बीबीसी विशेष: कैसी आज़ादी?

  • 15 अगस्त 2010
आनंद कुमार
Image caption 2002 में आनंद कुमार ने ‘सुपर 30’ की शुरुआत की.

भारत की आज़ादी की 63वीं सालगिरह पर अगले कुछ दिनों तक बीबीसी आप तक कुछ विशेष कहानियाँ पहुंचाएगा.

कुछ ऐसे लोगों की कहानियां जो लगातार इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं कि आख़िर कितने आज़ाद हैं वो?

'आज़ादी अगर ताकत बने तो...'

'' मेरा नाम आनंद कुमार है और मैं ऐसे बच्चों को पढ़ाने का काम करता हूं जो बेहद ग़रीब हैं और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की तैयारी करना चाहते हैं.

हम 15 अगस्त को हर साल एक परम्परा की तरह मनाने के आदी हो गए हैं. क्या हम ये सोचते हैं कि जिन बच्चों के लिए कम उम्र में मज़दूरी करना एक मजबूरी है और जो चाह कर भी पढ़ नहीं पाते उनके लिए क्या आज़ादी के कोई माय़ने हैं.

अपने छात्र जीवन में मुझे गणित पढ़ने का बहुत शौक था. मेरी इच्छा थी कि मैं एक प्रोफ़ैसर बनूं. मेरा एक अनुसंधान-पत्र लंदन में प्रकाशित हुआ और मुझे केम्बरिज में पढ़ने के लिए बुलाया गया. लेकिन मेरा एडमिशन नहीं हो सका क्योंकि मैं बहुत ग़रीब था.

उसी समय मेरे पिताजी की मृत्यु हो गई और घर की सारी ज़िम्मेदारियां मुझ पर आ गईं. मैंने ग़रीबी को बहुत करीब से देखा है. यही वजह है कि मैंने सोचा कि मैं उन बच्चों को पढ़ाऊंगा जो बहुत ग़रीब हैं. इस तरह 2002 में मैंने ‘रामानुजन स्कूल ऑफ मैथमैटिक्स’ या ‘सुपर 30’ की शुरुआत की.

‘सुपर 30’

शुरुआत में हमें काफ़ी मुश्किलें आईं. हम ग़रीब बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाते थे और हमारे पास बेहद कम संसाधन थे. दोस्तों की मदद से हमने किसी तरह ये काम जारी रखा और धीरे-धीरे सुपर 30 के लगभग सभी बच्चों का चयन आईआईटी में होने लगा.

Image caption 'सुपर 30' को लेकर आनंद को कई बार धमकियां भी मिलीं.

इस सफलता के चलते हमें कई बार धमकियां भी मिलीं. कोचिंग माफ़िया ने हम पर हमले भी कराए. हम ग़रीब बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाते हैं और बेहतरीन परिणाम आते हैं. जबकि वो लोग महंगे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मोटी फीस लेकर पढ़ाते हैं और अनेक बच्चों का चयन नहीं हो पाता.

लेकिन बहुत से लोग हमारे इस काम से ख़ुश भी हैं. दूर-दराज़ से आकर वो हमें बधाई देते हैं. ख़ासतौर पर अप्रवासी भारतीयों ने हमें कई तरह से मदद देने की पेशकश भी की है.

वो सभी बच्चे जो होनहार हैं और पढ़ना चाहते हैं लेकिन ग़रीबी की वजह से मुश्किलें झेल रहे हैं, मैं आज़ादी की वर्षगांठ के मौके पर उनसे कहना चाहता हूं कि अपने आत्मविश्वास को बनाए रखें.

अपनी दुर्बलता को ही अपना हथियार बनांए. जिसने भी इतिहास रचा है वो कभी न कभी कमज़ोर रहा है. याद रहे आज़ादी ने हमें जो ताकत दी है उसके ज़रिए हमें खु़द अपने लिए रास्ते बनाने होंगे.''

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