अधर में लटकी वेदांत की परियोजना

वेदांत की रिफाइनरी
Image caption वेदांत ने उड़ीसा में बहुत बड़ी रिफाइनरी बनाई लेकिन अब उसका भविष्य भी अधर में है.

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने उड़ीसा के नियमगिरि पहाड़ों में बाक्साइट के खनन के लिए वेदान्त रिसोर्सेस को दी गई प्राथमिक अनुमति रद्द कर दी है जिससे पूरी परियोजना पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लग गया है.

बाक्साइट से भरे नियमगिरि पहाड़ों में खनन क़ी अनुमति मिलने क़ी उम्मीद पर ही कंपनी ने वहां दस लाख टन क्षमता वाली रिफाइनरी लगाई थी.

इस रिफाइनरी के लिए बाक्साइट लाये जा रहे झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के 14 खानों में से 11 बिना किसी अनुमति के चलाए जाने के आरोप लगाते हुए मंत्रालय ने रिफाइनरी परियोजना को भी कारण बताओ नोटिस जारी करने का फैसला किया है.

गौरतलब है कि कुछ ही दिन पहले उड़ीसा सरकार ने लांजीगढ़ में चल रहे वेदान्त की दस लाख टन क्षमता वाली रिफाइनरी क़ी क्षमता छह गुना बढ़ाने के लिए अनुमति दी थी.

पर्यावरण मंत्रालय के मंगलवार को लिए गए फैसले के बाद अब इस रिफाइनरी के भविष्य पर भी सवालिया निशान लग गया है.

पृष्ठभूमि

गरीबी और भुखमरी के लिए जाने जाने वाले कालाहांडी जिले में वेदान्त क़ी कहानी सन 2003-04 में शुरू हुई जब वहां दस लाख टन क्षमता वाली रिफाइनरी और झारसुगुडा में टन क्षमता वाले स्मेल्टर प्लांट क़ी स्थापना के लिए उड़ीसा सरकार ने प्रवासी भारतीय उद्योगपति अनिल अग्रवाल के साथ समझौता किया.

नियमगिरि पहाड़ों में बाक्साइट के खनन के लिए वेदान्त क़ी एक इकाई स्टरलाइट इंडिया और उड़ीसा खान निगम के बीच हुए करार के मुताबिक एक संयुक्त उद्यम की कंपनी बनाई गई.

सन 2004 के विधान सभा चुनाव के ठीक पहले मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इस परियोजना का शिलान्यास किया.

आश्चर्य क़ी बात यह थी क़ि उस समय तक इस परियोजना के लिए पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति भी नहीं मिली थी. परियोजना के रास्ते पर आ रही अड़चनों को दूर करने और काम शुरू करने में राज्य सरकार और जिला प्रशासन ने जिस कदर तेजी दिखाई, उससे यह स्पष्ट हो गया कि नवीन पटनायक इस परियोजना के लिए कितने बेताब हैं.

Image caption वेदांत का लंदन में भी व्यापक विरोध हुआ है क्योंकि इससे आदिवासी विस्थापित हो रहे थे.

लेकिन प्रारंभिक काम शुरू होते ही कंपनी और राज्य सरकार के लिए एक के बाद एक समस्या खड़ी होने लगी. पहले कुछ पर्यावरणविदों ने इस परियोजना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक मामला दर्ज किया.

फिर नियमगिरि के आदिम अधिवासियों के ने भी सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी. उनका कहना था कि नियमगिरि पहाड़ को वो अपना देवता मानते हैं और इसमें खुदाई होने से उनकी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर इसका बेहद बुरा असर पड़ेगा.

लगभग तीन साल की कानूनी जद्दोजहद के बाद आखिरकार अगस्त 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने परियोजना को सैद्धांतिक अनुमति दी लेकिन साथ ही कुछ शर्तें भी रखी.

इनमें प्रमुख थी जंगल अधिकार कानून के तहत नियमगिरि में रहने वाले कुटिया कंध और डोंगरिया कंध आदिवासियों के अधिकारों क़ी सुरक्षा.

उड़ीसा सरकार का दावा है कि जंगल अधिकार कानून के तहत सभी प्रावधानों का पालन किया गया है. लेकिन हाल ही में नियमगिरि का दौरा कर लौटी एनसी सक्सेना कमिटी ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि केंद्र सरकार को भेजे गए ग्राम सभा में स्थानीय लोगों कि सहमति लेने से सम्बंधित दस्तावेज़ फर्जी हैं.

गौरतलब है कि सक्सेना कमिटी कि रिपोर्ट के आधार पर ही पर्यावरण मंत्रालय ने वेदान्त को खनन के लिए दी गई सैद्धांतिक अनुमति को रद्द किया है. कमिटी ने 16अगस्त को अपनी रिपोर्ट पर्यावरण मंत्री को सौंपी, जिसका बाद में मंत्रालय क़ी जंगल सलाहकार कमिटी ने भी समर्थन किया.

कमिटी के सुझाव के बाद यह लगभग तय हो गया था कि नियमगिरि में बाक्साइट के खनन के लिए वेदान्त को अनुमति नहीं मिलने वाली है लेकिन अपने दिल के करीब इस परियोजना को बचाने की आखरी कोशिश में नवीन पटनायक ने अपने जंगल सचिव को दिल्ली भेजा.

जंगल सचिव ने मंगलवार की सुबह पर्यावरण मंत्री से भेंट कर राज्य सरकार का पक्ष रखा. लेकिन जाहिर है कि पर्यावरण मंत्री को वो संतुष्ट नहीं कर पाए.

पर्यावरण मंत्रालय का फैसला वेदान्त के लिए तो एक बड़ा झटका है ही. साथ ही नवीन सरकार के लिए भी यह एक करारा झटका है. क्योंकि इस परियोजना और पारादीप में एक करोड़ 20 लाख टन का पॉस्को स्टील प्लांट के लिए नवीन पटनायक ने अपनी सरकार की शाख दांव पर लगा दी थी.

वेदान्त कि तरह पॉस्को परियोजना भी अनिश्चितता के बीच गुजर रही है. पिछले महीने पर्यवरण मंत्रालय कि एक कमिटी ने पॉस्को इलाके का दायरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा है वहां भी जंगला अधिकार कानून का उल्लंघन हुआ है.

परियोजना क़े लिए स्थानीय लोगों की रजामंदी के लिए ग्राम सभा नियम का पालन नहीं किया गया और पारंपरिक जंगल अधिवासियों के दावों पर फैसला नहीं किया है. इसके मद्दे नज़र केंद्र सरकार पॉस्को इलाके में भूमि अधिग्रहण का काम तत्काल बंद करने का आदेश दिया है.

इन दो महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के बारे में अपनी फ़रियाद लेकर नवीन पटनायक सोमवार को दिल्ली में प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से भी मिले थे. प्रधानमंत्री से मिलने के बाद उन्होंने कहा था कि प्रधान मंत्री ने उन्हें आश्वाशन दिया है कि पॉस्को काम आगे ले जाने में वे मदद करेंगे. अब यह देखना बाकी है कि क्या पॉस्को का भी वो हश्र होने वाला है जो वेदान्त का हुआ है.

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