गृहिणियाँ-भिखारी एक समान?

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराज़गी जताई है कि जनगणना में गृहिणियों को भिखारियों और क़ैदियों के साथ आर्थिक रूप से कोई योगदान न देने वाले लोगों की श्रेणी में रखा जाता है.

ये बात जस्टिस एके गांगुली और जस्टिस जीएस सिंघवी ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कही. जस्टिम गांगुली ने कहा कि 2001 की जनगणना में गृहिणियों को भिखारियों, वेश्याओं और क़ैदियों के साथ ग़ैर-कामकाजी लोगों के वर्ग में रखा है.

मामला दरअसल रेणु नाम की महिला के परिवारवालों को मिलने वाले मुआवज़े से जुड़ा हुआ है.

कुछ साल पहले रेणु की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. उनके पति अरूण को बीमा कंपनी ने मोटर वाहन एक्ट के तहत बहुत कम मुआवज़ा दिया था.

'कद्र समझें'

बीमा कंपनी का तर्क था कि रेणु एक गृहणी थीं और उनकी कोई नियमित आमदनी नहीं थीं और न ही उनका परिवार रेणु पर आश्रित था. जबकि रेणु के पति ज़्यादा मुआवज़ा माँग रहे थे.

लेकिन मोटर एक्सिडेंट क्लेम्स ट्राइब्यूनल और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अरुण की बात से असहमति जताई.

अरुण ने इसके बाद अपील दायर की थी और इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेणु के परिवार को कम मुआवज़ा दिया गया है.

साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि समय आ गया है कि संसद गृहिणियों के योगदान पर दोबारा विचार करे और उसी हिसाब से मोटर वाहन एक्ट में बदलाव हो.

जस्टिस गांगुली ने कहा कि रेणु का मामला दर्शाता है कि कैसे खाना बनाने, बर्तन साफ़ करने, बच्चों की देखभाल और पानी भरने जैसे गृहिणी के काम को आर्थिक रूप से फ़ायदेमंद काम नहीं समझा जाता.

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