वाघा पर नए तरह से होगी 'रिट्रीट' परेड

रीट्रिट समारोह

भारत-पाकिस्तान की वाघा सीमा पर हर शाम होने वाले रिट्रीट समारोह के दौरान भारत-पाकिस्तान के जवानों की मुद्रा अब वैसी आक्रामक दिखाई नहीं देगी जैसी अब तक दिखाई देती है.

सूर्यास्त के समय क़रीब 45 मिनट तक चलने वाली इस परेड में जवान ज़ोर से अपने पैर पटकते हैं, तेज़ी से मार्च करते हैं और लगभग चीख़कर सलामी देते थे.

लेकिन अब इसके तेवर बदलने वाले हैं.

यह परेड शाम को झंडों को उतारे जाने और वाघा की सीमा पर दोनों ओर के दरवाज़ों को बंद करने के साथ ख़त्म होती है.

आकर्षण का केंद्र

यह 'रिट्रीट' समारोह बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है. सीमा के दोनों ओर हर शाम कऱीब 20 हज़ार लोग इसे देखने पहुँचते हैं.

इसकी शुरुआत 1959 में हुई थी. भारत की ओर से इसमें सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) और पाक की ओर से पाकिस्तान रेंजर्स के जवान भाग लेते हैं.

पाकिस्तान रेंजर्स के एक प्रवक्ता के मुताबिक़ दो महीने पहले भारत के अनुरोध के बाद दोनों तरफ़ से इस आक्रामकता को कम करने का फ़ैसला किया गया.

पाकिस्तान रेंजर्स के नदीम राजा ने बीबीसी से कहा,'' भारत की ओर से बीएसएफ़ ने बाघा पर होने वाले रिट्रीट समारोह की आक्रामकता में कमी लाने का अनुरोध किया था और कुछ महीने पहले से हमने इस पर अभ्यास भी शुरू कर दिया था.''

उन्होंने कहा,'' इसमें हम थोड़ा सा बदलाव कर रहे हैं, परेड के दौरान अब अंगूठा नहीं दिखाएँगे और आक्रामक हाव-भाव की जगह हाथ मिलाया जाएगा.''

लेकिन उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी जवान पैरों को लगभग कंधे की ऊँचाई तक उठाकर उन्हें पटकने का अभ्यास जारी रखेंगे क्योंकि यह किसी सैनिक के लिए गर्व की बात है और स्वस्थ होने का प्रतीक है.

भारत का अनुरोध

बीएसएफ़ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा,''भारत ने इस 'शत्रुता' को कम करने के कई प्रयास किए लेकिन पाकिस्तानी रेंजर्स ने अभी हाल तक अपनी दिनचर्या में बदलाव लाने से इनकार कर दिया था.''

हिम्मत सिंह ने बीबीसी से कहा,'' अब हम 'रिट्रीट' समारोह के हिस्सा रहे आक्रामक हाव-भाव को काफ़ी कम करने पर सहमत हुए हैं.''

भारत ने 'रिट्रीट' समारोह में भाग लेने के लिए महिला जवानों को तैनात किया है.

तने हुए हाथों और भिंची हुई मुट्ठियों के बिना भी 'रिट्रीट' समारोह ने माहौल को और सौहार्दपूर्ण बनाया है.

कुछ ख़बरों में कहा गया है कि इससे कुछ जवानों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ने के बाद भारत ने 'रिट्रीट' समारोह में आक्रामकता कम करने का फ़ैसला किया.

लेकिन नदीम राजा कहते हैं कि इसकी वजह से सैनिकों के पैरों में कभी चोट नहीं लगी.