भूस्खलन में पाँच की मौत

Image caption राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग लाचार नज़र आ रहा है

उत्तराखंड में भारी बारिश कहर बनकर गिर रही है औऱ आपदाएं रूकने का नाम नहीं ले रही है. बुधवार बागेश्वर में बादल फटने से हुए भूस्खलन में 18 बच्चों के जिंदा दब जाने के तीन दिनों बाद ही उत्तरकाशी में सयानाचट्टी के पास एक और बड़ा भूस्खलन हुआ है.

इस भूस्खलन के कारण कई मकान गिर गये और पाँच लोग मलबे में दब कर मारे गए हैं.

राज्य में भारी बारिश और भूस्खलन की घटनाओं में अब तक 70 लोगों की मौत हो चुकी है.

मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने पत्रकारों को बताया कि आपदा की इन घटनाओं से निबटने के लिये केंद्र से पाँच हज़ार करोड़ रुपये की मदद की मांग की गई है.

उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन विभाग के कार्यकारी निदेशक पीयूष रौतेला ने कहा कि ये मजदूरों के मकान थे जो वहां सड़क बनाने का काम कर रहे थे .वहां एलर्ट जारी कर दिया गया है और राहत और बचाव का काम जारी है.

स्थानीय लोगों के अनुसार मलबे में कुछ और लोगों के दबे होने की आशंक जताई जा रही है. टिहरी के चिन्यालीसौड़ के पास भी एक पुल डूब गया है जिससे. क़रीब 50 गांवों का संपर्क कट गया है.

टिहरी बांध में भी पानी बढ़ा

भारी बरसात ने टिहरी बांध की झील का जलस्तर भी बढ़ा दिया है जिसे देखते हुए 70 क्यूमेक्स अतिरिक्त पानी गंगा में छोड़ा जा रहा है.

इससे नजदीकी इलाकों में जलभराव का खतरा बढ़ गया है.

पिछले कुछ दिनों में गढ़वाल और कुमाऊं दोनों ही मंडलों के पर्वतीय इलाकों में जगह-जगह भूस्खलन ,बादल फुटने,सड़क-मकान धंसने और खेत-मवेशी बहने की घटनाएं हो रही हैं जिससे जानमाल का भारी नुकसान हुआ है और जनजीवन अस्त-व्यसत हो गया है.

इन हादसों में अब तक 70 से ज्यादा लोगों की जानें चली गईं है.

लाचार आपदा प्रबंधन

Image caption भूस्खलन से जानमाल का बहुत नुक़सान हुआ है

लोग डरे हुए और बेबस हैं और आपदा प्रबंधन विभाग लाचार औऱ लचर नजर आ रहा है.ये पूछे जाने पर कि इन हादसों को देखते हुए विभाग क्या कर रहा है आपदा प्रबंधन के निदेशक पीयूष रौतेला का कहना था कि आज तो छुट्टी है, घर पर हैं.

उन्होंने ये भी जोड़ा कि कंट्रोल रूम बनाए गये हैं और राहत औऱ बचाव की पूरी कोशिश की जा रही है.

लेकिन इस बात का जवाब उनके पास नहीं है कि आपदा प्रबंधन में वे कौन से बदलाव किए जा सकते हैं जिनसे प्राकृतिक आपदाओं की सूरत में प्रभावित लोगों तक हर तरह की मदद तत्काल पहुंचाई जा सके और पहले से उन्हें आगाह भी किया जा सके .

प्रदेश में चेतावनी के ऐसे तंत्र की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है जो पहले से ही भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं के प्रति आगाह कर सके. मौसम विभाग ने इसके लिये राज्य में दो विशेष राडार लगाने के लिये आवेदन भी किया है मगर सरकार दो साल से उन्हें ज़मीन तक नहीं मुहैया करा सकी है.

रोजमर्रा के सामान की किल्लत

उधर बागेश्वर के जिस गांव सुमगढ़ में भूस्खलन की चपेट में आए स्कूल में बच्चे मारे गए थे उस गांव में बारिश से हुई तबाही के बाद खाने पीने के सामान की किल्लत हो गई है.

ये इलाक़ा सरयू नदी की घाटी में पड़ता है जहां और भी कई गांव प्रभावित हैं. सुडिंग, कफेड़ा, सलिंग जैसे गांव मे कई लोग घरबार छोड़कर जा रहे हैं.

खाद्यान्न और पीने के साफ़ पानी की कमी हो गई है.

बच्चों की अकाल मौत से शोक संतप्त लोग शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार पड़े हैं. उनके लिए डॉक्टर नहीं है.

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