सरिस्का में आया नया मेहमान

  • 21 जुलाई 2010
बाध (फ़ाइल फ़ोटो)

राजस्थान के रणथंभौर अभ्यारण्य से एक और बाघ को सरिस्का के जंगलों में आबाद किया गया है. सरिस्का में एक समय 25 बाघ दहाड़ा करते थे लेकिन चार साल पहले इसे बाघ विहीन घोषित कर दिया गया था.

यहाँ के बाघ एक-एक कर शिकारियों के हत्थे चढ़ते चले गए लेकिन अब सरिस्का को एक बार फिर बाघों से आबाद किया जा रहा है.

इससे पहले भी रणथंभौर से ही तीन बाघ हवाई मार्ग से सरिस्का ले जाए गए थे.

लेकिन यह पहला मौक़ा है जब किसी बाघ को सड़क मार्ग से ले जाया गया है. इस अवसर पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश भी मौज़ूद थे.

जयराम रमेश ने बाघों का इस विस्थापन को पूरी तरह सुरक्षित बताया.

वन अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि रणथंभौर के कुंडला क्षेत्र में विचरण कर रहे टी-12 नाम के बाघ को पहले बेहोश किया गया और फिर एक खास पिंजरे में रख कर वहाँ से सड़क के रास्ते सरिस्का पहुँचा दिया गया है.

ठीक इसी तरह एक नर और दो मादा बाघों को वहाँ आबाद किया जा चुका है.

इन तीन बाघों के भेजे जाने के बाद भी जब उनका कुनबा नहीं बढ़ा तो यह कहा गया कि सरिस्का ले जाए गए बाघ एक ही परिवार के हैं इसलिए आबादी नहीं बढ़ पा रही है.

इसे देखते हुए इस बार वन अधिकारियों ने पूरी सावधानी बरती है और टी-12 का सभी तरह का जैविक परीक्षण करा कर ही उसे सरिस्का भेजा गया है.

बाघ की दहाड़

जयपुर से 110 किलोमीटर दूर अरावली की पहाड़ियों में स्थित सरिस्का बाघों के लिए एक बेहतरीन पनाहगाह माना जाता है.

सरिस्का के जंगलों का वैज्ञानिक तरीके से रख रखाव का इतिहास करीब एक सदी पुराना है. रियासत काल में वहाँ अलवर रियासत ने 1935 में वन अधिनियम बना लिया था. आज़ादी के बाद 1958 में इसे अभ्यारण्य का दर्जा दे दिया गया.

सरिस्का में चीतल, संभार, नील गाय, बंदर, बघेरा, जंगली बिल्ली और परिंदों की कोई दो सौ प्रजातियाँ पाई जाती है. लेकिन इन पर सल्तनत करने वाले बाघों को शिकारियों ने मार डाला था.

रणथंभौर से लाए गए बाघों की बदौलत अब उम्मीद है कि सरिस्का में एक बार फिर बाघों की दहाड़ से सुनी जा सकेगी.

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