंचा था.

Image caption अरुणाचल नागरिक पहल के अध्यक्ष बमन टागो ने बांध परियोजनाओं के ख़िलाफ़ जनहित याचिक दायर की है

जहां इन बांधों के ख़तरे को लेकर केएमएसएस जैसे संगठन आंदोलन के लिए सामने आए हैं वहीं अरूणाचल प्रदेश के संगठनों को ये शिकायत है कि इन बांधों के निर्माण से राज्य का बड़ा हिस्सा पानी में डूब जाएगा, बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा और स्थानीय पर्यावरण को नुक़सान पहुंचेगा.

अरुणाचल नागरिक पहल के अध्यक्ष बमन टागो ने कहा, "अरुणाचल प्रदेश दुनिया की तीन सबसे बड़ी जैव-विविधता का केंद्र है जहां पक्षियों, जानवरों, तितलियों और पौधों की हज़ारों लुप्त होती हुई प्रजातियाँ हैं और बांध के बनने से ये सारी पानी के नीचे चली जाएंगी."

उन्होंने कहा, "हम लोगों इसके विरुद्ध अदालत में जनहित याचिका दायर की है लेकिन अब हम इसके लिए सड़कों पर उतर आए हैं क्योंकि बिना इसके सरकार हमारी बात नहीं सुनेगी."

उन्होंने ये भी कहा, "हम देखते हैं कि किस तरह सरकार जलवायु परिवर्तन करती है. इसके लिए हम पश्चिमी देशों को दोष नहीं दे सकते. इसके लिए दिल्ली ज़िम्मेदार है."

असम में पर्यावरण संरक्षण संगठन रिवर बेसिन फ़्रेंड्स के डायरेक्टर रवींद्र नाथ ने कहा कि इन बांधों के कारण नदियों में पानी के झरनों की कमी हो जाएगी जिससे खेती और जैवविविधता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.

उन्होंने कहा, "आख़िर बाक़ी देश के लिए बिजली पैदा करने के लिए उत्तर-पूर्वी राज्य क्यों अपनी विशिष्ट जैव-विविधता से हाथ धो बैंठे और अन्य प्रतिकूल नतीजे भोगे."

लेकिन बहुत से लोगों ने जनसंख्या संबंधी चिंताएं भी जताईं.

उत्तर-पूर्वी राज्य के ह्यूमन राइट्स अलर्ट के बबलू लोइथंगबम ने कहा, "लाखों लोग भारत के दूसरे राज्यों से इन बड़े बांधों के निर्माण के सिलसिले में अरुणाचल प्रदेश आएंगे जिससे राज्य की जनसंख्या प्रभावित होगी क्योंकि यह अभी स्पष्ट रूप से आदिवासी बाहुल्य प्रदेश है."

उन्होंने कहा, "अभी तक अरुणाचल शंतिपूर्ण रहा है लेकिन इसकी आबादी में बदलाव से इसमें भी परिवर्तन आएगा."

भारत की नेश्नल हाइडल पावर कार्पोरेशन (एनएचपीसी) की विशेषज्ञों की एक समिति ने भी हिमालय की तराई में बड़े बांधों के निर्माण का विरोध किया है.

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