थोड़े से चावल के लिए लंबा सफ़र

  • 22 जुलाई 2010
चावल का वितरण

मेरी मजबूरी यह है कि न मैं इनका नाम लिख सकता हूँ और न इनका पता बता सकता हूँ. ज़ाहिर है अगर मैंने ऐसा किया तो पुलिस या माओवादी इनके पीछे पड़ जाएँगे.

मैं ऐसे लोगों की बात कर रहा हूँ जो बस्तर के अबूझमाड़ के दूर-दराज के इलाकों से यहाँ अनाज लेने आए हुए हैं. इनमें से कुछ तो 50 किमी से भी ज्यादा दूरी तय कर कुरूसनार के सीआरपीएफ़ कैंप के पास स्थित जन वितरण प्रणाली की दुकान पर चावल लेने आए हैं.

इतना लंबा सफ़र तय कर पहुँचे इन लोगों का वापसी का सफ़र और कठिनाइयों से भरा हुआ होगा क्योंकि अब ये अपने साथ बोझ भी ले जाएँगे.

पेट के लिए

इनमें से बहुत से बुधवार की रात रास्ते में पड़ने वाले किसी गाँव में गुजारकर अगली सुबह अपने गाँव तक का सफ़र तय करेंगे. मानसून इनकी राह की और कठिन बना रहा है.

कुरुसनार अबूझमाड़ की पहली पंचायत है. यहाँ जनवितरण प्रणाली की दो दुकानें हैं. एक नारायणपुर ब्लाक के गाँवों के लिए है और दूसरी दुकान अबूझमाड़ के लिए.

पहले यहाँ के लोगों को उनके हिस्से का चावल उनकी ही पंचायतों से मिला करता था. लेकिन अब यहाँ युद्ध जैसे हालत हैं.पुलिस का कहना है कि इन दुकानों से मिलने वाला चावल सीधे माओवादियों तक पहुँच जाता है.

माओवादियों की इस कड़ी को तोड़ने के लिए अब अबूझमाड़ के पुलिस या सीआरपीएफ़ कैंपों से चावल का वितरण किया जा रहा है.प्रशासन के इस नए कदम से अबूझमाड़ के अंदर रहने वाले लोग परेशान हैं.

कुरूसनार के इस कैंप के पास जमा लोग अबूझमाड़ के सुदूर इलाकों से आए हैं. इनमे ज़्यादातर लोग हिंदी नहीं जानते इसलिए मैंने अपने स्थानीय मित्र अभिषेक झा से दुभाषिए का काम करने को कहा.

मानसून की रिमझिम फुहारों के बीच औरतें, बूढ़े-बच्चे लाइन लगाकर छोटी-छोटी पहाड़ियों से अपने हिस्से का चावल लेने उतर रहे थे.

नई व्यवस्था बनी पेरशानी

भीड़ में मौजूद एक बुज़ुर्ग नें का कहना था कि इस नई व्यवस्था के कारण दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने हिस्से का अनाज लेने नहीं आ सकते. इनमें वे लोग हैं जिनके घर में कोई जवान लड़का नहीं है या फिर वे जो बीमार हैं.

बुज़ुर्ग का कहना था,"नई व्यवस्था नें एक बड़े इलाके में रहने वाले लोगों को भुखमरी के कगार पर पहुँचा दिया है जिनके गाँव 40 या 50 किलोमीटर दूर हैं. ऐसे लोग जंगली पत्ते या जडें खाकर गुज़ारा कर रहे हैं."

Image caption लोगों को 35 किलो चावल लेने के लिए 50 किमी तक का सफ़र करना पड़ता है.

एक दूसरे ग्रामीणों का कहना था की वे पुलिस और माओवादियों के बीच चल रहे संघर्ष में बुरी तरह पिस रहे हैं. उनका कहना था,"पुलिस कैंप से चावल लेने वालों से सवाल-जवाब करती है. वापस गाँव जाते हैं तो माओवादी पूछते हैं पुलिस नें क्या पूछा.

उन्होंने कहा, ''हम दोनों को किस तरह संतुष्ट करें यह समझ में नहीं आता है. यहाँ अविश्वास का माहौल है. पुलिस समझती है हम माओवादियों के समर्थक हैं तो माओवादी समझते हैं हम पुलिस के मुखबीर हैं."

कुरूसनार के अलावा कुक्रजोर स्थित छत्तीसगढ़ शसस्त्र पुलिस बल के कैंप से अनाज के वितरण की व्यवस्था की गई है.

कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा चलाई जा रही जन वितरण प्रणाली देशभर में सबसे अच्छी है. इसके तहत ग़रीबों को एक रुपए प्रति किलो की दर से चावल दिया जाता है.

लेकिन छत्तीसगढ़ में माओवादियों और पुलिस की लड़ाई का असर इस व्यवस्था पर पड़ रहा है.

सरकार की कोशिश

नारायणपुर के पुलिस अधीक्षक राहुल भगत का कहना है कि यह व्यवस्था इसलिए की गई है जिससे लोगों को सही तरीके से अनाज मिल सके.

उन्होंने बताया, "ऐसी खबरें आ रहीं थीं कि जनवितरण प्रणाली का अनाज माओवादी लूट लेते हैं. लेकिन प्रशासन अब कोशिश कर रहा है कि लोगों को उनका हिस्सा मिल सके.

राज्य के गृहमंत्री ननकी राम कँवर कहते हैं कि बस्तर के सुदूर इलाकों के लोगों को दिए जाने वाले अनाज के ट्रक माओवादी लूट लेते हैं.इसलिए सरकार को यद कदम उठाना पड़ा है .

आज से एक साल पहले तक अबूझमाड़ के सुदूर इलाकों में अनाज राम कृष्ण मिशन के पांच केंद्र बांटा करते थे. लेकिन सरकार नें इस व्यवस्था को ख़त्म कर दिया.

मिशन के स्वामी सतीश कहते हैं,"अबूझमाड़ के अंदर आकाबेदा, कुतुल, कुंडला, हीरकभट्टी और कच्चापाल में हमारे पांच केंद्र हैं. वहाँ से हम अनाज बाँटा करते थे. हमारी व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही थी. मगर अब सरकार नें हमे ऐसा करने से मना कर दिया है."

मानसून के दौरान अबूझमाड़ के एक बड़े हिस्से का संपर्क देश के बाकी हिस्से से कट जाता है. इसलिए रामकृष्ण मिशन चार महीने का अनाज पहले ही दूर-दराज के उन इलाकों में जमा कर लिया जाता था.

इससे वहाँ के हालात काबू में रहते थे. मगर नई व्यवस्था के लागू होने के बाद से अब लोगों का बुरा हाल है. सतीश कहते हैं, "अब तक सरकार नें अबूझमाड़ के अंदर स्थित हमारे आश्रमों में रहने वाले बच्चों के लिए अनाज जमा करने की अनुमति तक नहीं दी है."

माओवादियों का असर

तो क्या यह माना जाए कि इस व्यवस्था के बाद अब माओवादियों को अनाज नहीं मिल रहा है ? ऐसा बिलकुल नहीं है. कुरूसनार और कुक्रजोर के केंद्रों से अनाज लेने आए ज़्यादातर लोगों का कहना है की उन्हें अपने हिस्से में से पाँच किलो तक अनाज माओवादियों को देना पड़ता है.

Image caption चावल के वितिरण केंद्र सीआरपीएफ़ और पुलिस के कैंप में बनाए गए हैं.

एक ग्रामीण का कहना था, "एक कार्ड पर 35 किलो तक अनाज मिलता है. इसमें से पाँच किलो माओवादियों को देना ही पड़ेगा. यह उनके प्रभाव का इलाका है. हम चाह कर भी उन्हें मना नहीं कर सकते हैं."

प्रशासन की इस नई व्यवस्था का विरोध होना शुरू हो गया है. नारायणपुर की जनपद पंचायत के पूर्व अध्यक्ष रजनू नेताम का कहते हैं,"माओवादी भूखे थोड़े ही रह रहे होंगे. उनकी अपनी व्यवस्था है. मगर आम आदमी का क्या जो सिर्फ इसी पर निर्भर है. ऐसा कर प्रशासन नें इलाके में भुखमरी के हालत पैदा कर दिए हैं. मानसून में तो हालात बद से बदतर हो गए हैं."

विरोध अब मुखर होने लगा है हाल ही में अबूझ माड़ में रहने वाले सैकड़ों ग्रामीणों नें नारायणपुर जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन कर चावल वितरण की पुरानी व्यवस्था को बहाल करने की माँग की.

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