छांव की तलाश में यौनकर्मी

  • 8 अगस्त 2010
रेडलाइट एरिया
Image caption ग़ैर सरकारी संगठन "परचम" ने बिहार के यौनकर्मियों की स्थिति पर अध्ययन किया है

बिहार की यौनकर्मियों का जीवन बेहतर बनाने के लिए एक पहल की गई है.

एक ग़ैर सरकारी संगठन ने बिहार में यौनकर्मियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर अध्ययन करके एक रिपोर्ट तैयार की है.

रिपोर्ट को जल्द ही सरकार के समक्ष पेश किया जाएगा. अगर सरकार ने इस रिपोर्ट की सिफारिशें मान लीं तो 35 वर्ष या उससे अधिक उम्र की यौनकर्मियों को पेंशन मिलेगी, साथ ही उनके बच्चों को पढ़ने के लिए वज़ीफ़ा भी दिया जाएगा.

ताज़ा रिपोर्ट पर राज्य के सामाजिक कल्याण मंत्री दामोदर राउत का कहना है, "हम इस रिपोर्ट का अध्ययन करेंगें. हम आश्वस्त करना चाहते हैं कि सरकार ऐसी महिलाओं के पुनर्वास संबंधी तमाम पहलुओं पर गौर करेगी और इस दिशा में सभी आवश्यक क़दम उठाए जाएंगे."

सीतामढ़ी के रेडलाइट एरिया बोहा टोला में वर्ष 2008 में भीड़ ने यौनकर्मियों के दर्जनों घरों में आग लगा दी थी. इस घटना में एक दर्जन से ज्यादा महिलाएं झुलस गई थीं और उन्हें अपना घर-बार छोड़ कर भागना पड़ा था.

इसके बाद इन यौनकर्मियों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आवास पर डेरा डाल दिया था और अपने पुनर्वास और सुरक्षा की गुहार लगाई थी.

इसके बाद मुख्यमंत्री ने उनके लिए कुछ ठोस कार्रवाई करने का आश्वासन दिया था.

अध्ययन

इसके बाद बिहार महिला विकास निगम ने ग़ैर सरकारी संगठन 'परचम' को राज्य के अनेक रेडलाइट क्षेत्रों की महिलाओं की स्थिति पर अध्ययन कर रिपोर्ट पेश करने के लिए अधिकृत किया था.

'परचम' मुज़फ़्फ़रपुर के चतुर्भुज स्थान की यौनकर्मियों की बेटियों द्वारा संचालित संस्था है जो अपनी यौनकर्मियों के अधिकार, सुरक्षा और पुनर्वास के लिए काम करती है.

'परचम' ने अपनी स्थापना के सात-आठ वर्षों में यौनकर्मियों के लिए काफ़ी संघर्ष किया है.

इस संस्था के गठन की कहानी सुनाते हुए 'परचम' की एक पदाधिकारी निकहत परवीन कहती हैं, "हमने यौनकर्मी की बेटी होने का काफ़ी दंश झेला है. जब हम स्कूल जाते थे तो स्कूल की लड़कियाँ हमसे दोस्ती तो दूर, बात करने में भी अपना अपमान समझती थीं. हम समाज का हिस्सा होते हुए भी ख़ुद को किसी दूसरी दुनिया का इंसान समझते थे."

उन्होंने बताया, "स्कूल के दिनों में ही हम लोगों ने तय किया कि अपने अधिकारों के लिए हमें संगठित होकर संघर्ष करना पड़ेगा. तभी परचम का वजूद सामने आया.

सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा

Image caption नसीमा ख़ातून एक यौनकर्मी की बेटी हैं लेकिन संघर्ष ने उन्हें एक सम्मानित मुकाम दिलाया है.

'परचम' की सचिव नसीमा ख़ातून ख़ुद एक यौनकर्मी की बेटी हैं लेकिन उनके संघर्षों ने उन्हें इस शहर में एक सम्मानित स्थान दिलाया है.

रेडलाइट एरिया के ताज़ा अध्ययन का ज़िक्र करते हुए वह कहती हैं, "पिछले छह महीने में हमने पाया है कि यौनकर्मियों की सबसे बड़ी समस्या उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा है. दूसरी तरफ़ यौनकर्मियों की लड़कियों के लिए समाज की मुख्यधारा में कोई गुंजाइश नहीं बचती नतीजतन उन्हें थक-हार कर यौनकर्मी बनने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं सूझता."

नसीमा ने बताया, "हमने अपने अध्ययन के बाद जो सिफ़ारिशें सरकार को पेश करने लिए तैयार की हैं, उसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि सरकार 35 वर्ष या उससे अधिक उम्र की यौनकर्मियों के लिए पेंशन की व्यवस्था करे. उनकी पढ़ाई के लिए सम्मानजनक वज़ीफ़े की व्यवस्था की जाए ताकि वह समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें और अपने सपने पूरे कर सकें."

चुनौती

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट ऐंड स्टडीज़ की कंचन बाला कहती हैं, "यौनकर्मियों की बच्चियों का पुनर्वास हमारे समाज और सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती है. जब तक उन बच्चियों को रेडलाइट एरिया से निकाल कर उनके घरों से दूर स्कूल के हॉस्टलों में नहीं लाया जाता, हम उन्हें समाज की मुख्यधारा में नहीं ला सकते."

बिहार के 38 में से 25 ज़िलों में रेडलाइट एरिया है जहाँ हज़ारों महिलाएं अनेक पीढ़ियों से इस पेशे में लगीं हैं.

लेकिन उनके लिए एक गंभीर समस्या यह है कि उनकी बेटियाँ न चाह कर भी इस पेशे को अपनाने के लिए मजबूर होती हैं..

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