'हुकूमत ने आज़ादी की क़द्र नहीं की'

मनोज कुमार
Image caption अधिकतर हिंदी फ़िल्मों में मनोज कुमार का नाम 'भारत कुमार' ही रहा.

भारत में आज़ादी की सालगिरह का मौका हो और देशभक्ति का ज़िक्र छिड़े तो मनोज कुमार की फ़िल्मों को याद किए बिना ये चर्चा अधूरी है.

बीबीसी ने एक ख़ास बातचीत में उनसे जाना चाहा कि भारत की आज़ादी को लेकर क्या है उनकी सोच और हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में वो ‘भारत कुमार’ के नाम से कैसे मशहूर हुए.

जिस समय भारत आज़ाद हुआ आपकी उम्र कोई 10 साल की थी, कोई धुंधली सी याद उस समय की.

मुझे याद है कि मैं उन दिनों दिल्ली में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए बने एक कैंप में रहता था. आज़ादी से एक दिन पहले हमारे यहां गांव से किसी के मरने की ख़बर आई थी. पिताजी निढाल पड़े थे. अगले दिन पिता ने मुझसे कहा कि नहा लो हमें लाल किले जाना है.

मैं उन चंद हज़ार लोगों में से था जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू को लाल किले पर झंडा फ़हराते देखा. मेरे पिता जो रात को निढाल पड़े थे वो झूमने लगे, वो झंडे को देख कर तालियां बजा रहे थे. उनका ये जोश, आज़ादी का ये जश्न मेरे ज़हन में आज भी ताज़ा है.

आज़ादी का ये जोश और भारत के लिए जो सपने देखे गए उन्हें साकार करने का जुनून क्या अब भी लोगों में बाकी है.

ये जोश शायद ही अब कहीं बचा हो. आज़ादी एक पवित्र चीज़ है जो बड़ी कुर्बानियों के बाद हमें मिली.

लेकिन हमारी हुकूमत ने उसकी क़द्र नहीं की. उन्होंने कद्र नहीं की नहीं की तो आवाम़ ने भी नहीं की.

मुझे जब भी मौका मिला फ़िल्मों के ज़रिए मैंने लोगों में ये जोश भरने की कोशिश की.

वो कौन सा वक्त था जब हिंदी सिनेमा के इतिहास में आप मनोजकुमार सेभारतकुमार बन गए.

शहीद के प्रिमियर पर लाल बहादुर शास्त्री आए थे. फ़िल्म देखने के बाद उन्होंने मुझे सीने से लगाया और कहा कि मेरा एक नारा है 'जय जवान जय किसान' क्या इस पर फ़िल्म बन सकती है.

इसके बाद मैंने उपकार लिखी. पहले मैंने अपने किरदार को नाम दिया ‘राम’. फ़िर मुझे लगा कि ये एक गांव की कहानी है और भारत गांवों में बसता है. तो मैंने अपने किरदार का नाम रखा ‘भारत कुमार’.

लेकिन ये नाम मेरे साथ जुड़ा तो एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई.

हर बार मुझे इस किरदार के साथ, उसके नाम के साथ न्याय करना था. यहां तक की हिरोइनों के साथ रोमांटिक सीन भी मैंने बड़ी एहतियात के साथ बुने.

लेकिन भारतवासियों ने मुझे जो प्यार जो इज़्ज़त दी उसका मैं हमेशा ऋणी रहूंगा.

अपनी फ़िल्मों में आपने हमेशा समस्याओं को केंद्र में रखा. इन फ़िल्मों को हम पेट्रियॉटिक-सिनेमा के रुप में याद करते हैं. ये सिनेमा असल में क्या है.

Image caption नेहरू ने 15 अगस्त को लाल किले पर झंडा फ़हराया था.

सिनेमा में मनोरंजन के साथ सार्थकता भी होना चाहिए. इस नए दौर की एक 'पेट्रियॉटिक' फ़िल्म जो मुझे अच्छी लगती है वो है मंगलपांडे. चीज़ों को सतही तरीके से दिख़ाया गया लेकिन लोगों ने ये तो जाना कि गांधी, नेहरु और भगत सिंह के अलावा भी आज़ादी के दूसरे किरदार थे.

‘रंग दे बसंती’ और ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ जैसी फ़िल्मों की अपनी एक जगह है जो युवाओं की बात कहती हैं उनके आक्रोश को एक ज़रिया देती हैं.

पेट्रियॉटिक सिनेमा का ये मतलब कतई नहीं कि सिर्फ़ झंडे की बात की जाए, सरहद की बात की जाए. ये वो सिनेमा है जिसके ज़रिए हम देश के बारे में कुछ समझें.

आज फ़िल्म निर्देशक सोचते हैं कि ओवरसीज़ के लिए फिल्में बनाएं, अंतरराष्ट्रीय सिनेमा बनाएं. मैं ये मानता हूं कि अंतरराष्ट्रीय सिनेमा तब तक नहीं बन सकता जब तक हम राष्ट्रीय सिनेमा बनाना न सीख जाएं. पेट्रियॉटिक सिनेमा यही राष्ट्रीय सिनेमा है.

आज़ादी की 63वीं सालगिरह पर लोगों से कुछ कहना चाहेंगे.

आज़ादी के बहुत से ऐसे सिपाही हैं जिनका नाम आज हमारी पीढ़ी जानती ही नहीं.

ये वो लोग हैं जिन्होंने हमें आज आज़ादी से रहने का तोहफ़ा दिया. हमारी कोशिश रहे कि इतिहास इन लोगों को भी पहचाने.

साथ ही 15 अगस्त, 2011 के लिए हम ये तय करें कि जो ग़लतियां हम आज कर रहे हैं उनमें से कम से कम 50 फ़ीसदी को अगली 15 अगस्त तक सुधार लेंगे.

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