दम तोड़ता गाली गायन

Image caption गाली गायन समारोह में जुटे लोग

भारतीय समाज में बहुत कुछ अनोखा है. इन्हीं में से एक है गाली गायन की विधा.

आमतौर पर गाली शब्द अप्रिय लगता है लेकिन किसी ज़माने में इन्हीं गालियों को संगीत के रस में डूबो कर सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ अभियान भी चलाए जाते थे और ये मनोरंजन के साधन भी थे.

राजस्थान के जयपुर में गाली गायन की समृद्ध परंपरा रही है. कभी गाली गायकों (जिन्हें स्थानीय बोलचाल की भाषा में गालीबाज़ भी कहते हैं) की स्पर्धा रात-रात भर हुआ करती थी. इसमें ईश्वर की वंदना से लेकर हास्य व्यंग्य और वर्तमान हालात पर टिप्पणियाँ भी होती थीं.

लेकिन अब ये कला दम तोड़ रही है. क़द्रदानों की मोहताज हो गई है. कुछ संगठन इस कला में फिर से जान फूंकने के लिए प्रयासरत हैं. हालांकि नई पीढ़ी इस कला से ज़्यादा वाकिफ़ नहीं है.

किसी ज़माने में जयपुर इस कला का प्रमुख केंद्र था. रियासती काल में ये कला बहुत फली-फूली. हर मोहल्ले के अपने गालीबाज़ थे, अखाड़े थे. लेकिन अब दर्जन भर अखाड़े ही सक्रिय रह गए हैं.

इस कला को फिर से जीवनदान देने के प्रयास में विरासत नामक संस्था जुटी हुई हैं.

संस्था के विनोद जोशी कहते हैं, "वर्ष 1860 से 1865 के बीच राजा सवाई राम सिंह के शासन काल में जोधपुर का माथुर परिवार इस विधा को जयपुर ले आया."

वैवाहिक समारोहों में गाली गायन की पुरानी परंपरा रही है. जयपुर के गाली गायन में सिर्फ़ मर्द ही हिस्सा लेते हैं.

जोशी कहते हैं, "इस गायन विधा का ढंग से प्रचार-प्रसार नहीं हुआ और लोग इसका अर्थ ग़लत ढंग से लगाते हैं, जबकि वास्तविकता हैं कि यह हमारी लोक संस्कृति का हिस्सा है."

गाली गायन में अश्लीलता नहीं

गालीबाज़ी के कलाकार इसके भविष्य को लेकर चिंतित है. इसके कलाकार झटपट रचनाएँ रच डालते थे और उसे पेश करते थे.

जयपुर के रामनारायण शर्मा इस विधा के पुराने फ़नकार हैं. वे कहते हैं, "आठ साल की उम्र से इस कला से जुड़ा हूं. रियासती काल में गालीबाज़ी एक अख़बार की भूमिका अदा करती थी. हालांकि इसमें श्रृंगार का बोलबाला होता है. साथ ही राजनैतिक टिप्पणियां भी. इसके माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किया जाता था."

कैलाश गौड़ कहते हैं, "आज लाफ़्टर चैलेंज जैसे कार्यक्रमों को ज़्यादा तवज्जो मिल रही है लेकिन ये कला उससे बेहतर है. ये ऐसी कला है जिसमें बहुत कम वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें कलाकार सामाजिक मुद्दों पर टिप्पणियां करता है. गाली का मतलब किसी व्यक्ति को उलाहना देना है."

दिलीप भट्ट गालीबाजी की कला पर मंत्र मुग्ध है. वे कहते हैं कि इसकी ख़ूबसूरती शब्दों के कसाव और चयन में है. गाली की संगीतमय गायन की अनूठी परंपरा रही है. नाटक में हीर-रांझा का मंचन किया जाता था, उसमें भी गालीबाज़ी शामिल होती थी. इसमें कोई अश्लीलता नहीं है.

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