अनसुलझी पहेली थी मां...

  • 30 जुलाई 2010
Image caption 47 साल बाद तंबी ने अपनी मां को ढूंढने का फ़ैसला किया.

असल ज़िंदगी की कहानी पर तो अकसर फ़िल्में बनती हैं लेकिन फिल्मी सी लगने वाली कोई कहानी अगर ज़िंदगी में सच हो जाए तो क्या अनुभव होगा.

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले 50 वर्षीय राजेंद्र कुमार अय्यर उर्फ़ तंबी की जिंदगी किसी पटकथा से कम नहीं. 47 साल पुरानी एक धुंधली सी याद ने उन्हें किस तरह अपनों से जोड़ा, ‘तंबी’ की इस कहानी को खुद उनकी ज़ुबानी हम आप तक पहुंचा रहे हैं.

(इस कहानी में अब तक आपने पढ़ा कि तीन साल की उम्र में तंबी के माता-पिता के बीच झगड़ा हुआ, और पिता उन्हें लेकर घर से निकल पड़े. मां के बारे में पूछने पर उन्हें कभी किसी से सही जवाब नहीं मिला. ऐसे में तंबी ख़ुद इस पहेली को सुलझाने निकल पड़े. अब पढ़िए आगे...)

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"मैंने भाभी को इस बात के लिये तैयार किया कि हम दोनों मां के मायके जा कर इस बारे में पता करेंगे. गांव में एक-दो बुज़ुर्गों से पूछने पर पता चला कि मेरी मां के गांव का नाम ‘पाली’ है, जो लगभग 12-13 किलोमीटर की दूरी पर है.

जा पहुंचे ‘पाली’

अगले दिन सुबह हम दोनों ने घर से बाज़ार जाने की बात कही और बस पकड़ कर जा पहुंचे ‘पाली’.

हमारे सामने संकट ये था कि मां को जानने का कोई ओर-छोर हमारे पास नहीं था. मुझे तो मां का नाम तक नहीं पता था.

लकड़ियां ले कर आ रहे एक वृद्ध दंपत्ति को हमने रोका. हमने उनसे जानना चाहा कि लगभग 50 साल पहले इस गांव की कोई लड़की ब्याह कर तोंडंगकूर्ची गई थी क्या? बहुत याद करने के बाद उन्होंने उस लड़की के पति का नाम पूछा. मैंने अपने पिता का नाम बताया- रामास्वामी.

वृद्ध को जैसे सब कुछ याद आ गया. उसने मां के बारे में बताया कि वो अभी डेढ़ महीने पहले ही गांव आई थीं.

मैं अकबका सा रह गया. “मतलब मेरी मां ज़िंदा है!”. मुझे पहली बार पता चला कि मेरी मां मरी नहीं थी, वह अब तक ज़िंदा थी. उस वृद्ध ने मेरे मामा के घर का रास्ता बताया. हम जब उस घर तक पहुंचे तो मेरी मामी घर में थी. मैंने प्रणाम करने के बाद विस्तार से अपना परिचय दिया तो वो लगभग भड़क गईं, “50 साल बाद यहां क्या लेने आये हो.”

मैं चकित था. रुआंसा होकर मैने उन्हें समझाने की कोशिश की, कि मैं केवल एक बार अपनी मां को देखना चाहता था. लेकिन उन्हें डर था कि मैं शायद ज़मीन-जायदाद का कोई हिस्सा मांगने आया हूं. उन्होंने मुझे और मेरी भाभी को घर के अंदर बुलाने की ज़हमत भी नहीं उठाई. हम दोनों घंटे भर तक एक पेड़ के नीचे खड़े रहे. दोपहर में खेत से काम कर के मेरे मामा लौटे.

Image caption तंबी अपने काम में रम गए, लेकिन मन में एक टीस रह गई.

मैंने जब उन्हें अपना परिचय दे कर मां के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने टका सा जवाब दिया, “हमें तुम्हारी मां के बारे में कुछ नहीं पता.” मैंने उन्हें वृद्ध की बात का हवाला दिया कि मां तो महीने भर पहले यहां आई थी. लेकिन वो टस से मस नहीं हुए.

एक टीस

थक-हार कर मैंने एक काग़ज़ पर अपना नाम-पता और मोबाइल का नंबर लिखा और उन्हें देते हुए कहा कि अगर संभव हो तो मेरी मां तक यह संदेश पहुंचा दें. वो अगर मिलना चाहें तो मुझे ख़बर कर दें.

भाभी के साथ मैं गांव लौट आया और वहां से पिता को लेकर वापस बिलासपुर आ गया.

मैं बहुत निराश और हताश होकर लौटा था. लगा कि जैसे मां मिलते-मिलते रह गई. मैंने मान लिया कि अब मां तक कभी नहीं पहुंच पाऊंगा.

दस दिन बाद पिता भी हमेशा के लिए साथ छोड़ गए. मैं फिर अपने काम में फिर से रम गया. लेकिन मन में एक टीस हमेशा रहती..."

(माँ तक पहुंचने की ये कोशिश क्या कामयाब हो पाएगी? जानने के लिए पढ़िए इस कहानी की अंतिम कड़ी रविवार को.)

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