ब्रिटेन क्यों दे रहा है इतनी अहमियत?

डेविड कैमरन
Image caption कैमरन यूरोप और अमरीका के दौरे के बाद भारत ही आ रहे हैं

पाँच कैबिनेट मंत्रियों और पचास बड़ी कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के साथ भारत आने वाले डेविड कैमरन लगातार कहते रहे हैं कि भारत के साथ विशेष संबंध बनाना उनकी प्राथमिकताओं में से एक है.

सत्ताधारी कंज़रवेटिव पार्टी के नेता कैमरन ने अपने चुनाव घोषणापत्र में ही कहा था कि उनकी सरकार भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को एक नई ऊँचाई पर ले जाना चाहती है.

ब्रिटेन जहाँ अब भी आर्थिक मंदी की गिरफ़्त से बाहर निकलने के हाथ-पाँव मार रहा है, वहीं भारत में आर्थिक वृद्धि की दर नौ प्रतिशत तक रहने की संभावना है.

जाने-माने व्यवसायी और ब्रितानी संसद के ऊपरी सदन के सदस्य लॉर्ड स्वराज पॉल ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "ब्रिटेन चाहता है कि उसकी सेवाओं और उत्पादों का निर्यात बढ़े इसी वजह से भारत को इतनी अहमियत दी जा रही है, दुनिया के ज्यादातर बाज़ार सिकुड़ते जा रहे हैं जबकि भारत की अर्थव्यवस्था काफ़ी मज़बूत है. यूरोप और अमरीका परेशानहाल है, भारत एक ऐसी जगह है जहाँ बहुत उम्मीदें हैं."

भारत और ब्रिटेन के व्यापारिक संबंध पिछले कुछ वर्षों में बहुत तेज़ी से बढ़े हैं, पिछले वित्त वर्ष में दोनों देशों के बीच कुल 13 अरब डॉलर का कारोबार हुआ, इस बात को लेकर किसी को शंका नहीं है कि अभी व्यापार के बढ़ने की अपार संभावनाएँ हैं.

भारत में निवेश के मामले में ब्रिटेन चौथा सबसे बड़ा देश है जबकि ब्रिटेन में निवेश करने के मामले में भारत का नंबर दूसरा है.

हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स की पहली भारतीय महिला सदस्य बैरोनेस श्रीला फ्लेदर कहती हैं प्रधानमंत्री बनने के बाद कैमरन का इतनी जल्दी भारत जाना दिखाता है कि वे भारत के प्रति कितने गंभीर हैं.

उन्होंने कहा, "ये एक अच्छा संकेत है कि वे चुनाव के बाद इतनी जल्दी भारत जा रहे हैं, वे देखना चाहते हैं कि भारत में क्या हो रहा और ब्रिटेन के लिए उसमें क्या संभावनाएँ हैं."

नयापन

भारत और ब्रिटेन के बीच एक ऐतिहासिक रिश्ता रहा है. इससे पहले लेबर सरकार के साथ भी भारत के रिश्ते अहम रहे थे. लेकिन अब कंज़रवेटिव और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के गठबंधन वाली सरकार रिश्तों में नएपन की बात कर रही है.

Image caption गठबंधन सरकार में शामिल दोनों दल भारत के साथ अच्छे रिश्तों के पक्षधर हैं

लेबर पार्टी के सांसद लॉर्ड भीखू पारेख कहते हैं, "इस बार तीन नई बातें हैं, पहला तो ये कि लेबर पार्टी के कार्यकाल में विदेश मंत्री डेविड मिलिबैंड जब भारत गए थे तो कश्मीर और पाकिस्तान के मामले में उनका अंदाज़ ठीक नहीं था, वे भाषण देने के मूड में थे, इस बार लोगों की सोच साफ़ है कि भारत के साथ उस तरह रिश्ता नहीं चल सकता. दूसरी बात ये है कि भारत की अर्थव्यवस्था बहुत बेहतरीन चल रही है जबकि ब्रिटेन की हालत ख़राब है. तीसरे ये कि भारत में ढेर सारे उच्च शिक्षण संस्थान खुलने वाले हैं जिनमें ब्रिटेन अपनी एक भूमिका देख रहा है."

ब्रिटेन के सबसे धनी लोगों में गिने जाने वाले कपारो समूह के चेयरमैन लॉर्ड स्वराज पॉल का संबंध लेबर पार्टी से है, जो कि इस समय विपक्ष में है. स्वराज पॉल कहते हैं कि डेविड कैमरन इस यात्रा के ज़रिए भारत-ब्रिटेन सबंधों को ज़रूर नई दिशा देना चाहते हैं तभी अपने साथ इतना बड़ा प्रतिनिधिमंडल ले जा रहे हैं.

वे कहते हैं, "कैमरन इस बार बहुत ईमानदारी से संबंधों को एक नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं, उनके साथ लगभग आधा कैबिनेट और इतने सारे बड़े व्यवसायी यूँ ही भारत नहीं गए हैं. मैं समझता हूँ कि अगर उन्हें इसमें कामयाबी मिलती है तो दोनों देशों को फ़ायदा होगा. "

बैरोनेस श्रीला फ्लेदर का कहना है कि ब्रिटेन चीन के मुक़ाबले भारत को अधिक तवज्जो देने की नीति पर चल रहा है क्योंकि उसे एक लोकतांत्रिक देश से रिश्ते बढ़ाना अधिक सहज लग रहा है, "भारत में जिस तरह पिछले चुनाव हुए हैं, दुनिया में कम ही देशों में होते हैं, ब्रिटेन में भारत के लोकतंत्र की वजह से बहुत कद्र है बल्कि एक तरह से रिश्तों की बुनियाद में भारत का एक लोकतांत्रिक देश होना शामिल है."

इसी बार हुए आम चुनाव में भारतीय मूल के लगभग दस उम्मीदवार चुनाव जीतकर संसद में पहुँचे हैं. लॉर्ड स्वराज पॉल का कहना है कि भारत के साथ अच्छे संबंध बनाने का आंतरिक राजनीतिक दबाव भी सभी नेताओं पर है क्योंकि भारतीय मूल के लोग ब्रिटेन में बहुत सफल और काफ़ी प्रभावशाली हैं.

लॉर्ड पॉल कहते हैं, "यहाँ रहने वाले भारतीय बहुत सक्रिय और बहुत सजग हैं. वे ब्रिटेन में रहते हुए भारत का बहुत अच्छी तरह प्रतिनिधित्व करते हैं, ब्रिटेन की सरकार पर एक तरह का राजनीतिक दबाव रहता है कि वह भारत से रिश्ते बेहतर रखे."

ब्रितानी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा को लेकर दोनों तरफ़ काफ़ी उम्मीदें हैं, डेविड कैमरन की इस यात्रा के दौरान बहुत व्यापक स्तर पर चर्चाएँ और समझौते होने की संभावनाएँ हैं जिनमें रक्षा सौदों से लेकर संग्रहालयों के आपसी सहयोग जैसे मुद्दे शामिल हैं.

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