'मामलों के आपसी निपटारे की संस्कृति को बढ़ावा मिले'

Image caption सर्वोच्च न्यायालय के सबसे सीनियर जज एसएच कपाड़िया मई में मुख्य न्यायाधीश बने हैं

भारत के मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया ने कहा है कि भारत में अदालत के बाहर मामलों के आपसी निपटारे की संस्कृति नहीं है और इसीलिए देश में बड़ी संख्या में मामले लंबित रहते हैं.

दिल्ली में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, “विदेशों में कई क़ानूनी मामलों का निपटारा मध्यस्थता के ज़रिए हो जाता है, ये तरीक़ा वहाँ काफ़ी सफल है. लेकिन भारत में लोगों का इस तरीके की ओर रुझान नहीं है.”

मुख्य न्यायधीश का कहना था ज़रूरत है कि भारत में इस ओर लोगों का ध्यान खींचा जाए.

उन्होंने कहा, “लोगों को वक़्त की अहमियत समझनी चाहिए. मामलों के जल्द निपटारे के लिए न्यायपालिका व्यावसायिक अदालतों का गठन करने पर विचार कर रही है.”

वक़्त की अहमियत

इस सम्मेलन में मौजूद सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों ने भी कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किए और कहा कि अदालतों पर बोझ कम करने के लिए लोगों को निपटारे के वैकल्पिक तरीके अपनाने चाहिए.

वरिष्ठ जज ए कबीर ने कहा, “हमारे ऊपर काम का जो बोझ है उसके लिए किसी को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन इस समस्या का हल हमें निकालना होगा.”

वहीं जस्टिस आरवी रविंद्रन ने कहा कि लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के कारण ऐसे मामलों को समय देना मुश्किल हो गया है जिनपर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों के लिए समय निकालना ज़रूरी है जिन्हें किसी तरह की मध्यस्थता से नहीं निपटाया जा सकता जैसे आपराधिक मामले, चुनाव से जुड़े मामले या प्रशासनिक मामले.

संबंधित समाचार