फिर न पड़े कैंप का साया

माओवादियों के डर से गांव छोड़ा
Image caption छत्तीसगढ़ में माओवादियों के डर से कई लोग अपना गांव छोड़कर नया गांव बसा चुके हैं

आज आपको सुनाते हैं ऐसे गांवों की कहानी जिनपर हमेशा रहा कैंप और माओवादियों का साया.

ज़िक्र हो रहा है छत्तीसगढ़ के कुरूसनार गांव का. करूसनार नारायणपुर में है. यहीं से अबूझ माड़ की हद शुरू होती है.

माओवादी हिंसा को देखते हुए इस इलाक़े को काफी़ संवेदनशील माना जाता है. सड़कों पर इक्का दुक्का वाहन ही चलते हैं. वो भी या तो मालवाहक यानि सामान ढोने वाली गाड़ी होती हैं या फिर एक आधी सवारी वाली जीप.

इसके अलावा कोई दूसरा वाहन सड़कों पर दिखाई नहीं देता है. यहां पर दुपहिया वाहन सबसे सुरक्षित माना जाता है इसलिए ज़्यादातर लोग दुपहिया वाहनों से ही अपना सफ़र तय करते हैं. लोगों का मानना है कि दो पहियों वाला वाहन उनकी जान बचा सकता है. क्या पता किस जगह बारूदी सुरंग बिछी हो.

यहाँ पर सीआरपीएफ़ का कैंप है चारों तरफ से नुकीले तारों से घिरा हुआ है. कैंप के सामने एक नाका यानि चेक पोस्ट है जिसके सामने से वाहनों के गुज़रने पर पाबंदी है. लेकिन इस कैंप का यहां आने एक शख़्स को लिए मुसाबत बन गया.

जब यहां कैंप नहीं था तब यहां रामजी दुग्गा की परचून की दुकान ठीक ठाक चला करती थी. इस दुकान से वो अपना और अपने परिवार का पेट भेरते थे. जब सीआरपीएफ़ का कैंप लगा तब वो बेहद ख़ुश भी हुए थे क्योंकि उन्हें लगा था कि कैंप की वजह से उनकी आमदनी में बढ़ोतरी हो जाएगी.

कैंप, माओवादी और क़त्ल

Image caption कुरुसनार में सीआरपीएफ़ का कैंप चारों तरफ़ से नुकीली तारों से घिरा हुआ है

रामजी दुग्गा को नहीं पता था कि उनकी ये ख़ुशी उनकी सबसे बड़ी भूल थी.

कैंप आने के बाद रामजी दुग्गा को वहाँ टमाटर मुहैया करने का मौक़ा मिला गया. उन्होंने इस अवसर को खोना न चाहा और अपने एक दोस्त के साथ मिलकर ये नया काम शुरु कर दिया.बस फिर क्या था. कुछ ही दिनों में रामजी दुग्गा और उनके दोस्त को हाथों में माओवादियों का फरमान आ पहुंचा.

फरमान में रामजी दुग्गा और उनके मित्र पर पुलिस का मुखबिर होने का आरोप लगाया गया था. कुछ ही दिनों में रामजी के मित्र की माओवादियों नें हत्या कर दी. जबकि रामजी वहाँ से भागने में कामयाब हो गए.

माओवादियों से जान बचाते हुए रामजी दुग्गा नारायणपुर ज़िला मुख्यालय पहुंचे जहां उनकी मुलाक़ात ऐसे लोगों से हुई जो उनकी तरह ही माओवादियों के ख़ौफ़ से अपने गाँव छोड़ कर जान बचाते हुए नारायणपुर आए थे.

इन सभी लोगों ने ज़िला मुख्यालय से तीन किलोमीटर की दूरी पर अपनी झोपड़ियाँ बना दीं. उस वक्त ये जगह बिल्कुल ख़ाली हुआ करती थी जिसे लोग "शांति नगर" के नाम से जानने लगे.

शांति नगर में अशांति

Image caption कैंप में टमाटर बेचने वाले रामदुग्गा को माओवादियों ने सीआरपीएफ़ का मुखबिर समझ लिया और उसे जान बचाने के लिए गांव छोड़ना पड़ा

चलिए अब आपको शांति नगर के बारे में कुछ बताते हैं. यहां के बाशिंदों की अपनी एक अलग ही दुनिया है. नाम तो शांति रखा गया है लेकिन इस नगर के परिवारों में आज भी अशांति है. इस इलाक़े में चल रही नक्सली हिंसा में यहां के कई परिवारों ने किसी अपने को खोया है. किसी ने अपना बेटा खोया है तो किसी ने पति या भाई.

ये यहाँ जीते हैं तो बस कड़ी मजदूरी और कुछ कड़वी यादों के सहारे. सभी के दिलों पर पड़े ज़ख़्म आज भी गहरे हैं.लेकिन आज तक इन ज़ख्मों पर किसी नें मरहम लगाने की कोशिश भी नहीं की. शांति नगर के बाशिंदे बस अपनी किस्मत के भरोसे छोड़ दिए गए हैं.

सीआरपीएफ़ कैंप में टमाटर बेचकर मुसीबत में पड़े रामजी दुग्गा तो खु़शनसीब थे कि उन्हें स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर यानि एसपीओ बना दिया गया था. यहां तक कि अब उन्हें बतौर गृह रक्षक बहाल कर लिया गया है.

लेकिन शांति नगर के रहने वाले सभी लोग इतने खु़श नसीब कहां हैं. मेहनत मज़दूरी कर मुश्किल से अपने परिवार चला रहे इन सभी लोगों को पिछले चार सालों से सरकारी मदद का इंतज़ार है.

कुतुल इलाक़े के रहने वाले लक्ष्मण माड़िया आदिम जनजाति के हैं. कहा जाता है कि लगभग चार साल पहले उन्हें और उनके बड़े भाई को माओवादियों ने पुलिस का मुखबिर बता कर प्रताड़ित किया था.

दूसरे पीड़ितों की तरह माओवादियों के डर से दोनों भाई नारायणपुर भाग कर आ गए और शांति नगर में अपने लिए एक झोपडी बनाई.

लक्ष्मण माड़िया कहते हैं, "हम जब भागकर आए और शांति नगर में बस गए तो मेरे भाई को गांव की याद आने लगी. उसने कहा कि वो गाँव लौट जाएगा क्योंकि अब मामला शांत हो गया है. लेकिन जैसे ही वो गाँव पहुंचा, माओवादियों ने उसे मार डाला."

भाई का हाल देखने के बाद अब लक्ष्मण को गाँव वापसी ख़्याल भी नहीं आता है. आजकल वो नारायणपुर में दिहाड़ी मजदूर का काम करते हैं.

ऐसा नहीं है कि शांति नगर में सिर्फ़ वो लोग ही रहते हैं जो माओवादियों के खौफ़ से अपना गाँव छोड़ आए हैं, यहाँ एक बड़ी आबादी उन लोगों कि भी है जो पुलिस के ज़ुल्म की वजह से अपने गाँव से भाग कर शहर आने को मजबूर हो गए हैं.

अब उधियारी को ही ले लीजिये जिनका गाँव "खाना" नारायणपुर से 40 किलोमीटर दूर है.

वो बताती हैं , "पुलिस ने मेरे एक देवर को मुठभेड़ में मार दिया. मेरे पति और दूसरे देवर को माओवादी कह कर जेल भेज दिया. मेरा गाँव में रहना मुश्किल हो गया था. जब भी पुलिस वहां अपनी कार्रवाई करने आती , वो हमारे ही घर में धावा बोलती थी. अब मेरे पति को तो ज़मानत मिल गई है लेकिन मेरा मेरा देवर अभी भी दुर्ग की जेल में बंद है."

मदद नहीं बुलडोज़र मिला

शुरुआत में छत्तीसगढ़ की सरकार ने माओवादियों के ख़ौफ़ से गाँव छोड़ चुके लोगों के पुनर्वास की बात कही थी. लेकिन कुछ सालों के बाद यह सिर्फ़ सरकार के भाषण की चंद पंक्तियां ही बनकर रह गईं.

इस बारे में नारायणपुर के एसपी राहुल भगत ने बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से कहा, "हमे पता चला है कि इनमें बहुत सारे लोग माओवादियों के समर्थक हैं. वैसे भी ज़िला प्रशासन इनके पुनर्वास कि योजना बना रहा है."

लेकिन शांति नगर के लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार नारायणपुर के कलेक्टर को प्रतिवेदन दिए हैं जिनपर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.

अपने पुनर्वास के लिए गुहार लगा रहे इन शांति नगर के वासियों के लिए अब एक और बुरी खबर आई है. सरकार अब यहाँ एक पुलिस कैंप खोलने जा रही है.

यही वजह है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने इस कैंप के लिए ज़मीन ख़ाली करवानी शुरू कर दी है. इसी कड़ी में शांति नगर की कई झोपड़ियां तोड़ दी गई हैं जबकि बाक़ी लोगों को इलाक़ा ख़ाली करने का फरमान दे दिया गया है.

'बस्ती के पास अब कोई कैंप ना आए'

कुरूसनार में बनाए गए सीआरपीएफ़ के कैंप की वजह से एक बार अपना गांव छोड़ चुके रामजी दुग्गा पुलिस के कैंप की वजह से अब अपना ये गांव छोड़कर नहीं भागेंगे.

भागने का मतलब भी नहीं हो क्योंकि अब वो परचून वाले नहीं बल्कि इलाक़े के बाशिंदे हो गए हैं क्योंकि गृह रक्षा वाहिनी के सदस्य जो ठहरे.

लेकिन, दूसरे लोगों को उनके शांति नगर में शांति से रहने नहीं दिया जाएगा और उन्हें एक नया शांति नगर बसाना होगा. इस बस्ती में रहने वाली डंकी बाई के पति को पुलिस वालों ने माओवादी कहकर जेल भेज दिया था.

डंकी कहती हैं: "दुआ कीजिए फिर हमारी झोपड़ियों के पास कोई कैंप ना आए....

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