दलित रसोइयों को लेकर बढ़ता बवाल

  • 24 जुलाई 2010
प्राथमिक स्कूल के बच्चे
Image caption प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की नियमित उपस्थिति सरकारों के लिए चुनौती रही है

उत्तर प्रदेश सरकारी प्राथमिक स्कूलों में दलित रसोइयों के हाथों पके भोजन का अन्य जाति के लोगों के बहिष्कार की घटनाएँ संक्रामक रोग की तरह फैलती जा रही हैं.

दलित बुद्धिजीवी इस मुद्दे पर मुखर हो रहे हैं, मगर सरकार ने अब तक चुप रहना ही बेहतर समझा है.

'मिड डे मील' यानी 'मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम' के तहत सरकारें प्राथमिक स्कूलों में बच्चों को दोपहर का खाना उपलब्ध करवाती हैं.

इस योजना का उद्देश्य प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाना, ग़रीब बच्चों को पौष्टिक भोजन देना और सामाजिक समरसता कायम करना है. माना जाता है कि बच्चे एक साथ खाएंगे-पिएंगे तो सामाजिक भेदभाव और ऊंचनीच की भावना समाप्त होगी.

दलित रसोइए

सबसे ताज़ी घटना राजधानी से सटे मोहनलाल गंज क्षेत्र की है. यहाँ प्राथमिक विद्यालय पदमन खेड़ा में सवर्ण बच्चों ने दलित रसोइये के हाथ का बना खाना खाने से इनकार कर दिया.

इससे पहले कन्नौज के बहादुर मझगवाँ में सैकड़ों ग्रामीणों ने विद्यालय पर धावा बोलकर स्कूल के फर्नीचर तोड़ डाले और अध्यापकों को बंधक बना लिया. हालात को काबू में करने के लिए पुलिस को हवाई फायरिंग करनी पड़ी.

कन्नौज में ज़िला प्रशासन की सख़्ती के बावजूद विद्यालय में हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं.

पड़ोस के कानपुर देहात, औरैया और एटा से भी इसी तरह की खबरें आई हैं कि सवर्ण जातियों के लोग अपने बच्चों को स्कूल में दोपहर का भोजन खाने से मना कर रहे हैं.

उधर सोनभद्र ज़िले से ख़बर है कि वहाँ खरवार जनजाति के लोगों ने अपने बच्चों को दलित महिला के हाथ का बना खाना खाने रोक दिया.

सरकार का पुराना आदेश है कि प्राइमरी स्कूलों में रसोइयों की नियुक्ति में दलित वर्ग की महिलाओं को प्राथमिकता दी जाए.

'मिड डे मील' प्राधिकरण के अधिकारियों के अनुसार हाल ही में एक नया आदेश जारी करके कहा गया है कि 25 छात्रों पर एक के अनुपात से एक विद्यालय में अधिकतम सात रसोइये रखे जाएँ, लेकिन पहला रसोइया अनिवार्य रूप से दलित वर्ग से हो.

जुलाई में स्कूल खुलने के साथ ही रसोइयों की भर्ती शरू हुई और साथ ही साथ बवाल भी.

कहा जा रहा है कि जल्दी ही ग्राम पंचायतों के चुनाव होने वाले हैं और स्थानीय गुटबंदी के चलते बवाल बढ़ गया है.

सवाल

इस बीच अम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष डॉक्टर लालजी प्रसाद निर्मल ने 30 जुलाई को इस मुद्दे पर दलित बुद्धिजीवियों की परिचर्चा आयोजित की है.

Image caption लालजी प्रसाद निर्मल दलित बुद्धिजीवियों के बीच इस मसले पर चर्चा करवाने जा रहे हैं

एक बातचीत में श्री निर्मल ने कहा, "छुआछूत मानवता के प्रति सबसे गंभीर अपराध है. यह नस्लभेद से भी भयावह और निंदनीय घटना है."

निर्मल के अनुसार इन घटनाओं से दलित वर्ग के लोग चिंतित और अपमानित महसूस कर रहे हैं, इस पर सरकार को बोलना चाहिए.

रिटायर्ड पुलिस अधिकारी एसआर दारापुरी भी सरकार की ख़ामोशी पर हैरानी व्यक्त करते हैं , "यह मामला व्यापक होता जा रहा है, सरकार चुप्पी साधे है. कार्रवाई नहीं की जा रही है."

दारापुरी का कहना है कि सरकार को छुआछूत के ख़िलाफ़ प्रचार प्रसार करना चाहिए और शासनादेश को सख़्ती से लागू करना चाहिए.

वे इस मसले पर सामाजिक आंदोलन की ज़रुरत भी बताते हैं.

मिड डे मील प्राधिकरण के अतिरिक्त निदेशक संतोष कुमार राय का कहना है कि जहाँ से भी इस तरह की घटनाओं की जानकारी हुई, सख़्ती से कार्यवाही की गई है.

उनका कहना है, "बच्चों के दिमाग में छुआछूत की भावना नहीं होती, कुछ असामाजिक तत्व इस तरह की कोशिश करते हैं तो उनसे सख़्ती से निबटा जाता है."

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