कहाँ से आ रहे हैं चीनी हथियार?

Image caption यूडब्लूएसए बर्मा का एक वामपंथी विद्रोही संगठन है.

दक्षिण एशिया के अवैध हथियारों के बाज़ारों में 'मेड इन चाइना' हथियारों की भरमार है लेकिन इनमें से बहुत से हथियार वास्तव में चीन निर्मित नहीं हैं.

हथियार विरोधियों का कहना है कि दक्षिण एशिया के विद्रोही संगठन जो राइफ़लें और मशीन गनें खरीद रहे हैं उन्हें एक अनौपचारिक अनुबंध के तहत बनाया जाता है.

इसकी व्यवस्था बर्मा के विद्रोही संगठन यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी (यूडब्लूएसए) ने चीन की हथियार फ़ैक्टरियों के साथ की है.

यूडब्लूएसए बर्मा का 30 हज़ार लड़ाकों वाला एक वामपंथी विद्रोही संगठन है. इस संगठन पर ड्रग्स तस्करी और हथियारों की खरीद-फरोख्त में शामिल होने का आरोप है.

अनौपचारिक अनुबंध

डब्लूएसए के चीन के साथ नज़दीकी संबंध हैं क्योंकि इसके अधिकांश नेता पुराने वामपंथी गुरिल्ला हैं और उन्होंने 1960 और 70 के दशक में चीन में प्रशिक्षण लिया है.

सभी विद्रोहियों को सेना की ओर से प्रायोजित सीमा सुरक्षा बल में शामिल करने के बर्मा सरकार के अभियान को लेकर यूडब्लूएसए ख़ुश नहीं है. इससे बर्मा सरकार और यूडब्लूएसए के बीच हुआ संघर्ष विराम ख़तरे में पड़ गया था.

छोटे हथियारों के प्रसार के ख़िलाफ़ काम करने वाले बीनालक्ष्मी नेफ़राम कहते हैं, ''ये चीनी फैक्टिरयाँ अपने मुनाफ़े के लिए बेताब हैं, उन्हें ये चिंता नहीं है कि ये हथियार किसके पास पहुँच रहे हैं. अब वे हथियारों और इन्हें बनाने की तकनीक ही आउटसोर्स कर रहे हैं.''

चीनी फैक्टरियों को डिजाइन और तकनीकी सहयोग लेने के लिए यूडब्लूएसए ने काफ़ी बड़ी रक़म का भुगतान किया है. इसके बाद से अब उन्होंने एक अनौपचारिक अनुबंध के तहत इन हथियारों को बनाना शुरू कर दिया है.

हथियारों की इस अवैध ख़रीद-फरोख़्त में शामिल एक सूत्र ने बताया कि चीन के असली हथियारों की अंतिम बड़ी खेप अप्रैल 2004 में आई थी जिसे बांग्लादेश पुलिस ने चटगाँव में ज़ब्त कर लिया था.

बांग्लादेश के हथियारों के सौदागर हफ़ीजुर्रहमान ने चटगाँव की एक अदालत में दिए बयान में इशारा किया था कि यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम (अल्फ़ा) ने हांगकांग से इस खेप का आयात किया था.

सौदा

उन्होंने कहा था कि अल्फ़ा के सैन्य प्रमुख परेश बरुआ की ओर से आधी क़ीमत एडवांस में मिलने के बाद यह सौदा हुआ था लेकिन अधिकारियों का कहना है कि बरुआ ने केवल अल्फ़ा के लिए ही इतनी बड़ी खेप का आयात नहीं किया था.

अल्फ़ा पिछले 10-12 साल में दक्षिण एशिया में हथियारों का बड़ा अवैध सौदागर बनकर उभरा है.

चीनी हथियार ख़रीदने के पीछे एक बड़ा कारण ये है कि वे काफ़ी सस्ते हैं और अधिक मात्रा में ख़रीदने के बाद मुनाफ़े के साथ इन्हें नेपाल या भारत के माओवादियों को बेच दिया जाता है.

इस प्रक्रिया में अल्फ़ा अपने लिए हथियार भी आयात कर लेता है और अपने आंदोलन को चलाने के लिए पैसा भी जमा कर लेता है.

बांग्लादेश की नई सरकार ने पिछले साल जब अल्फ़ा के क़रीब सभी बड़े नेताओं को भारत प्रत्यार्पित किया था तो उनके लगभग 40 बैंक खातों से क़रीब एक अरब डॉलर ज़ब्त किए गए थे.

भारत और बाग्लादेश के खुफ़िया अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के पैसे का एक हिस्सा जबरन वसूली और व्यापारिक गतिविधियों से आता है तो इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा हथियारों की अवैध ख़रीद-फ़रोख़्त से आता है.

इन अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि 2004 में चटगाँव बंदरगाह पर हथियारों की खेप पकड़े जाने के बाद अल्फ़ा ने चीनी हथियारों के लिए यूडब्लूएसए को नया स्रोत बना लिया है.

नाम और पहचान न उजागर करने की शर्त पर अल्फा के दो वरिष्ठ नेताओं ने खुफिया अधिकारियों की इस बात की पुष्टि की.

उन्नत हथियार

उन्होंने बताया कि पहले यूडब्लूएसए द्वारा बनाए गए हथियारों में चीन निर्मित हथियारों की तुलना में कुछ ख़ामियाँ थीं जिन्हें कुछ ही महीने में दूर कर लिया गया.

एक नेता ने कहा, ''अब हम जो हथियार ख़रीद रहे हैं वे असली चीनी हथियारों की ही तरह हैं. वे काफ़ी सस्ते हैं और उन्हें सीमा पर किसी सुविधाजनक जगह पर सौंपा जाता है.''

भारतीय सैन्य ख़ुफ़िया एजेंसी के पूर्व उप प्रमुख गगनजीत सिंह कहते हैं, ''इस नेटवर्क के ज़रिए हज़ारों राइफ़ल, मशीन गन, पिस्तौल और रिवाल्वर, ग्रेनेड और अन्य सामान भारतीय माओवादियों के पास पहुँचे हैं और इसके पहले नेपाली माओवादियों, बांग्लादेश के जिहादी गुटों और पूर्वोत्तर के अलगाववादी सेनाओं के पास पहुँचते थे.''

अधिकारियों का कहना है चटगाँव इस तरह के व्यापार का केंद्र बनकर उभरा है.

हथियार व्यापारी और विद्रोही चटगाँव के होटलों में अपना अधिक समय बिताते हैं. कई बार अल्फ़ा के शहर में स्थित अपने ठिकानों पर भी इस तरह की बैठकें होती हैं.

वरिष्ठ बांग्लादेशी अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि अल्फ़ा हथियारों की खेप जब उन्हें सौंप देता है तो नेपाल, भारत और बांग्लादेश के खरीदारों तक उन्हें पहुँचाने के लिए बांग्लादेश के हथियार डीलरों की मदद ली जाती है.

बांग्लादेश के एक हथियार व्यापारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया, ''खेप को छोटे-छोटे भागों में बांटकर और अच्छी तरह से पैक कर उन्हें गंतव्य स्थान के लिए रवाना किया जाता है.''

छोटे हथियारों के प्रसार के खिलाफ काम करने वाले बीनालक्ष्मी नेफ़राम कहते हैं, '' ये चीनी फैक्टिरयां अपने मुनाफे के लिए बेताब हैं, उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि ये हथियार किसके पास पहुँच रहे हैं. अब वे हथियारों और इसको बनाने की तकनीक की आउटसोर्सिंग कर रहे हैं.''

चीनी फैक्टरियों को उनकी डिजाइन और तकनीकी सहयोग लेने के लिए यूडब्लूएसए ने काफी बड़ी रकम का भुगतान किया है. इसके बाद से अब वह एक अनौपचारिक अनुबंध के तहत इन हथियारों को बनाना शुरू कर दिया है.

हथियारों के इस अवैध खरीद-फरोख्त में शामिल एक सूत्र ने बताया कि चीन के असली हथियारों की अंतिम बड़ी खेप अप्रैल 2004 में आई थी जिसे बांग्लादेश पुलिस ने चिटगाँव में जब्त कर लिया था.

बांग्लादेश के हथियारों के सौदागर हफिजुर रहमान ने चिटगाँव की एक अदालत में दिए बयान में इशारा किया था कि युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम (अल्फ़ा) ने हांग कांग से इस खेप का आयात किया था.

हथियारों का सौदा

उन्होंने कहा था कि अल्फ़ा के सैन्य प्रमुख परेश बरुआ की ओर से आधी कीमत एडवांस में मिलने के बाद यह सौदा हुआ था.

लेकिन अधिकारियों का कहना है कि बरुआ ने केवल अल्फ़ा के लिए ही इतनी बड़ी खेप का आयात नहीं किया था.

अल्फ़ा पिछले 10-12 साल में दक्षिण एशिया में हथियारों का बड़ा अवैध सौदागर बनकर उभरा है.

चीनी हथियार खरीदने के पीछे एक बड़ा कारण यह है कि वे काफी सस्ते हैं और अधिक मात्रा में खरीदने के बाद मुनाफा लेकर इन्हें नेपाल या भारत के माओवादियों को बेच दिया जाता है.

Image caption अल्फ़ा दूसरे विद्रोही संगठनों को हथियार बेचता भी है.

इस प्रक्रिया में अल्फ़ा अपने लिए हथियार भी आयात कर लेता है और अपने आंदोलन को चलाने के लिए पैसा भी जमा कर लेता है.

बांग्लादेश की नई सरकार ने पिछले साल जब अल्फ़ा के करीब सभी बड़े नेताओं को भारत प्रत्यर्पित किया था तो उनके क़रीब 40 बैंक खातों से करीब एक अरब डॉलर जब्त किए गए थे.

भारत और बाग्लादेश के खुफ़िया अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के पैसे एक हिस्सा जबरन वसूली और व्यापारिक गतिविधियों से आता है तो इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा हथियारों की अवैध खरीद-फरोख्त से आता है.

इन अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि 2004 में चिटगाँव बंदरगाह पर हथियारों की खेप पकड़े जाने के बाद अल्फ़ा ने चीनी हथियारों के लिए यूडब्लूएसए को नया स्रोत बना लिया है.

नाम और पहचान न उजागर करने की शर्त पर अल्फा के दो वरिष्ठ नेताओं ने खुफिया अधिकारियों के इस बात की पुष्टी की.

उन्नत हथियार

उन्होंने बताया कि पहले यूडब्लूएसए द्वारा बनाए गए हथियारों में चीन निर्मित हथियारों की तुलना खामियाँ थीं जिन्हें कुछ ही महीने में दूर कर लिया गया.

एक नेता ने कहा, ''अब हम जो हथियार खरीद रहे हैं वे असली चीनी हथियारों की ही तरह हैं. वे काफी सस्ते हैं और उन्हें सीमा पर किसी सुविधाजनक जगह पर सौंपा जाता है.''

भारतीय सैन्य खुफिया एजेंसी के पूर्व उप प्रमुख गगनजीत सिंह कहते हैं,'' इस नेटवर्क के जरिए हज़ारों राइफ़ल, मशीन गन,पिस्तौल और रिवाल्वर, ग्रेनेड और अन्य सामान भारतीय माओवादियों के पास पहुँचे हैं और इसके पहले नेपाली माओवादियों, बांग्लादेश के जेहादी गुटो और पूर्वोत्तर के अलगाववादी सेनाओं के पास पहुँचते थे.''

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