माओवादियों ने बातचीत की शर्तें रखीं

  • 18 अगस्त 2010
माओवादी विद्रोही
Image caption छह राज्यों में माओवादियों की गतिविधियाँ चल रही हैं

भारतीय माओवादियों ने भारत सरकार को शांति के लिए एक और मौक़ा देने और युद्धविराम की संभावना के लिए तीन शर्तें रखी हैं.

माओवादियों की सैनिक शाखा के मुखिया कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी ने बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में कहा है कि इसके लिए ज़रूरी है कि भारत की केंद्र सरकार भी माओवादियों के साथ ही द्वितरफ़ा संघर्षविराम की घोषणा करे.

कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी ने कहा, "अभी तक तो भारतीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने हमसे (माओवादियों से) ही 72 घंटे का युद्धविराम घोषित करने को कहा है और उसी के बाद शांति योजना तैयार की जाएगी. यह स्वीकार्य नहीं है. दोनों पक्षों को हिंसा एक साथ रोककर युद्धविराम की घोषणा भी एक साथ ही करनी होगी."

कोटेश्वर राव ने कहा कि सरकार को माओवादियों के साथ खुली बातचीत के बाद ही मध्यस्थों के नामों की सूची को अंतिम रूप देना होगा.

उन्होंने कहा कि सरकार ने रेलमंत्री ममता बनर्जी और बंधुवा मज़दूरी के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले स्वामी अग्निवेश का नाम प्रस्तावित किया है जबकि इससे पहले माओवादियों ने लेखिका अरुंधति रॉय, बंगाली गायक और सांसद कबीर सुमन, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और आदिवासियों हितों से सरोकार रखनेवाले बी डी शर्मा और बांध विरोधी कार्यकर्ता मेधा पाटकर के नाम प्रस्तावित किए थे.

राव ने कहा, "अगर सरकार के पास कोई और नाम हैं तो उन पर विचार किया जा सकता है लेकिन यह बहुत ज़रूरी है कि मध्यस्थों के नाम तय करने में देरी नहीं होनी चाहिए."

कोटेश्वर राव ने माँग की कि उन पुलिस और ख़ुफ़िया अधिकारियों को तुरंत सज़ा दी जाए जो माओवादी नेता चेरीकुरी राजकुमार उर्फ़ आज़ाद की मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं."

उन्होंने कहा कि आज़ाद को सरकारी मध्यस्थकार स्वामी अग्निवेश के साथ युद्ध विराम समझौता तैयार करने का काम सौंपा गया था.

जाँच की माँग

राव ने कहा, "अब किसी को भी इसमें कोई शक नहीं है कि आज़ाद की निर्मम हत्या उस समय की गई थी जब वो शांति के लिए कुछ जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे. उनके हत्यारों को न्याय के कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए और एक समिति उनकी हत्या की परिस्थितियों की जाँच करे जिसमें स्वामी अग्निवेश भी शामिल हों." भारतीय अधिकारियों का कहना है कि छह राज्यों में वर्ष 2010 में जुलाई तक माओवादियों के विभिन्न हमलों में लगभग 200 पुलिस और सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं. इन छह राज्यों में आदिवासियों की संख्या ज़्यादा है और ये राज्य प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध माने जाते हैं. माओवादियों को भी भारी जानी नुक़सान हुआ है, ख़ासतौर से पिछले दो महीनों के दौरान और उनके अनेक वरिष्ठ नेता या तो गिरफ़्तार कर लिए गए हैं, कुछ मार दिए गए हैं और कुछ घायल हो गए हैं.

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादियों की बढ़ती गतिविधियों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया है.

संबंधित समाचार