भू-अधिग्रहण: मुआवज़ा बनाम भविष्य

किसान
Image caption कुशीनगर के तीन गाँवों में किसानों को चार करोड़ रुपए तक के चेक दिए जा चुके हैं

उत्तरप्रदेश में मूलभूत सुविधाओं के नाम पर यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना और कुशीनगर में प्रस्तावित हवाई अड्डे के लिए ज़मीन अधिग्रहण किया जा रहा है.

लेकिन अधिग्रहित की जा रही ज़मीन को लेकर न केवल मुआवज़े की राशि अलग-अलग है बल्कि इससे जुड़े किसानों की मांग और उनका नज़रिया भी एक नहीं है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना के लिए इन इलाकों के किसान नोएडा के किसानों से ज़्यादा यानी 850 रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवज़े के लिए संघर्ष कर रहे हैं पर कुशीनगर के किसानों ने मुआवज़े की राशि स्वीकार कर ली है.

कुशीनगर में प्रस्तावित हवाई अड्डे के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों को औसतन 950 रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवज़ा देना शुरू कर दिया है.

अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट जयंत कुमार दीक्षित का कहना हैं कि पर्यटन सचिव अवनीश अवस्थी ने स्वयं गाँव-गाँव में चौपाल लगाकर करार नियमावली के तहत किसानों से जमीनों के अधिग्रहण की दर तय की है.

मुआवज़ा

जयंत कुमार दीक्षित के अनुसार जिन 11 गाँवों के साथ समझौता हुआ है उनके किसानों को 945 से 970 रुपये के बीच मुआवज़ा दिया जा रहा है.

लोगों का कहना कि ये गाँव कुशीनगर कसिया बाज़ार से दूर हैं और सरकार की दर यहा के प्रचलित मूल्य से अधिक है, इसलिए किसान सहमत हो गए हैं.

शुक्रवार की शाम तक तीन गाँवों के 109 किसानों को चार करोड़ रुपए से ज़्यादा के चेक दिए जा चुके हैं. ज़िला प्रशासन और पर्यटन विभाग के अधिकारी सुबह शाम गाँवों में कैंप लगाकर मुआवजे़ के चेक बाँट रहे हैं.

नकहनी गाँव के किसान शुक्रवार की शाम कैंप में मुआवज़े का चेक लेने आए, लेकिन चेक लेने के बावजूद वे मायूस थे. इनमें से कई किसान अनपढ़ थे. उन्हें नहीं पता कि उनकी कितनी ज़मीन अधिग्रहित की जा रही है और किस दर से उन्हें मुआवज़ा दिया गया है.

परिवारों में झगड़े

बीबीसी से बातचीत में किसान उमेश राय ने कहा, ''ज़मीन जा रही है तो पैसा लेकर खुश कैसे हो सकते हैं. पैसा कितने दिन रहेगा. पैसा तो ख़र्च हो जाएगा.'' अधिकतर किसान कम ज़मीन वाले हैं. जो मुआवज़ा मिल रहा है उसमें कई हिस्सेदार हैं.

किसानों का कहना है कि ज़मीन को लेकर कई घरों में झगड़े भी शुरू हो गए है. नौजवान बेटा कहता है कि इस पैसे से उसे एक जीप खरीदनी है जबकि पिता ज़मीन के बदले दूसरी ज़मीन खरीदना चाहता है.

एक बुज़ुर्ग किसान राधाकृष्ण राय ने कहा, '' ख़ुशी-नाख़ुशी क्या होगी साहब? ज़मीन तो चली गई. नाराज़ होकर भी कोई क्या करेंगे?''

मुआवज़े के अलावा नीति नहीं

एक अन्य किसान राम कृपाल से जब पूछा गया कि अब गुज़ारा कैसे होगा तो आसमान की तरफ़ इशारा करके उन्होंने कहा ‘भगवान ही जाने’. स्पष्ट है कि सरकार ने मुआवज़े के अलावा विस्थापितों के भविष्य को लेकर कोई नीति नहीं बनाई है.

इस तरह कुल ढाई हज़ार किसानों की 850 एकड़ जमीन का अधिग्रहण होना है. इसमें करीब 600 एकड़ ज़मीन तय करार के तहत मिल जाएगी.

लेकिन बाक़ी लगभग 250 एकड़ के मालिक यानी दो गाँवों के किसान इससे दोगुना-तिगुना मुआवज़ा मांग रहे हैं.

ये दोनों गाँव भलुही मदारी और बिशुनपुर बिदौलिया, कुशीनगर और कसिया बाजार से लगभग जुड़े़ हुए हैं और इनकी ज़मीनें सड़कों के किनारे हैं.

यही वजह है कि इनके किसान 2000 से लेकर 4000 रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवज़ा मांग रहे हैं. इनमें से कई तो चाहते हैं कि उनकी ज़मीनें सरकार न ले क्योंकि बाज़ार मूल्य इससे कहीं ज़्यादा है और नगर के विस्तार में किसानों को ज़्यादा फा़यदा होगा.

वास्तविकता यह भी कि हवाई अड्डे के लिए इन ज़मीनों की ज़रुरत नहीं. इन ज़मीनों पर होटल और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनेंगे.

भलुही मदारी के रमाकांत चौबे कहते हैं, ''हमारी ज़मीन न सिर्फ ज़्यादा उपजाऊ है बल्कि सड़क और शहर के करीब भी है. या तो सरकार बाज़ार दर से मुआवज़ा दे या मुख्यमंत्री पहले हम किसानों को गोली मरवा दें, फिर कब्जा लें.'' रमाकांत चौबे के खेत हवाई पट्टी से सटे हुए हैं."

दूसरा पहलु - बौद्ध पर्यटक

सरकार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बनी कसिया हवाई पट्टी का विस्तार करके एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाना चाहती है. किसानों की मांग और उनके नज़रिए के अलावा इस मुद्दे का एक और पहलु भी है.

सरकार का कहना है कि कुशीनगर में नया हवाई अड्डा बन जाने से जापान, कोरिया, श्रीलंका, बर्मा, थाईलैंड आदि से बौद्ध तीर्थ यात्रियों की संख्या 40 हज़ार से बढ़कर चार लाख हो जाएगी. इससे यहाँ की आबादी को रोज़गार मिलेगी और व्यापार बढ़ेगा.

लेकिन ध्यान देने की बात ये भी है कि कई बार समय सीमा बढ़ाने के बावजूद फ़िलहाल कोई भी कंपनी प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने के लिए आगे नहीं आई है. शुरुआत में जिन 12 कंपनियों ने रुचि दिखाई थी वह भी पीछे हट गई हैं. सरकार ने इसके लिए अब 31 अगस्त तक की तारीख़ बढ़ा दी है.

जानकारों का कहना है कि कसिया हवाई अड्डा अब भी काम कर रहा है. हाल ही में भारत की यात्री पर आए बर्मा के सैनिक शासक थान श्वे अपने विमान से यहीं उतरे थे. इसके अलावा पचास किलोमीटर की दूरी पर गोरखपुर हवाई अड्डा है ही. ऐसे में कसिया में और एक हवाई अड्डा बनाना क्या वित्तीय दृष्टि क्या वाकई उपयोगी होगा.

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