भारत में मिली रयान को आवाज़

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साढ़े तीन साल का रयान किसी भी नन्हें-मुन्ने की तरह ख़ूब मस्ती करता है. इधर से उधर भागते रयान को पकड़ने के लिए उनकी माँ पीछे-पीछे भागती हैं और उनका नाम पुकारती हैं..बार-बार आवाज़ देने पर जब रयान पीछे मुड़कर देखता है तो माँ और पिता दोनों के चेहरे पर अलग तरह का सुकून देखा जा सकता है.

रयान अपने माता-पिता के साथ पाकिस्तान से भारत आया है, इलाज के लिए. राजनीतिक मतभेदों से परे मानवीय स्तर पर तालमेल से कितनी ज़िंदगियाँ संवर सकती हैं, नन्हा रयान उसकी बड़ी मिसाल है.

दरअसल रयान चंद महीनों का था जब उनकी माँ को एहसास हुआ कि वो किसी बात पर प्रतिक्रिया नहीं देता. टेस्ट से पता चला कि रयान सुन नहीं सकता और इसलिए बोल भी नहीं पा रहा.

अब जब रयान हमारी बात सुन पाता है, उस पर प्रतिक्रिया देता है तो मैं ख़ुदा का शुक्र अदा करती हूँ. मेरा ये बहुत बड़ा ख़्वाब था कि रयान का इंप्लाट हो जाए ताकि वो सुन-बोल सके, मैं नहीं चाहती थी कि वो उम्र भर साइन लेंग्वेज में जिए, इसी तरह ज़िंदगी गुज़ार दे

रयना की माँ

पाकिस्तान के कराची शहर में शुरुआती इलाज हुआ पर नतीजे बहुत अच्छे नहीं रहे. परिवार को सलाह दी गई कि भारत में रयान का इलाज बहुत अच्छे से हो सकता है.

बस फिर क्या था इंटरनेट और फ़ोन के ज़रिए गुड़गाँव के पारस अस्पताल से संपर्क हुआ. परिवार भारत आ गया और यहाँ के डॉक्टर अमिताभ मलिक ने रयान की जाँच परख के बाद उसकी सफल सर्जरी की. इंप्लांट के बाद अब वो सुन सकता है. आवाज़ें पहचानते रयान को देखकर जैसे माँ का अरमान पूरा हो गया है.

एरूम रियाज़ कहती हैं, "अब जब रयान हमारी बात सुन पाता है, उस पर प्रतिक्रिया देता है तो मैं ख़ुदा का शुक्र अदा करती हूँ. मेरा ये बहुत बड़ा ख़्वाब था कि रयान का इंप्लाट हो जाए ताकि वो सुन-बोल सके, मैं नहीं चाहती थी कि वो उम्र भर साइन लेंग्वेज में जिए, इसी तरह ज़िंदगी गुज़ार दे. जन्म के बाद जब रयान सुन नहीं सकता तो वो शुरुआती दौर बहुत तकलीफ़देह रहा पर हमने हिम्मत नहीं हारी. अब लगता है कि जब जहाँ तक पहुँच गईं हूँ तो आगे का सफ़र भी तय कर लेंगे."

रिश्तों की डोर

एक ओर जहाँ अपनी अगली पीढ़ी यानी बेटे के इलाज की वजह से रिज़वी परिवार का रिश्ता भारत से जुड़ गया है तो रिश्तों की ये रेश्मी डोर अतीत से भी जुड़ी हुई है. रयान के पिता आसिम रियाज़ के पूर्वज बटवारे से पहले पंजाब के अमृतसर में रहते थे.

वे बताते हैं, "जब से मैं भारत आया हूँ मेरे बाबा फ़ोन पर यही पूछते रहते हैं कि क्या मैं अमृतसर नहीं जा सकता? वे कहते रहते हैं कि मैं जगह बता देता हूँ कि कहाँ-कहाँ जाना है, शायद वहाँ लोग बता सकें कि हमारा घर कहाँ था. मुझे इस ज़मीन से बहुत प्यार है क्योंकि ये मेरे पूर्वजों की ज़मीन थी."

बताते-बताते उनका गला रुंध जाता है. लेकिन अपने पिता का हाथ खींचता नन्हा रयान जल्द ही अपनी शरारतों से उनका ध्यान बंटा देता है.

ऐसे माहौल में जब भारत-पाक रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं क्या भारत आने से पहले परिवार के मन में आशंकाएँ थीं?

मेरे पूर्वज का रिश्ता पंजाब के अमृतसर से है. जब से मैं पाकिस्तान से भारत आया हूँ मेरे बाबा फ़ोन पर यही पूछते रहते हैं कि क्या मैं अमृतसर नहीं जा सकता? वे कहते रहते हैं कि मैं जगह बता देता हूँ कि कहाँ-कहाँ जाना है, शायद वहाँ लोग बता सकें कि हमारा घर कहाँ था. मुझे इस ज़मीन से बहुत प्यार है क्योंकि ये मेरे पूर्वजों की ज़मीन थी.

आसिम रियाज़, रयान के पिता

रयान के पिता बताते हैं, "मेरे पास भारत आने का बहुत बड़ा कारण था- मेरा बेटा. यही मोटिवेशन मेरे लिए काफ़ी थी. इसके आगे सारी बातें बेमानी थी मेरे लिए. भारत और पाकिस्तान के लोगों में कोई अंतर नहीं. यहाँ भी हमसे लोग प्यार-मोहब्बत से ही मिले. पाकिस्तान में कितने ही ऐसे परिवार होंगे जिन्हें वैसी ही सर्जरी की ज़रूरत है जैसी रयान की हुई."

रयान को तो इस बहस से अभी कोई वास्ता ही नहीं. सर्जरी के बाद दिल्ली में रहकर वो अभी नई-नई आवाज़ें सुनने-समझने की कोशिश कर रहा है, उसका बालमन भारतीय या पाकिस्तानी आवाज़ों में फ़र्क नहीं करता. रयान के माता-पिता की तमन्ना अब उसे अच्छी तरह बोलते हुए देखने की है.

हमसे विदा लेते हुए रयान की माँ ने कहा कि अगली बार जब वे भारत आएँगे तो रयान पूरी तरह बोलना सीख चुका होगा और तब वो हमें इंटरव्यू देगा... हम भी यही उम्मीद करते हैं.आख़िर उम्मीद पर दुनिया कायम है.

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