झोपड़ों में रहने वालों के लिए घर का सपना

  • 25 अगस्त 2010
टाटा कालोनी, मुंबई
Image caption मुंबई की बड़ी आबादी झोपड़पट्टियों में रहती हैं

भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई के 55 फ़ीसदी लोग झोपड़पट्टियों में रहते हैं. डेढ़ करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले इस महानगर के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि क्या किया जाए झोपड़ियों का और कैसे इन लोगों को रहने की बेहतर सुविधा मिले.

वर्ष 1995-96 में लोगों से वादा किया गया था कि 40 लाख झोपड़ों में रहने वाले लोगों के लिए पाँच साल में आठ लाख घर बनेंगे, और उन्हें मुफ़्त घर दिए जाएंगे.

ये हुआ स्लम रिहैबिलिटेशन स्कीम (एसआरए) के अंतर्गत. सोच थी झोपड़ियों में रहने वाले लोगों को मुफ़्त घर मिले और बिल्डरों को भी फ़ायदा हो. लेकिन 15 साल बाद सिर्फ़ 1.5 लाख घर बने हैं.

झूठे कागज़ों और पैसे के ज़ोर की वजह से कई ग़लत लोगों को भी योजना का फ़ायदा मिला. मुंबई में अभी भी हर जगह झोपड़े या गंदगी में टूटे-फूटे मकान दिखाई पड़ते हैं. यानि योजना अपने मक़सद में ज़्यादा सफ़ल नहीं हुई है, लेकिन ज़मीन की लालच बरक़रार है.

मुंबई के नए बिज़नेस सेंटर बांद्रा कुर्ला कांप्लेक्स में ज़मीन के दाम आसमान छू रहे हैं. यहीं एक गंदी सी बस्ती टाटा कॉलोनी है. कुछ साल पहले तक यहाँ मच्छरों और गंदगी का बसेरा था, लेकिन अब सभी की निगाहें ज़मीन पर है.

यहाँ कई घर टूटे पड़े हैं. एक कोने में तनवीर कासिम का घर है जिसकी छत को भी तोड़ दिया गया है. उनके पिता दिल के मरीज़ हैं. इस इलाक़े में क़रीब 500 लोगों के घर थे, अब सिर्फ़ 60-70 ही बचे हैं.

कासिम कहते हैं कि महानगरपालिका ने उन लोगों के घर तोड़ दिए जो वहाँ से चले गए हैं. उनका आरोप है कि लोगों ने एक कंपनी के साथ इलाक़े को विकसित करने के लिए समझौता किया, लेकिन बीच में दूसरी कंपनी आ गई जिसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. अब कोशिश हो रही है कि लोगों को वहाँ से हटाया जाए.

समस्या जस की तस

वो कहते हैं, "हमसे वादा किया गया था कि हर परिवार को घर बनाकर दिया जाएगा जिसमें हर सुविधा होगी. लेकिन बाद में कंपनी वायदे से मुकर गई. लोगों को पैसे दिए गए, धमकाया गया कि वो घर खाली कर दें."

क़ासिम को जानने वाले सरताज पहले टाटा कालोनी में रहते थे. अभी उन्होंने पास ही एक एसआरए के अंतर्गत बनी इमारत में फ़्लैट ख़रीदा है.

ये ग़ैरकानूनी है. अगर किसी झोपड़पट्टी वाले व्यक्ति को एसआरए योजना के अंतर्गत मुफ़्त मकान मिलता है तो वो उसे 10 साल तक बेच नहीं सकता, लेकिन सरताज ने 17 लाख में मकान ख़रीद लिया. वो कहते हैं कि ज़्यादातर मामलों में जिन लोगों को योजना के अंतर्गत मुफ़्त घर दिए जाते हैं, वो घर दूसरों को अच्छे दामों में बेचकर आगे निकल जाते हैं.

यानि जिस मक़सद से मुंबई में एसआरए योजना लाई गई, उसकी धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं. जितने घर बनने चाहिए उतने घर बने नहीं, अगर बने तो उनका दुरुपयोग हुआ. झोपड़पट्टियों की समस्या जस की तस बनी रही.

हाल ही में भाजपा के एकनाथ खडसे ने सरकार पर अनियमितता और बिल्डरों को फ़ायदा पहुँचाने का आरोप लगाया. मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने इससे इंकार किया है. नेताओं, बाबुओं पर ऐसे आरोप नए नहीं हैं.

एसआरए योजना के अंतर्गत सोच थी कि जिस ज़मीन पर झोपड़पट्टियाँ हैं, उसके एक हिस्से में बिल्डरों को बाज़ार में बेचने के लिए फ्लैट्स बनाने दिए जाएं ताकि उससे होने वाले मुनाफ़े से झोपड़पट्टी वालों के लिए मुफ़्त घर बनाए जा सकें.

स्कीम के तहत बिल्डरों को नियमों के तहत छूटें दी गईं. मक़सद था बिल्डरों को मुनाफ़े के बहाने आकर्षित करना.

योजना पर प्रश्नचिह्न

Image caption बीजेपी नेता एकनाथ खडसे बिल्डरों को फायदा पहुँचाने का आरोप लगाया है

एसआरए के पूर्व प्रमुख और म्हाडा (महाराष्ट्र हाउज़िंग ऐंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) के सीईओ और वाइस प्रेसिडेंट गौतम चटर्जी कहते हैं, "जब हमने 1996 में स्कीम की शुरूआत की तो हमने आठ लाख परिवारों के लिए घर बनाने की बात की थी. हम सवा लाख घर बना पाए हैं. सवा लाख और घरों का काम चल रहा है. अगर कोई परियोजना बाज़ार पर निर्भर है, तो ये बिल्डरों पर निर्भर करता है कि परियोजना की रफ़्तार क्या हो."

लेकिन जिस तरह से ये योजना चल रही है, उसे लेकर लोगों में बहुत बेचैनी है.

कुछ का मानना है कि ये योजना शुरुआत से ही ग़लत थी. मुंबई जैसे महंगे शहर में लोगों को मुफ़्त घर देना भ्रष्टाचार को हवा देने जैसा ही था. जो लोग 1995 के बाद मुंबई आए, उन्होंने भी झूठे कागज़ बनवाए या फिर बिल्डरों ने महंगे इलाक़े में झोपड़पट्टियों में रह रहे लोगों पर दबाव डाला कि वो उन्हें ही चुने, उन्हें धमकाया गया ताकि बिल्डरों को ज़मीन मिल जाए और वो मुनाफ़ा कमा सकें.

ज़ॉकिन अरपुथम वर्षों से धारावी में रहने वाले लोगों के लिए काम कर रहे हैं. वो कहते हैं, "कुछ मामलों में एक परिवार ने घूस खिलाकर ग़लत कागज़ बनवाकर एक से ज़्यादा घर हासिल किए. इन सबका कारण राजनीतिक भ्रष्टाचार है."

एकनाथ खडसे कहते हैं कि झोपड़पट्टियों को दिए जाने वाले घर निम्न स्तर के होते हैं. वो कहते हैं, "घर बनाने का काम निजी बिल्डरों के बजाए सरकारी एजेंसियाँ जैसे म्हाडा क्यों नहीं करतीं जबकि उनका काम आम लोगों के लिए सस्ते घर बनाना है. अगर ऐसा होता तो ये काम सस्ते में हो जाता. ज़्यादातर ऐसी स्कीमें सरकारी ज़मीनों पर होती हैं क्योंकि उन्हें हथियाना आसान होता है. हर स्कीम में राजनीतिक हिस्सेदारी होती है."

मुंबई जैसे महंगे शहर में ग़ैरक़ानूनी ढंग से ज़मीन पर रह रहे लोगों को मुफ़्त घर दिए जाने पर मध्यम वर्ग में भी गुस्सा है.

संबंधित समाचार