आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की सलाह

  • 14 जुलाई 2010
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु और कर्नाटक की सरकारों से कहा कि वे सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षित श्रेणियों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण वाले कानूनों पर फिर से विचार करें.

अदालत ने मंगलवार को कहा कि नौकरियों और नियुक्तियों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण देने का अंतरिम आदेश एक साल का जारी रहेगा. इसके तहत तमिलनाडु में 69 प्रतिशत और कर्नाटक में 50 प्रतिशत से अधिक का आरक्षण देने का प्रावधान है.

प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडिया, न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन तथा न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार के पीठ ने याचिकाओं के दो बैच पर अलग-अलग फ़ैसला सुनाया और स्पष्ट किया कि पीठ कानूनों की वैधता पर कोई विचार नहीं दे रहा है.

याचिकाओं के पहले बैच में तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और सरकारी सेवाओं में नियुक्ति) क़ानून, 1993 को चुनौती दी गई थी, जिसमें 69 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है.

याचिकाओं के दूसरे बैच में कर्नाटक अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों में आरक्षण और सरकारी सेवाओं में नियुक्ति) कानून 1994 को चुनौती दी गई थी, जिसमें 73 प्रतिशत आरक्षण की बात है.

तमिलनाडु के आरक्षण संबंधी क़ानून पर पीठ ने कहा कि सरकार समस्त उपलब्ध आंकड़ों को राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के समक्ष रखे, जो आरक्षण के मुद्दे पर पुनर्विचार करेगा.

अदालत ने कहा कि यदि सरकार आरक्षण के लिए 50 प्रतिशत की सीमा को बढ़ाना चाहती है तो तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग को मंडल आयोग के फैसले में शीर्ष न्यायालय द्वारा तय कुछ मानदंडों को संज्ञान में लेना होगा.

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