खौफ़ के साए में अविश्वास का बाज़ार

रविवार का दिन नारायणपुर जिले के लोगों के लिए काफी अहम है. ख़ास तौर पर अबूझमाड़ के सुदूर इलाकों में रहने वाले माड़िया आदिम जनजाति के लोगों के लिए.

इसी दिन यहाँ लगता है साप्ताहिक हाट. दशकों से माड़िया या अन्य आदिवासी और ग़ैर आदिवासियों की संस्कृति का केंद्र रहा है नारायणपुर का हाट.

यह सिर्फ एक बाज़ार या हाट मात्र ही नहीं है. हफ्ते में एक बार लगने वाले इस हाट की तैयारियाँ हफ़्ते भर चलती हैं. चालीस पचास किलोमीटर से पैदल चल कर ग्रामीण इस बाज़ार में आते हैं.

कोई यहाँ पेड़ के पत्तों की प्लेट बनाकर लाता है तो कोई महुआ की शराब या सल्फी. अपनी शराब या पत्तों की बनी प्लेट बेचकर जो पैसे मिलते हैं उससे यहाँ के आदिवासी समुदाय के लोग रोज़मर्रा की सामग्री जैसे नमक, चावल, कपड़े, गहने खरीद कर वापस गाँव ले जाते हैं. और यह अर्थव्यवस्था सालों भर यूँ हीं चलती रहती है. बकरी, मुर्ग़ी, बैल, गहने, कपड़े, बर्तन, सब्जियां, श्रृंगार के सामान और भी बहुत कुछ है इस हाट में. जैसे कि मुर्गे की लड़ाई और गाना-बजाना.

नहीं रही वो रौनक

Image caption हाट में मनोरंजन के साधन भी होते हैं

कभी इस हाट में पैर तक रखने की जगह नहीं होती थी. मगर कुछ एक सालों में इस पर ग्रहण-सा छा गया है. बाज़ार की भीड़-भाड़ अब नदारद है. ग्रामीण अब यहाँ सोच-समझ कर ही आते हैं. माओवादियों और पुलिस के बीच चल रही लड़ाई का सीधा असर इस हाट की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है. सिर्फ नारायणपुर ही नहीं, बस्तर संभाग के अधिकांश इलाक़ों के साप्ताहिक बाज़ारों की कमोबेश यही स्थिति है. कभी शांत रहने वाला यह संभाग अब रणभूमि में तब्दील हो गया है. धमाके, मुठभेड़, हत्या और प्रतिबन्ध नें यहाँ की संस्कृति को ही उलट-पलट कर रख दिया है. यहाँ आना अब गांववालों के लिए कोई आसान काम नहीं है. हर दो क़दम पर उन्हें अपनी वफ़ादारी साबित करनी होती है.

गाँव से बाज़ार आने और वापसी के क्रम में उन्हें माओवादी छापामारों के दस्तों को विश्वास दिलाना पड़ता है कि वे पुलिस के मुखबिर नहीं हैं. उन्हें बताना पड़ता है की बाज़ार जाने के क्रम में उन्होंने किसी पुलिस वाले से कुछ नहीं कहा. इसी तरह हर दो कम पर इन्हें सशस्त्र पुलिस बल के जवानों को अपनी तलाशी देनी पड़ती है. बात सिर्फ तलाशी तक सीमित नहीं है. पुलिस नें जिन इलाकों को सबसे संवेदनशील घोषित किया है अगर उन गाँवों के लोग बाज़ार आते हैं तो उन्हें कई दिनों तक पुलिस की हिरासत में भी रहना पड़ सकता है.

अविश्वास का माहौल

Image caption प्रशांत तीर से हुए घाव का निशान दिखाते हैं

चारों तरफ अविश्वास का माहौल है. अब कोई किसी पर भरोसा नहीं करता है.

अविश्वास का आलम ये है की नारायणपुर के पुलिस अधीक्षक राहुल भगत नें एक पुलिस अधिकारी को हमारे पीछे लगाकर हमारी और हमारी गाड़ी की भी तस्वीरें खिंचवायीं. हमने भी उस पुलिस अधिकारी की तस्वीर खींची.

प्रशांत नामक इस अधिकारी का कहना था कि बाज़ार पर कई बार माओवादियों नें हमले किए हैं. यही वजह है की इतनी ऐहतियात बरती जा रही है. वह कहते हैं, "अक्सर ग्रामीणों या फिर स्कूल के छात्रों के भेस में माओवादी इस बाज़ार में धारदार हथियारों के साथ आते हैं और अचानक हमला कर भाग निकलते हैं."

प्रशांत ने शर्ट के बटन खोल कर वह निशान दिखाया जो तीर के हमले से की वजह से हुआ था. बाद में पता चला की प्रशांत नारायणपुर ज़िला पुलिस द्वारा नक्सल विरोधी अभियान के लिए गठित विशेष दल के प्रभारी हैं. बाज़ार में माओवादी भेस बदल कर ना आयें या अगर आयें तो उन्हें पकड़ने का ज़िम्मा प्रशांत के दस्ते पर है.

बाज़ार की तरफ आने वाली हर सड़क, चाहे वह कच्ची हो या पक्की, की नाकेबंदी कर दी गयी है. वर्दी या सादे लिबास में सशस्त्र पुलिस बल के जवान बाज़ार आने वाले हर व्यक्ति के थैलों और सामानों की तलाशी ले रहे हैं.

प्रशांत बताते हैं, "अक्सर माओवादी बाज़ार से तार और बैटरी ख़रीदकर ले जाते हैं जिसका इस्तेमाल वे बाद में बारूदी सुरंगों के विस्फोट में करते हैं. हम इसे भी चेक कर रहे हैं." माओवादियों की दबिश और पुलिस की नाकेबंदी की वजह से अब इस बाज़ार में पहुँचने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है.

मिलन स्थल

Image caption हाट मिलने-जुलने का भी मौक़ा देता है

स्थानीय पत्रकार अभिशेज झा के अनुसार बाज़ार सिर्फ ख़रीदारी का केंद्र नहीं है बल्कि मिलने की भी एक अहम जगह है.

वह कहते हैं,"यह बाज़ार दूर-दराज़ के इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए अपने रिश्तेदारों से भी मिलने की जगह है. चूँकि यहाँ बहुत बड़ा इलाक़ा ऐसा है जहाँ ना सड़क है या पहुँचने का कोई दूसरा साधन. तो ग्रामीण बाज़ार के बहाने अपनों से भी मिल लेते हैं, साथ में खाते-पीते हैं, सुख-दुःख बाँटते हैं और फिर अपने अपने घरों को वापस चले जाते हैं." नारायणपुर हाट में मौजूद हस्तशिल्प कलाकार पंदिरम मंडावी भी मानते हैं की बस्तर के हालात का सीधा असर ना सिर्फ बाज़ार पर पड़ा है बल्कि यहाँ की संस्कृति पर भी. "पहले यहाँ बहुत मज़ा आता था. गाना-बजाना होता था. खूब भीड़-भाड़ होती थी. मगर अब इस बाज़ार पर खौफ़ का साया है."

मंडावी के साथ आये उनके मित्र राजू नारायणन तो नारायणपुर हाट को देख कर स्तब्ध हैं. "केरल में तो हम सिर्फ साब्रिमलाई मंदिर ही 40 या 50 किलोमीटर पैदल सफ़र तय कर जाते हैं. मगर मैं हैरान हूँ की इस बाज़ार में ग्रामीण इतना लम्बा सफ़र पैदल तय कर आते हैं."

विश्वास के भरोसे धंधा

Image caption गहनों का धंधा विश्वास के आधार पर टिका हुआ है

मगर इस अविश्वास के माहौल में भी नारायणपुर हाट में एक विश्वास का धंधा है. वह है यहाँ के आदिवासियों के पारंपरिक गहनों का.

बाज़ार में मेरी मुलाकात श्याम साहू से हुई जो बिना पैसे लिए ही औरतों को गहने बेच रहे थे. चांदी के कड़े और हार यहाँ की औरतों का मुख्य श्रृंगार है. साहू का कहना है की उनका यह धंधा पूरी तरह उधार पर चलता है. "गाँव की औरतें अपने गाँव का नाम बता देती हैं और मैं उन्हें उधार सामान दे देता हूँ. मुझे पता है की वे पैसे ज़रूर दे देंगे. कभी ऐसा नहीं हुआ की मैंने गहने उधार दिए और उसका पैसा नहीं मिला हो." मैं बाज़ार घूम रहा था. कुछ देर मुर्गे की लड़ाई भी देखी. मगर इस दौरान प्रशांत की नज़र मेरी गतिविधियों पर रही. शायद वह नहीं चाहते थे की गाँव से आने वाला कोई मौजूदा हालात के बारे में मुझे बताये. बहरहाल शाम ढल रही थी और नारायणपुर के एसपी का फ़रमान मुझे मिला की मुझे वहाँ से लौर जाना चाहिए. पुलिस के अधिकारी कह रहे थे की माओवादियों द्वारा शहीद सप्ताह मनाया जा रहा है इसलिए नारायणपुर में रहना मेरे लिए असुरक्षित होगा. मैंने अपना रिकॉर्डर और कैमरा समेटा. बाज़ार में आये ग्रामीण भी अपना सामान समेट रहे थे.

कुछ ही देर में पैदल औरतों, बच्चों और बूढों का काफ़िला दूरदराज़ वाले अपने अपने गाँवों की तरफ हो लिया. मैं भी इस बाज़ार की यादें लिए वापसी का सफ़र तय करने लगा यह सोचते हुए कि आख़िर कब वह दिन आएगा जब यहाँ के लोग खुली हवा में सांस ले सकेंगे? कब इस बाज़ार की रौनक एक बार फिर वापस लौटेगी?

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