बर्फ़ीला रेगिस्तान लहलहाया

भारत-चीन सीमा पर वृक्षारोपण

भारत–चीन सीमा पर 12,000 फुट की ऊंचाई के दुर्गम इलाके में कभी बर्फ़ीला रेगिस्तान हुआ करता था लेकिन आज ‘इको टास्क फ़ोर्स’ की बदौलत वहां हजारों एकड़ में जंगल पनप रहे हैं. इस इलाक़े के ग्लेशियर और नदियों को भी इससे नया जीवन मिला है.

सुबह क़रीब चार बजे उत्तराखंड के चमोली ज़िले के माणा गांव में सेना के कैंप में मोर्चे पर जाने की तैयारी शुरू हो गई है.

राइफलमैन हुकुम सिंह और राइफलमैन बलवंत सिंह वर्दी में तैनात अपनी टुकड़ी को जरूरी निर्देश दे रहे हैं. ट्रकों और जीपों में पौध, तार-बाड़ और खाद-पानी लादा जा रहा है. दरअसल सेना का ये मोर्चा दुश्मन से लोहा लेने के लिये नहीं है बल्कि पर्यावरण को बचाने के लिये है.

भारतीय सेना के विशेष दस्ते ‘इको टास्क फोर्स’ के ये सैनिक कई किलोमीटर की

लंबी-खड़ी चढ़ाई और दुर्गम दर्रों को पार करके हिमालय के ऊंचे इलाक़ों में पेड़ लगाने की इस बेहद कठिन मुहिम में जुटे हुए हैं. उनका जज़्बा देखते ही बनता है.

स्थानीय रंगकर्मी सुनील मैखुरी कहते हैं, “अब तक हम पुराणों में ही बद्रीवन के बारे में पढ़ते थे लेकिन इन सैनिकों ने वास्तव में बद्रीनाथ के आस-पास बद्रीवन बना दिया है.”

जोशीमठ में डॉक्टर संजय डिमरी का कहना है, “यहां के पहाड़ उजाड़ हो चुके थे. लेकिन इन सैनिकों ने धूप–सर्दी की परवाह न करते हुए यहां जंगल लगाए हैं और आज हम प्रसिद्ध नीलकंठ के पहाड़ों को हरा-भरा देख पाते हैं.”

उत्तराखंड के चमोली जिले में भारत-चीन सीमा पर आखिरी गांव हैं नीति-माणा. यहां एक तरह से ‘ट्री लाइन’ यानी कि वृक्ष रेखा ख़त्म हो जाती है और ‘आइस लाइन’ यानी कि पूरी तरह से बर्फ़ीला इलाक़ा शुरू होता है.

पिछले कुछ समय से बढ़ती मानव गतिविधियों और अनियंत्रित निर्माण से यहां के पर्यावरण का ह्रास चिंता का विषय था क्योंकि ये इलाका हिमालय के कई महत्वपूर्ण हिमनदों और ग्लेशियर का स्त्रोत था.

नया जीवन

भारतीय सेना की ‘इको टास्क फ़ोर्स’ को करीब तीन साल पहले इस क्षेत्र में पेड़ लगाने और यहां के पर्यावरण को नया जीवन देने का काम सौंपा गया था.

Image caption पेड़ लगाते सेना की इको टास्क फ़ोर्स के जवान

इको टास्क फोर्स के कर्नल हरिराज सिंह राणा बताते हैं कि, “नीति, माणा औऱ नीलंकंठ के इस पूरे इलाक़े में करीब 1000 हेक्टेयर में 7 लाख 50 हज़ार से ज्यादा पेड़ लगाए गये हैं.”

इनमें कैल, देवदार और थुनेर जैसे लुप्तप्राय वृक्ष भी शामिल हैं.

हांलाकि उत्तराखंड के अपर प्रमुख वन संरक्षक श्रीकान्त चंदोला की राय है कि सेना का वृक्षारोपण सफल तो है लेकिन ये और भी सार्थक होता जब यहां वन तुलसी, जंगली अजवाइन, फरण और सफेद पुरचा जैसी स्थानीय तौर पर प्रचलित जड़ी-बूटियों की प्रजातियां लगाई जातीं. जिससे ढलानों पर हिमस्खलन को रोकने में भी मदद मिलती.

1981-82 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहल पर ख़ासतौर से मसूरी की पहाड़ियों के पुनर्जीवन के लिये ‘इको टास्क फ़ोर्स’ की स्थापना की गई थी.

मसूरी की पहाड़ियां उस समय अवैध कटान और अंधाधुंध खनन से उजाड़ और नंगी हो चुकी थीं. सेना के इस दस्ते ने मसूरी और कैंपटी इलाके में भी 46 हज़ार हेक्टेयर में 55 लाख से अधिक पेड़ लगाकर पहाड़ों की रानी मसूरी को नया जीवन दिया है.

‘इको टास्क फ़ोर्स’ इस समय देश भर में इसकी 8 यूनिट हैं और उत्तराखंड में ही चार और कंपनियां बनाई जा रही हैं.

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