साथ आएंगे राज और उद्धव?

Image caption राज और उद्धव की भागीदारी से शिवसेना को सत्ता मिल सकती है: विश्लेषक

शिवसेना के एक धड़े की ओर से शुरू किए गए ‘ठाकरे जोड़ो अभियान’ के भविष्य को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. राजनीतिक जानकार ये कयास लगाने में जुटे हैं कि उद्धव और राज क्या दोबारा साथ आ सकते हैं?

मराठी मानुस के हितों की बात करने वाले दोनो नेताओं के अलग होने से जहाँ शिवसेना के वोटबैंक पर असर पड़ा है, वहीं विपक्ष के बंटने का फ़ायदा कांग्रेस ओर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सरकार को हुआ है.

महाराष्ट्र की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले मुंबई महानगरपालिका चुनाव से ठीक पहले शुरू किए गए ‘ठाकरे जोड़ो अभियान’ को लेकर ये कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के बीच किसी तरह का तालमेल संभव है.

जानकार ऐसी किसी संभावना के प्रति आशावान नहीं हैं लेकिन शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक दोनो पार्टियों के नेता इन दिनों टेलीफ़ोन से लगातार संपर्क में हैं और अगले छह या आठ महीने में कोई घोषणा हो सकती है.

‘ठाकरे जोड़ो अभियान’

हालांकि ‘ठाकरे जोड़ो अभियान’ शुरू करने वाले शिवसेना कार्यकर्ता सतीश वलंजू कहते हैं कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं कि दोनो पार्टियों के बीच इस मुद्दे को लेकर संपर्क हो रहा है या नहीं. सवाल है कि क्या इस अभियान पर शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की मुहर लगी है, क्योंकि अभियान से ये साफ़ है कि शिवसेना को राज ठाकरे की ज़रूरत है.

सतीश वलंजू कहते हैं कि उन्होंने अभियान की शुरूआत से पहले बाल ठाकरे को चिट्ठी भेजी थी, और उन्होंने जो सभाएं की, उसका कोई विरोध नहीं हुआ, तो वो ये मानकर चल रहे हैं कि उन्हें शिवसेना प्रमुख का समर्थन प्राप्त है.

वलंजू कहते हैं, ''मनसे की वजह से हुए वोट के विघटन से शिवसेना को महाराष्ट्र में 52 सीटों का नुकसान हुआ था. अगर मुंबई महानगरपालिका चुनाव में शिवसेना और मनसे एक दूसरे के खिलाफ़ खड़े होते हैं, तो दोनो में से एक भी नहीं जीतेगा. ऐसे में महानगरपालिका में शिवसेना के हाथ से सत्ता निकल जाएगी.''

सतीश वलंजू सख्त लहज़े में कहते हैं चाहे वो विदर्भ का मुद्दा हो, या कुछ और, राज्य को कई मुश्किलों का सामना करना. विपक्ष लगातार कमज़ोर हो रहा है ऐसे में संभव है कि महाराष्ट्र के टुकड़े भी हो जाएं.

उनका कहना है, ''हो सकता है कि दोनो भाइयों के बीच अहम् का टकराव हो लेकिन ये लोग तभी रहेंगे जब महाराष्ट्र रहेगा. अगर महाराष्ट्र नहीं रहेगा तो यहां के लोग जीवनभर उन्हें माफ़ नहीं कर करेंगे.''

पब्लिक स्टंट

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक उद्धव की पार्टी पर पकड़ कमज़ोर हुई है. इस बीच मनसे के प्रवक्ता वागेश सारस्वत राज ठाकरे की शिवसेना में वापसी को शिवसेना का पब्लिक स्टंट बताते हैं.

लेकिन ये भी कहा जा रहा है कि जब कांग्रेस और एनसीपी के बीच गठबंधन हो सकता है तो राज और उद्धव भी शायद किसी रूप में साथ आ जाएं. वागेश सारस्वत कहते हैं कि गठबंधन का दौर चल रहा है और कब कैसी स्थितियाँ होंगी कहा नहीं जा सकता.

तो क्या दोनो पार्टियों के बीच भविष्य में कोई गठबंधन संभव है? ये बात फ़िलहाल अभी साफ़ नहीं है.

Image caption राज की शिवसेना में वापसी को पब्लिक स्टंट बताया जा रहा है.

शिवसेना में इस बात को लेकर चिंता है कि युवाओं पर राज के अभियानों का व्यापक असर हुआ है.

बाल ठाकरे की भूमिका

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार डीके रायकर के मुताबिक शुरुआत में युवा राज की ओर आकर्षित हुए थे, लेकिन वो आकर्षण कम हुआ है क्योंकि राज ने उनके सामने कोई ठोस कार्यक्रम नहीं रखा. रायकर के मुताबिक किसी भी रूप में दोनो भाइयों के साथ आने में बाल ठाकरे की अहम भूमिका होगी.

उधर शिवसेना छोडकर कांग्रेस में गए संजय निरुपम के मुताबिक दोनो पार्टियों का साथ आना अब उनकी मजबूरी है. वो कहते हैं, ''राजनीति में आप किसी को अछूत नहीं मान सकते. जब तक शिवसेना राज ठाकरे को अछूत मानती रहेगी, या फिर राज ठाकरे में ये अहंकार रहेगा कि वो शिवसेना को खत्म कर देंगे, तब तक दोनो पार्टियाँ साथ नहीं आ सकती. मुंबई में 21 फ़ीसदी मराठी वोटर हैं. जल्द ही दोनो पार्टियों को एहसास हो जाएगा कि वो इस वोटबैंक को आपस में बांट रहे हैं और कोई नया वोट बैंक पैदा नहीं हो रहा है.''

शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक अगर राज और उद्धव साथ आते हैं तो शिवसेना में इतनी ताकत है कि वो सत्ता में भागीदार बने. तो क्या ये संभव है ? जानकारों की मानें तो राजनीति में कुछ भी संभव है.

संबंधित समाचार